भारत: ऐप्स नहीं, आत्मा है — ज्ञान नहीं, जीवनशैली है

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लोक टुडे न्यूज नेटवर्क

हेमराज तिवारी- वरिष्ठ पत्रकार

जब दुनिया डिजिटल दौड़ में अपने अपने घोड़े दौड़ा रही है —
चीन TikTok लेकर युवाओं के समय को निगल रहा है,
अमेरिका Facebook, YouTube, Google से पूरी दुनिया का डेटा चूस रहा है,
तब कोई बालक पूछ बैठा —
“भारत के पास क्या है?”

इस प्रश्न में व्यंग्य हो सकता है।
शंका भी।
लेकिन इसका उत्तर एक आकाश है — जिसमें इतिहास, दर्शन और विज्ञान साथ-साथ उड़ते हैं।

भारत के पास क्या है?

पंतजलि का योग है, जो मनुष्य को केवल तन से नहीं, मन और आत्मा से भी स्वस्थ करता है।

चरक और शुश्रुत का विज्ञान है, जो शल्य चिकित्सा का जन्मदाता रहा।

धन्वंतरि की आयुर्वेदिक परंपरा है, जो न केवल शरीर, बल्कि पंचतत्वों का संतुलन सिखाती है।

मनु की स्मृति है, जो समाज की आधारशिला रही।

बौधायन का गणित है, जिसने पाइथागोरस से पहले त्रिकोणमिति गढ़ दी थी।

आर्यभट्ट का खगोल है, जिसने शून्य को जन्म दिया और समय की गति नापी।

पाणिनि का व्याकरण है, जो संस्कृत को आज भी विश्व की वैज्ञानिक भाषा बनाता है।

और ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद — ये ज्ञान के चार स्तंभ हैं, जिनसे दुनिया आज भी रोशनी मांगती है।

टिकटोक बनाम तपस्या, फेसबुक बनाम फोकस

आज पश्चिम जिन तकनीकों पर गर्व करता है, वह अधिकतर हमारी विचारधारा की छाया मात्र हैं।

वहाँ डिजिटल मनोरंजन है,
यहाँ आध्यात्मिक मोक्ष है।

वहाँ ट्रेंड है,
यहाँ संस्कार है।

वहाँ डाटा है,
यहाँ ध्यान है।

भारत सिर्फ राष्ट्र नहीं, एक विचार है।

जब कोई पूछे “भारत के पास क्या है?”
तो उत्तर दीजिए:

“भारत के पास वह है, जो बाकी दुनिया अभी सीख रही है —
जीवन जीने की कला, संतुलन की परंपरा, और उस चेतना की कुंजी,
जो मनुष्य को देवता बनाती है — बिना किसी ऐप के।”

भारत की आत्मा कभी Silicon Valley नहीं बनी,
क्योंकि भारत वह प्रयोगशाला है,
जहाँ जीवन का विज्ञान तपस्या से निकलता है।

हमारे पास ‘ऐप्स’ नहीं
हमारे पास ‘ऋषि’ हैं।

हमारे पास ‘वर्चुअल रियलिटी’ नहीं —
हमारे पास ‘अंतःकरण की रियलिटी’ है।

लोकटुडे — जनता की आवाज़

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