लोक टुडे न्युज़ नेटवर्क
रिपोर्ट: हितेश रारा, मारोठ (नागौर)
नावां तहसील की पहाड़ियों के बीच बसा छोटा सा गांव भुणी आज भी अपनी हाथ की कलाकारी और पत्थर की मूर्तियों के लिए देशभर में जाना जाता है। लगभग 4,000 की आबादी वाले इस गांव के करीब 100 परिवार पीढ़ियों से पत्थर की मूर्तियाँ बनाकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं।
भुणी के कलाकारों का कहना है कि वे अपने पूर्वजों की परंपरागत छेनी-हथौड़ी कला को आज भी जीवित रखे हुए हैं। पहले यह गांव “चाकी वाला गांव” के नाम से जाना जाता था क्योंकि यहाँ हाथ से चलने वाली चाकियाँ बनाई जाती थीं। समय के साथ तकनीक बदली, चाकियों का चलन खत्म हुआ, लेकिन इन्हीं हाथों की कला ने अब पत्थरों को तराशकर नई पहचान दी — भगवानों और महापुरुषों की जीवंत मूर्तियों के रूप में।
पत्थर पर जान डालने वाले कलाकार
गांव के मूर्तिकार गणेश कुमावत, लक्ष्मण स्वामी, गिरधारी लाल स्वामी, कानाराम प्रजापत, ओमप्रकाश कुमावत सहित कई कलाकार किसी भी आकार की मूर्ति को हक़ीक़त जैसी जीवंतता देने में माहिर हैं।
यहाँ काले पत्थर, संगमरमर, लाल और पीले पत्थरों पर मूर्तियाँ बनाई जाती हैं।
भुणी में बने माँ काली, शिव परिवार, महावीर स्वामी और नंदी की मूर्तियाँ देशभर में प्रसिद्ध हैं।
जैन मूर्तिकला में दक्ष गणेश कुमावत, ईश्वर राम मेघवाल, लक्ष्मण स्वामी, बाबूलाल मेघवाल, प्रभूराम कुमावत, चेतन कुमावत आदि कलाकार जैन धर्म के दार्शनिकों की बेमिसाल मूर्तियाँ बनाते हैं।
️ देशभर में पहुँचती हैं भुणी की मूर्तियाँ
भुणी में बनी मूर्तियाँ केवल राजस्थान ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, असम और ओडिशा तक भेजी जाती हैं।
इन कलाकारों की कारीगरी का उदाहरण महाराष्ट्र के मांगीतुंगी में देखने को मिलता है, जहाँ 108 फुट ऊँची विशाल मूर्ति को भुणी के चतुरदास स्वामी और उनकी टीम ने 4 वर्षों की कड़ी मेहनत से बनाया।
इसके अलावा जयपुर के बेनाड़ में 21 फुट ऊँची महावीर स्वामी की प्रतिमा, कुचामन सिटी के कन्नोई पार्क में डॉ. भीमराव अंबेडकर की अष्टधातु मूर्ति, और जनकल्याण गोपाल गौशाला (मारोठ) में भगवान महावीर की मूर्ति भी इन्हीं कलाकारों की देन है।

⚙️ सरकारी प्रोत्साहन का अभाव
भले ही भुणी की मूर्तियाँ देश-विदेश में नाम रोशन कर रही हैं, लेकिन कलाकारों को सरकारी सहायता या प्रोत्साहन अब तक नहीं मिला है।
मूर्तिकार कानाराम प्रजापत बताते हैं कि कई बार उन्होंने सरपंच, विधायक और शिल्प एवं माटी कला बोर्ड अध्यक्ष को इस ओर ध्यान दिलाया, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
इन कलाकारों का कहना है कि अगर सरकार प्रचार-प्रसार और आर्थिक सहयोग दे तो यह कला रोजगार का बड़ा केंद्र बन सकती है।
⚡ समस्याएँ: बिजली, सड़क और स्वास्थ्य
गांव के युवा नेता नारायण वैष्णव ने बताया कि भुणी गांव हाईवे से दूर होने के कारण बिजली और सड़क की समस्या से जूझ रहा है।
मूर्तिकारों को जनरेटर चलाकर काम करना पड़ता है, जिससे खर्च बढ़ जाता है।
इसके अलावा मूर्तिकारों में सिलिकोसिस बीमारी तेजी से फैल रही है।
हितेश जैन के अनुसार, अब तक 14 लोग सिलिकोसिस से ग्रसित हो चुके हैं और 40–45 लोग बीमारी से जूझ रहे हैं।
इससे कलाकारों का मनोबल गिर रहा है और सरकार से मदद की उम्मीद भी धूमिल पड़ती जा रही है।

️ सरकार से उम्मीदें
भुणी गांव के मूर्तिकारों का कहना है कि अगर सरकार इस परंपरागत कला को “हेरिटेज क्राफ्ट ज़ोन” घोषित करे,
तो यहाँ के युवाओं को रोजगार और स्वास्थ्य दोनों का संरक्षण मिल सकेगा।
भुणी गांव अपनी कला से राजस्थान का गौरव है — जरूरत है बस प्रोत्साहन और संरक्षण की।


















































