लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
नीरज मेहरा वरिष्ठ संवाददाता
राजस्थान के स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास केवल राजाओं, रियासतों और कांग्रेस के आंदोलनों तक सीमित नहीं है। इसके समानांतर किसानों, आदिवासियों और आम जनता के अधिकारों के लिए भी संघर्ष चला। इस संघर्ष को संगठित और व्यापक स्वर देने वाले प्रमुख नामों में विजय सिंह पथिक का नाम श्रद्धा से लिया जाता है। उनका वास्तविक नाम भूप सिंह था। वे क्रांतिकारी, किसान नेता, पत्रकार, लेखक और समाज सुधारक—इन सभी भूमिकाओं में सक्रिय रहे। राजस्थान में उनका सबसे चर्चित योगदान बिजोलिया किसान आंदोलन को संगठित नेतृत्व देना था।
विजय सिंह पथिक का जन्म बुलंदशहर जिले के गुठावली गांव में हुआ था। सरकारी आजादी का अमृत महोत्सव पोर्टल उनके जन्म का वर्ष 1882 बताता है। उनके पिता का नाम हमीर सिंह और माता का नाम कमल कुंवरी बताया गया है। उनका बचपन का नाम भूप सिंह था। उनके परिवार का स्वतंत्रता संघर्ष से पुराना संबंध था। उनके दादा इंद्र सिंह ने 1857 के विद्रोह में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी और शहीद हुए थे। इस पारिवारिक पृष्ठभूमि ने भूप सिंह के मन में बचपन से ही अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह की भावना पैदा की।
जन्मतिथि को लेकर स्रोतों में मतभेद है। सरकारी पोर्टल जन्म वर्ष 1882 बताता है, जबकि कुछ अन्य स्रोत 27 फरवरी 1882 और कुछ 1888 का उल्लेख करते हैं। इसलिए तथ्यात्मक लेख में केवल 1882 लिखना अधिक सुरक्षित है।
शिक्षा-दीक्षा कहां हुई?
पथिक की औपचारिक शिक्षा बहुत लंबी नहीं रही। उपलब्ध स्रोतों के अनुसार उनकी प्रारंभिक शिक्षा मालागढ़ क्षेत्र के प्राथमिक विद्यालय में हुई। बाद में उन्होंने औपचारिक शिक्षा से अधिक स्वाध्याय को अपना माध्यम बनाया।
यही स्वाध्याय आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बना। उन्होंने हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी सहित कई भाषाओं का अध्ययन किया और इतिहास, राजनीति, दर्शन तथा साहित्य में गहरी रुचि विकसित की। सरकारी स्रोत भी उन्हें लेखक, कवि, पत्रकार और प्रभावशाली वक्ता के रूप में याद करता है।
स्वतंत्रता आंदोलन में कब उतरे?
पथिक का स्वतंत्रता संघर्ष में प्रवेश सामान्य राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में नहीं, बल्कि क्रांतिकारी के रूप में हुआ। युवावस्था में उनका संपर्क क्रांतिकारी गतिविधियों से हुआ। सरकारी स्रोत के अनुसार इंदौर में उनकी मुलाकात शचीन्द्र नाथ सान्याल से हुई और उनके माध्यम से वे रास बिहारी बोस के संपर्क में आए। इसके बाद वे क्रांतिकारी संगठन से जुड़ गए।
रास बिहारी बोस उस दौर के प्रमुख क्रांतिकारियों में थे। पथिक उनके संपर्क में रहकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र क्रांति की योजनाओं से जुड़े। कुछ ऐतिहासिक स्रोत उन्हें बंगाल की क्रांतिकारी गतिविधियों और अनुशीलन समिति से भी जोड़ते हैं।
रास बिहारी बोस से संबंध और राजस्थान आने की कहानी
पथिक के जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ वह था, जब क्रांतिकारी गतिविधियों के सिलसिले में वे ब्रिटिश सरकार की नजर में आ गए। 1915 के आसपास लाहौर षड्यंत्र मामले से उनका नाम जुड़ा और गिरफ्तारी का खतरा पैदा हुआ। इसके बाद उन्होंने अपनी पहचान बदल ली और भूप सिंह से विजय सिंह पथिक बन गए।
यहीं से उनके जीवन का राजस्थान वाला अध्याय शुरू हुआ।
बिजोलिया किसान आंदोलन : पथिक की सबसे बड़ी पहचान
राजस्थान में विजय सिंह पथिक का नाम सबसे अधिक बिजोलिया किसान आंदोलन से जुड़ा है।
बिजोलिया तत्कालीन मेवाड़ रियासत की एक जागीर थी। यहां किसानों पर भारी लगान, अनेक प्रकार के कर और बेगार जैसी व्यवस्थाओं का बोझ था। किसानों की शिकायतें पहले से चल रही थीं। साधु सीताराम दास ने आंदोलन को प्रारंभिक नेतृत्व दिया था। बाद में पथिक ने इसका नेतृत्व संभाला और बिखरे हुए किसान विरोध को संगठित आंदोलन का रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1916 के आसपास पथिक बिजोलिया आंदोलन के प्रमुख नेता के रूप में उभरे। उन्होंने किसानों को संगठित करने के लिए किसान पंचायत की व्यवस्था मजबूत की और करों तथा बेगार के खिलाफ संघर्ष को व्यापक बनाया।
इस आंदोलन की खास बात यह थी कि यह केवल स्थानीय शिकायत नहीं रह गया। पथिक ने इसे अखबारों और लेखन के माध्यम से देशभर तक पहुंचाया। किसानों की समस्याएं राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनने लगीं। आंदोलन की खबरें बाहर पहुंचने से मेवाड़ शासन पर भी दबाव बढ़ा।
क्या केवल बिजोलिया आंदोलन ही किया?
नहीं। बिजोलिया उनकी सबसे चर्चित पहचान जरूर बनी, लेकिन पथिक का काम इससे कहीं व्यापक था।
उन्होंने राजस्थान सेवा संघ के माध्यम से रियासतों की जनता में राजनीतिक चेतना पैदा करने का प्रयास किया। उन्होंने पत्रकारिता को भी संघर्ष का हथियार बनाया। ‘राजस्थान केसरी’, ‘नवीन राजस्थान’ और ‘राजस्थान संदेश’ जैसे प्रकाशनों से उन्होंने जनता की समस्याओं और रियासती अत्याचारों को सामने रखा।
उन्होंने मेवाड़ के पिछड़े इलाकों में किसानों और आदिवासी समुदायों के बीच भी काम किया तथा सामाजिक सुधार और शिक्षा पर जोर दिया। सरकारी स्रोत उनके काम को केवल राजनीतिक आंदोलन तक सीमित नहीं मानता, बल्कि सामाजिक और आर्थिक सुधारों से भी जोड़ता है।
भारत छोड़ो आंदोलन में भी भूमिका
पथिक की सक्रियता शुरुआती किसान आंदोलनों तक नहीं रुकी। उपलब्ध जीवनी स्रोतों के अनुसार उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में राजस्थान में भी नेतृत्वकारी भूमिका निभाई। इससे स्पष्ट होता है कि उनका संघर्ष रियासती अत्याचारों से लेकर व्यापक भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन तक फैला हुआ था।
पत्रकारिता को बनाया आंदोलन का हथियार
विजय सिंह पथिक की एक विशेष पहचान कलम के योद्धा की भी थी। उन्होंने किसानों और रियासतों की जनता की आवाज को अखबारों के माध्यम से व्यापक बनाया।
उनकी पत्रकारिता का उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं था। वे उसे जनजागरण और राजनीतिक चेतना का माध्यम मानते थे। उनकी लेखनी ने बिजोलिया जैसे स्थानीय किसान संघर्ष को राजस्थान से बाहर राष्ट्रीय स्तर की चर्चा तक पहुंचाने में मदद की।
वे साहित्यकार भी थे। उन्होंने कविताएं, लेख और पुस्तकें लिखीं। ‘व्हाट आर इंडियन स्टेट्स?’ जैसी रचना के माध्यम से उन्होंने देशी रियासतों की राजनीतिक व्यवस्था पर सवाल उठाए। 26 जनवरी 1930 को उन्होंने ‘झंडा गीत’ की रचना की, जो उस समय राष्ट्रवादी भावना जगाने वाले गीतों में चर्चित हुआ।
राजस्थान में आज भी श्रद्धा से क्यों लिया जाता है नाम?
विजय सिंह पथिक का राजस्थान से जन्म का संबंध नहीं था, लेकिन उन्होंने यहां की जनता के संघर्ष को अपना संघर्ष बना लिया। यही उनकी सबसे बड़ी पहचान है।
उनकी विरासत को पांच बिंदुओं में समझा जा सकता है—
- बिजोलिया किसान आंदोलन को संगठित नेतृत्व दिया।
- किसानों के कर, बेगार और शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद की।
- पत्रकारिता के जरिए रियासती जनता की समस्याओं को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया।
- राजस्थान सेवा संघ के माध्यम से राजनीतिक और सामाजिक चेतना फैलाने का प्रयास किया।
- किसान, आदिवासी, महिला शिक्षा और सामाजिक सुधार जैसे मुद्दों को स्वतंत्रता संघर्ष से जोड़ा





















































