धौली शांति स्तूप जहां युद्दभूमि से निकला शांति का संदेश, जहां आज भी मिलता सुकून

0
12
- Advertisement -

लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

नीरज मेहरा की रिपोर्ट 

भुवनेश्वर। ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से कुछ किलोमीटर दूर धौली की पहाड़ी पर पहुंचते ही इतिहास और अध्यात्म का एक अनूठा संगम दिखाई देता है। सामने सफेद रंग का विशाल धौली शांति स्तूप… चारों तरफ हरियाली… नीचे बहती दया नदी और शांत वातावरण।

यह वही धौली है, जिसे परंपरा और ऐतिहासिक स्मृतियां कलिंग युद्ध से जोड़ती हैं। लगभग 261 ईसा पूर्व हुए इस युद्ध ने मौर्य सम्राट अशोक के जीवन की दिशा बदल दी। ओडिशा पर्यटन के अनुसार, कलिंग में हुए भीषण रक्तपात से विचलित होकर अशोक ने हिंसा के बजाय शांति और धम्म की राह अपनाई।

यहीं से सम्राट अशोक के जीवन में वह परिवर्तन आया, जिसने युद्ध की भूमि को शांति के संदेश में बदल दिया।

धौली आज सिर्फ एक ऐतिहासिक स्थल नहीं है। यह ऐसा स्थान है जहां इतिहास को केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि उसके वातावरण को महसूस किया जा सकता है। कुछ देर शांति से बैठें तो शहर की भागदौड़, तनाव और मन का भारीपन जैसे कुछ समय के लिए पीछे छूटता हुआ महसूस होता है।

कलिंग युद्ध ने क्यों बदल दिया अशोक का जीवन?

मौर्य साम्राज्य के विस्तार के दौर में कलिंग एक स्वतंत्र और महत्वपूर्ण क्षेत्र था। अशोक ने इसे अपने साम्राज्य में मिलाने के लिए युद्ध किया। युद्ध बेहद भीषण था और इसके बाद हुए रक्तपात ने अशोक को गहरे स्तर पर प्रभावित किया।

ओडिशा पर्यटन के ऐतिहासिक विवरण में 261 ईसा पूर्व के कलिंग युद्ध को अशोक के जीवन का निर्णायक मोड़ बताया गया है। इसी युद्ध के बाद उनके व्यक्तित्व में ‘चंडाशोक’ से ‘धर्माशोक’ की ओर परिवर्तन की परंपरा प्रसिद्ध हुई।

अशोक ने बाद के दौर में बौद्ध धर्म की शिक्षाओं और धम्म के सिद्धांतों को अपनाया तथा शांति, करुणा और प्रजा-कल्याण पर जोर दिया।

धौली की खासियत यही है कि यहां विजय की कहानी से ज्यादा उस विजय के बाद पैदा हुए पश्चाताप और परिवर्तन की कहानी सुनाई देती है।

एक विजेता राजा ने युद्ध जीता था…

लेकिन युद्ध के बाद उसने यह महसूस किया कि तलवार से हासिल की गई जीत के पीछे इंसानी पीड़ा कितनी बड़ी कीमत लेकर आती है।

यही भाव धौली को भारत के महत्वपूर्ण शांति स्थलों में शामिल करता है।

धौली में आज भी मौजूद हैं अशोक के शिलालेख

धौली की ऐतिहासिक महत्ता केवल शांति स्तूप तक सीमित नहीं है।

यहां सम्राट अशोक के शिलालेख भी मौजूद हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अभिलेखों में धौली स्थित अशोक के रॉक एडिक्ट और हाथी की शैलाकृति को संरक्षित स्मारकों में दर्ज किया गया है।

इन शिलालेखों में अशोक के शासन, प्रशासन और प्रजा के प्रति उनके दृष्टिकोण से जुड़े संदेश मिलते हैं।

विशेष बात यह है कि धौली के अशोक शिलालेख उनके शासन में आए बदलाव की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि समझने में महत्वपूर्ण माने जाते हैं। ओडिशा पर्यटन के अनुसार, यहां के शिलालेखों में प्रशासन में अधिक मानवीय और न्यायपूर्ण दृष्टिकोण की झलक मिलती है।

चट्टान से निकलता विशाल हाथी भी है खास

धौली के शिलालेखों के ऊपर बनी विशाल शैल-कट हाथी की आकृति यहां आने वाले पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण है।

चट्टान से बाहर आते हुए हाथी की यह आकृति प्राचीन भारतीय शिल्पकला का महत्वपूर्ण उदाहरण मानी जाती है। ओडिशा पर्यटन इसे राज्य की प्राचीन बौद्ध विरासत से जुड़े प्रमुख आकर्षणों में गिनाता है।

एक तरफ अशोक के शिलालेख…दूसरी तरफ चट्टान से उभरता हाथी…और ऊपर पहाड़ी पर सफेद शांति स्तूप।तीनों मिलकर धौली की ऐतिहासिक पहचान को अलग रूप देते हैं।

धौली शांति स्तूप क्या है?

जिस सफेद स्तूप को आज दुनिया धौली शांति स्तूप या पीस पैगोडा के नाम से जानती है, वह प्राचीन अशोककालीन निर्माण नहीं है।

वर्तमान धौली शांति स्तूप का निर्माण 1972 में जापान बुद्ध संघ और कलिंग निप्पॉन बुद्ध संघ के सहयोग से हुआ था। इसका उद्देश्य कलिंग युद्ध की भूमि पर शांति के संदेश को स्मरण और प्रसारित करना था। यानी…कलिंग की धरती पर कभी युद्ध हुआ था, लेकिन उसी धरती को बाद में शांति के प्रतीक के रूप में विकसित किया गया।

यही विरोधाभास धौली को असाधारण बनाता है। जहां कभी युद्ध की स्मृतियां जुड़ी हैं, वहीं आज सफेद स्तूप शांति, अहिंसा और करुणा का संदेश देता दिखाई देता है।

किस शैली में बना है धौली का शांति स्तूप?

धौली शांति स्तूप को सामान्य तौर पर बौद्ध स्तूप और जापानी शैली से प्रभावित पीस पैगोडा के रूप में देखा जाता है।इसका चमकदार सफेद स्वरूप दूर से ही ध्यान आकर्षित करता है। गोलाकार गुंबदनुमा मुख्य संरचना, ऊपरी भाग की शिखर-सदृश रचना, चारों ओर बुद्ध से जुड़े प्रतीकात्मक दृश्य और खुला परिसर इसे पारंपरिक भारतीय मंदिरों से अलग पहचान देते हैं।

इसे ओडिशा के पारंपरिक कलिंग मंदिर स्थापत्य के रूप में समझना उचित नहीं होगा। ओडिशा पर्यटन के अनुसार, कलिंग वास्तुकला का विकसित रूप मुख्यतः छठी से सोलहवीं शताब्दी के बीच मंदिर स्थापत्य में दिखाई देता है, जबकि धौली शांति स्तूप आधुनिक काल में निर्मित बौद्ध शांति स्मारक है। इसलिए इसकी सबसे सटीक पहचान है—

आधुनिक बौद्ध शांति वास्तुकला, जिसमें जापानी पीस पैगोडा की शैली का प्रभाव दिखाई देता है।

भगवान बुद्ध की प्रतिमाएं और स्तूप का आध्यात्मिक वातावरण

शांति स्तूप परिसर में बुद्ध से संबंधित प्रतिमाएं और प्रतीकात्मक दृश्य वातावरण को आध्यात्मिक स्वर देते हैं।

सफेद रंग का विशाल ढांचा… ऊंचाई पर स्थित परिसर…चारों ओर खुला आकाश… नीचे दिखाई देती हरियाली…और दूर तक फैला शांत प्राकृतिक परिवेश। इन सबका प्रभाव ऐसा है कि यहां आने वाला व्यक्ति कुछ देर के लिए अपने आसपास की भागदौड़ से अलग महसूस कर सकता है।

यह अनुभव केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा नहीं है। इतिहास में रुचि रखने वाला व्यक्ति यहां अशोक के परिवर्तन को याद करता है, बौद्ध अनुयायी इसे शांति के संदेश से जोड़ता है और सामान्य पर्यटक यहां के शांत वातावरण में कुछ समय बिताना पसंद करता है। इसीलिए धौली की पहचान केवल एक पर्यटन स्थल के रूप में नहीं, बल्कि इतिहास और आत्मिक शांति के मिलन-बिंदु के रूप में भी बनी है।

दया नदी और धौली का इतिहास

धौली पहाड़ी के आसपास का भूगोल भी इसकी ऐतिहासिक कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां से दया नदी का क्षेत्र दिखाई देता है और कलिंग युद्ध की स्मृतियां इसी भूभाग से जुड़ी हुई हैं।

लोकप्रिय ऐतिहासिक वर्णनों में युद्ध के बाद दया नदी के लाल होने की कथा कही जाती है। हालांकि इसे ऐतिहासिक तथ्य के बजाय लोकप्रिय परंपरा/किंवदंती के रूप में देखना अधिक उचित है। ओडिशा पर्यटन भी इसे लोकप्रिय किंवदंती के रूप में प्रस्तुत करता है। इतिहास और लोककथा के बीच यही धौली का एक और आकर्षण है।

कुछ देर यहां बैठिए… शायद भीतर का शोर कम लगे

धौली की यात्रा केवल स्मारकों को देखने की यात्रा नहीं है। शांति स्तूप की सीढ़ियों या आसपास के शांत परिसर में कुछ देर बैठकर सामने के दृश्य को देखिए।  यहां कोई तेज आवाज नहीं…शहर का शोर पीछे छूट जाता है… हवा का हल्का स्पर्श… सफेद स्तूप की शांत उपस्थिति… और सामने इतिहास की वह कहानी, जिसमें एक सम्राट ने युद्ध की विभीषिका देखने के बाद अपने शासन की दिशा बदलने का संकल्प लिया। शायद यही वजह है कि यहां बैठने पर कई लोगों को भीतर एक अलग तरह का सुकून महसूस होता है। कुछ मिनटों के लिए ही सही… मन का भारीपन कम लगता है।और यह एहसास होता है कि हजारों साल पुरानी एक घटना आज भी इंसान को यह याद दिला सकती है कि विजय से बड़ा मूल्य शांति का हो सकता है।

धौली क्यों जाएं?

भुवनेश्वर आने वाले पर्यटकों के लिए धौली इसलिए खास है क्योंकि यहां एक ही स्थान पर कई परतें दिखाई देती हैं—

कलिंग युद्ध का इतिहास।
सम्राट अशोक के शिलालेख।
प्राचीन शैल-कट हाथी।
बौद्ध विरासत।
1972 का शांति स्तूप।
दया नदी का प्राकृतिक परिवेश।
और सबसे बढ़कर…युद्ध से शांति की ओर परिवर्तन की कहानी। धौली भुवनेश्वर से लगभग 8 किलोमीटर दक्षिण की ओर स्थित है और ओडिशा के प्रमुख बौद्ध एवं ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों में शामिल है।

इतिहास का सबसे बड़ा संदेश

धौली की पहाड़ी पर खड़ा सफेद शांति स्तूप केवल पत्थर और वास्तुकला का ढांचा नहीं है। यह एक विचार का प्रतीक है।एक ऐसी ऐतिहासिक घटना का प्रतीक, जिसने भारतीय इतिहास के सबसे शक्तिशाली शासकों में से एक की सोच बदलने की कहानी को जन्म दिया।

सम्राट अशोक ने कलिंग को जीत लिया था…

लेकिन युद्ध के बाद उन्हें जिस चीज ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया, वह जीत नहीं बल्कि युद्ध की मानवीय कीमत थी।और यहीं से उनकी पहचान के साथ जुड़ा एक नया अध्याय सामने आया—

चंडाशोक से धर्माशोक तक का परिवर्तन।

आज उसी धौली की पहाड़ी पर सफेद शांति स्तूप खड़ा है। मानो इतिहास खुद कह रहा हो—

युद्ध की स्मृति को भी शांति के संदेश में बदला जा सकता है।

यहीं से सम्राट अशोक के जीवन में वह परिवर्तन आया, जिसने युद्ध की भूमि को शांति के संदेश में बदल दिया।

और शायद यही धौली की सबसे बड़ी खूबसूरती है—
यह जगह इतिहास सुनाती भी है… और कुछ पल के लिए मन को शांत करना भी सिखाती है।

- Advertisement -

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here