लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
‘चांदुआ’ कला,का जगन्नाथ संस्कृति से गहरा रिश्ता
पुरी के करीब बसे पिपली गांव में कपड़े के टुकड़ों से तैयार होती है अनूठी ‘चांदुआ’ कला
भगवान भगवान जगन्नाथ संस्कृति से गहरा रिश्ता
नीरज मेहरा
भुवनेश्वर/पिपली। भुवनेश्वर से पुरी की ओर जाने वाले रास्ते पर स्थित पिपली सिर्फ एक कस्बा नहीं, बल्कि ओडिशा की समृद्ध हस्तशिल्प परंपरा का ऐसा केंद्र है, जहां रंग-बिरंगे कपड़ों में सदियों पुरानी संस्कृति आज भी सांस लेती दिखाई देती है। यहां तैयार होने वाली पिपली एप्लीक कला, जिसे स्थानीय रूप से ‘चांदुआ’ कहा जाता है, कपड़े पर रंगीन कपड़ों की आकृतियां काटकर और उन्हें सिलकर तैयार की जाती है।
दीवारों पर सजने वाली वॉल हैंगिंग से लेकर छतरियां, लैंपशेड, बैग, पाउच, बेडस्प्रेड और सजावटी वस्तुओं तक इस कला का विस्तार हो चुका है। ओडिशा पर्यटन विभाग भी पिपली को अपने प्रमुख हेरिटेज क्राफ्ट गांवों में शामिल करता है और बताता है कि एप्लीक कला का इस्तेमाल भगवान जगन्नाथ और उनके भाई-बहन के रथों तथा धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़ी सजावट में होता है।
यह पटचित्र नहीं, पिपली की अपनी एप्लीक कला है
पिपली को लेकर अक्सर एक भ्रम देखने को मिलता है। पिपली की प्रसिद्ध कला पटचित्र नहीं, बल्कि एप्लीक वर्क है। ओडिशा की पटचित्र कला का प्रमुख केंद्र रघुराजपुर माना जाता है, जबकि पिपली की पहचान रंगीन कपड़ों को काटकर, सजाकर और सिलकर बनाई जाने वाली एप्लीक कला से है।
इस कला में अलग-अलग रंगों के कपड़े को मनचाही आकृति में काटकर आधार कपड़े पर सिल दिया जाता है। फूल, पक्षी, पशु, पेड़-पौधे, ज्यामितीय आकृतियां और धार्मिक प्रतीक इसके प्रमुख डिजाइन तत्वों में शामिल हैं। यही हाथ की सिलाई और रंगों का संयोजन पिपली के उत्पादों को अलग पहचान देता है।
ओडिशा क्राफ्ट्स म्यूजियम के अनुसार पिपली चांदुआ की पहचान भगवान जगन्नाथ की संस्कृति और रथयात्रा में इस्तेमाल होने वाले कपड़ों से विशेष रूप से जुड़ी है।
जगन्नाथ संस्कृति से जुड़ी है पिपली की पहचान
पिपली की एप्लीक कला की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका जगन्नाथ संस्कृति से संबंध है। ओडिशा पर्यटन विभाग के अनुसार पिपली में तैयार एप्लीक का इस्तेमाल भगवान जगन्नाथ और उनके भाई-बहन के रथों को सजाने के साथ अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में भी होता है।
पुराने ओडिशा सरकारी प्रकाशनों में भी बताया गया है कि एप्लीक से तैयार वस्तुएं भगवान जगन्नाथ की परंपराओं और धार्मिक जुलूसों में इस्तेमाल होती रही हैं। रथों के कपड़ों में रंग और डिजाइन का अपना धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व रहा है।
यानी पिपली की कला महज बाजार में बिकने वाला सजावटी सामान नहीं है। इसके पीछे ओडिशा की धार्मिक परंपरा, स्थानीय शिल्प और पीढ़ियों से चले आ रहे कलाकारों का हुनर जुड़ा हुआ है।

सदियों से बदलते दौर के साथ खुद को ढालती रही कला
पिपली एप्लीक के इतिहास को लेकर अलग-अलग स्रोतों में अलग-अलग कालखंडों का उल्लेख मिलता है। ओडिशा पर्यटन विभाग पिपली को प्राचीन शिल्प परंपरा से जोड़ता है, जबकि ओडिशा सरकार के पुराने प्रकाशन में इतिहासकार जगन्नाथ पटनायक के हवाले से एप्लीक शिल्प की परंपरा को करीब 850 वर्ष पुराना बताया गया है।
समय के साथ इस कला ने भी अपना स्वरूप बदला। पहले जहां इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से धार्मिक और पारंपरिक जरूरतों में होता था, वहीं अब यही तकनीक आधुनिक घरेलू सजावट और उपयोगी उत्पादों में दिखाई देती है।
आज पिपली में पारंपरिक डिजाइन के साथ आधुनिक जरूरतों को ध्यान में रखकर भी उत्पाद तैयार किए जाते हैं। यही वजह है कि यह कला धार्मिक परंपरा से निकलकर हस्तशिल्प और होम डेकोर के बाजार तक पहुंची है।

GI टैग ने दी आधिकारिक पहचान
पिपली एप्लीक वर्क के लिए Geographical Indication यानी GI पहचान एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। ओडिशा सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग ने सितंबर 2022 के अपने आधिकारिक प्रकाशन में स्पष्ट किया था कि पिपली एप्लीक वर्क को GI पंजीकरण प्राप्त हो चुका है। सरकार ने GI व्यवस्था को उत्पाद की विशिष्टता की रक्षा, अनधिकृत उपयोग रोकने तथा कारीगरों और उपभोक्ताओं के हितों की सुरक्षा से भी जोड़ा है।
ओडिशा क्राफ्ट्स म्यूजियम की वेबसाइट भी पिपली एप्लीक वर्क को GI उत्पाद के रूप में दर्ज करती है और इसे GI Application No. 86 से जोड़ती है।
GI टैग का मूल महत्व यह है कि किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र से जुड़े विशिष्ट उत्पाद की पहचान और उसकी प्रतिष्ठा को कानूनी संरक्षण मिलता है। लेकिन GI टैग अपने आप कलाकार की आमदनी बढ़ाने की गारंटी नहीं देता। इसके लिए बाजार, ब्रांडिंग, बिक्री, प्रमाणिकता और उपभोक्ताओं तक सीधी पहुंच जैसी व्यवस्थाएं भी जरूरी होती हैं।
कलाकारों की उम्मीद—अब दुनिया तक पहुंचे पिपली
पिपली के कलाकारों के लिए GI पहचान उम्मीद की एक नई वजह है। उनका मानना है कि जब किसी पारंपरिक कला को आधिकारिक पहचान मिलती है तो उसके उत्पादों की विश्वसनीयता बढ़ती है और देश-विदेश के खरीदारों तक पहुंच बनाने का रास्ता खुलता है।
लेकिन कलाकारों के सामने सवाल यह भी है कि पहचान का वास्तविक फायदा उनके परिवारों तक कैसे पहुंचे?
कई कलाकार आज भी छोटे स्तर पर काम करते हैं। उत्पादन में उनका अपना श्रम, परिवार के सदस्यों की मेहनत और वर्षों से सीखा हुआ कौशल शामिल होता है। ऐसे में उत्पाद की अंतिम कीमत और कलाकार को मिलने वाली वास्तविक राशि के बीच अंतर उनके लिए बड़ी चुनौती बन जाता है।

‘दलालों’ की शिकायत, सीधे बाजार से जोड़ने की मांग
कलाकारों की शिकायत है कि हस्तशिल्प मेलों और बाजारों तक पहुंच बनाने की प्रक्रिया में कई बार बिचौलियों की भूमिका बढ़ जाती है। इससे अंतिम ग्राहक द्वारा चुकाई गई कीमत का पूरा लाभ मूल कारीगर तक नहीं पहुंच पाता।
इसीलिए कलाकारों की मांग है कि सरकार ऐसी व्यवस्था विकसित करे जिसमें वे सीधे खरीदारों, संस्थानों और बड़े बाजारों से जुड़ सकें।
ऑनलाइन मार्केटप्लेस, सरकारी एम्पोरियम, पर्यटन केंद्र, एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशनों पर बिक्री केंद्र, अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियां तथा बड़े कॉरपोरेट और संस्थागत खरीदारों से सीधे संपर्क जैसे रास्ते इस कला के लिए बाजार बढ़ाने में मददगार हो सकते हैं।

GI के बाद अगली चुनौती—ब्रांडिंग और बाजार
पिपली की असली चुनौती अब केवल अपनी कला को बचाए रखना नहीं है। चुनौती यह है कि इस कला को आर्थिक रूप से टिकाऊ कैसे बनाया जाए।
यदि GI पहचान के साथ मजबूत ब्रांडिंग की जाए, असली पिपली उत्पाद की पहचान आसान बनाई जाए और कलाकारों को डिजिटल बिक्री से जोड़ा जाए तो देश के बड़े शहरों के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी मांग बढ़ सकती है।
ओडिशा सरकार ने भी GI उत्पादों की ब्रांडिंग और अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान बढ़ाने को GI व्यवस्था के महत्वपूर्ण लाभों में शामिल किया है।
सरकार से कलाकारों की अपेक्षाएं
पिपली के कलाकार चाहते हैं कि सरकार इस कला को केवल पर्यटन और मेलों की शोभा तक सीमित न रखे, बल्कि इसे रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार बनाने की दिशा में काम करे।
कलाकारों के लिए कुछ महत्वपूर्ण जरूरतें हैं—
- GI उत्पाद की प्रमाणिक पहचान और जागरूकता बढ़ाना।
- कलाकारों को सीधे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ना।
- ऑनलाइन बिक्री और डिजिटल मार्केटिंग का प्रशिक्षण देना।
- सरकारी और निजी संस्थानों की खरीद में स्थानीय GI उत्पादों को बढ़ावा देना।
- डिजाइन और उत्पाद विकास के लिए प्रशिक्षण उपलब्ध कराना।
- युवाओं को इस पारंपरिक कला से जोड़ने के लिए कौशल कार्यक्रम चलाना।
- हस्तशिल्प मेलों में वास्तविक कलाकारों की भागीदारी सुनिश्चित करना।
- बिचौलियों पर निर्भरता घटाकर कलाकारों को बेहतर मूल्य दिलाना।

विरासत बचेगी तो रोजगार भी बचेगा
पिपली की कहानी केवल एक कला की कहानी नहीं है। यह उन परिवारों की कहानी है जिनकी पीढ़ियां कपड़े, सुई, धागे और रंगों के सहारे अपनी जिंदगी चलाती आई हैं।
आज पिपली के सामने दो तस्वीरें एक साथ खड़ी हैं। एक तरफ GI टैग और अंतरराष्ट्रीय बाजार की संभावनाओं से पैदा हुई उम्मीद है, दूसरी तरफ कलाकारों की रोजमर्रा की आर्थिक चुनौतियां।
पहचान मिल चुकी है, अब उस पहचान को सम्मानजनक आय में बदलने की जरूरत है।
अगर सरकार, बाजार और उपभोक्ता मिलकर पिपली के कलाकारों तक सीधे पहुंच बनाते हैं, तो यह कला केवल संग्रहालयों और पर्यटन स्थलों की शोभा नहीं रहेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए रोजगार का मजबूत जरिया भी बन सकती है।
पिपली के कलाकारों के हाथों में आज भी वही रंग हैं, वही सुई-धागा है और वही पीढ़ियों पुराना हुनर है। जरूरत सिर्फ इतनी है कि उनके हुनर की कीमत तय करने वाला बाजार उनके हाथ से दूर न हो।




















































