पश्चिमी राजस्थान में गोवंश संकट में ,गहलोत का सरकार पर हमला

0
13
- Advertisement -

लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

गहलोत  बोले- घोषणाएं हुईं, चारा डिपो और पशु शिविर अब तक नहीं

जयपुर। पश्चिमी राजस्थान में सूखे और चारे-पानी के संकट को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राज्य की भजनलाल शर्मा सरकार पर तीखा हमला बोला है। गहलोत ने आरोप लगाया कि पश्चिमी राजस्थान में गोवंश भूख और प्यास से जूझ रहा है, लेकिन सरकार केवल घोषणाएं कर रही है। उनका कहना है कि 30 सितंबर को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने बाड़मेर में चारा डिपो खोलने की घोषणा की थी, लेकिन आठ दिन बाद भी जमीनी स्तर पर न तो चारा डिपो शुरू हुए और न ही पशु शिविर।

गहलोत ने कहा कि अखबार सूखे और अकाल जैसी परिस्थितियों की खबरों से भरे पड़े हैं, ग्रामीण इलाकों में पशुधन के सामने चारे-पानी का संकट लगातार गहराता जा रहा है, लेकिन सरकार की ओर से प्रभावी राहत दिखाई नहीं दे रही।

घोषणा के आठ दिन बाद भी इंतजार

गहलोत के मुताबिक बाड़मेर के सीमावर्ती इलाकों में हालात गंभीर हैं। गडरारोड क्षेत्र में स्थानीय प्रशासन की ओर से 23 पटवार मंडलों में चारा डिपो खोलने के प्रस्ताव भेजे जाने की बात कही जा रही है, लेकिन अभी तक मंजूरी नहीं मिली है।

यहीं से सरकार के सामने बड़ा सवाल खड़ा होता है—यदि सूखे के हालात इतने गंभीर हैं तो राहत व्यवस्था जमीन पर क्यों नहीं पहुंची?

गहलोत ने प्रशासन की ओर से आचार संहिता का हवाला दिए जाने पर भी सवाल उठाया। उनका तर्क है कि सूखे के संकेत पहले से दिखाई दे रहे थे तो आचार संहिता लागू होने से पहले राहत की तैयारियां क्यों नहीं की गईं? और यदि अब आचार संहिता राहत कार्यों में बाधा बन रही है तो निर्वाचन आयोग से आवश्यक अनुमति क्यों नहीं मांगी गई?

गांवों में चारे का संकट, महंगा हुआ पशु आहार

स्थानीय ग्रामीणों के हवाले से गहलोत ने दावा किया कि पश्चिमी राजस्थान के कई गांवों में स्थिति चिंताजनक है। ग्रामीणों के अनुसार कई स्थानों पर गोवंश की मौतें हुई हैं और पशु प्लास्टिक तथा कचरा खाने को मजबूर हैं।

चारे की कीमतों में भी तेजी की बात सामने आ रही है। ग्रामीणों के मुताबिक कई इलाकों में चारा सामान्य कीमतों के मुकाबले करीब तीन गुना तक महंगा हो गया है। साथ ही चारे की जमाखोरी की शिकायतें भी सामने आ रही हैं।

अगर ये दावे सही हैं, तो सवाल सिर्फ सरकारी घोषणा का नहीं बल्कि पशुधन को तत्काल राहत पहुंचाने की व्यवस्था और बाजार में चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने का भी है।

गौशालाओं के सामने भी आर्थिक संकट

गोवंश को लेकर सरकारी सहायता व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है। गहलोत के मुताबिक गौशालाओं को बड़े पशु के लिए सरकार की ओर से 50 रुपये प्रतिदिन दिए जाते हैं, जबकि गौशाला संचालकों का दावा है कि एक पशु पर रोजाना 100 से 150 रुपये तक खर्च हो रहा है।

यानी सरकारी सहायता और वास्तविक खर्च के बीच बड़ा अंतर है।

इसके अलावा गौशालाओं के संचालकों की ओर से अनुदान समय पर नहीं मिलने की शिकायतें भी सामने आने की बात कही जा रही है। ऐसे में सूखे की स्थिति में गौशालाओं पर अतिरिक्त दबाव बढ़ना स्वाभाविक है।

भाजपा विधायक ने भी उठाई सूखे की मांग

इस पूरे मामले में राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बात यह है कि जैसलमेर से भाजपा विधायक भी सरकार से तत्काल सूखा घोषित करने की मांग कर चुके हैं।

यानी विपक्ष के आरोपों के साथ-साथ सत्तारूढ़ दल के भीतर से भी पश्चिमी राजस्थान की परिस्थितियों को लेकर चिंता सामने आ रही है। इससे सरकार पर राहत कार्यों को लेकर दबाव और बढ़ गया है।

गहलोत का सरकार पर सीधा निशाना

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि जब जमीन पर पशुधन चारे और पानी के लिए संघर्ष कर रहा है, तब केवल घोषणाओं से समस्या का समाधान नहीं होगा।

उन्होंने सरकार से तत्काल प्रभाव से सूखा घोषित करने, चारा डिपो और पशु शिविर शुरू करने तथा टैंकरों के माध्यम से प्रभावित क्षेत्रों में पानी पहुंचाने की मांग की है।

गहलोत का सवाल सीधे सरकार से है—अगर परिस्थितियां गंभीर हैं तो राहत जमीन पर कब पहुंचेगी?

पश्चिमी राजस्थान में बारिश की कमी, महंगे चारे और पेयजल संकट के बीच अब सबसे बड़ा मुद्दा सिर्फ फसल का नहीं, बल्कि पशुधन को बचाने का भी बनता जा रहा है।

सरकार के सामने चुनौती साफ है—घोषणाओं से आगे बढ़कर राहत का असर गांवों तक पहुंचाना। वहीं विपक्ष लगातार इस मुद्दे को राजनीतिक तौर पर उठा रहा है।

अब निगाह इस बात पर है कि सरकार चारा डिपो, पशु शिविर और पानी की व्यवस्था को लेकर क्या कदम उठाती है और आचार संहिता के बीच राहत कार्यों के लिए निर्वाचन आयोग से किस तरह अनुमति लेती है।

- Advertisement -

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here