लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
नकली खाद के आरोप पर सबूत मांग रहे पूर्व सीएम
जोधपुर में मुख्यमंत्री ने गहलोत पर किसानों को खाद-बीज के नाम पर लूटने का आरोप लगाया, पूर्व सीएम ने कहा—सबूत दें या माफी मांगें
लोक टुडे | राजनीतिक विश्लेषण
राजस्थान की सियासत में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। जोधपुर में सभा के दौरान भजनलाल शर्मा ने गहलोत के पुराने खाद-बीज कारोबार को निशाने पर लेते हुए किसानों को कथित तौर पर लूटने और नकली खाद-बीज बेचने के आरोप लगाए। गहलोत ने पलटवार करते हुए मुख्यमंत्री से आरोपों के प्रमाण सार्वजनिक करने या माफी मांगने की मांग की है।
इस विवाद के केंद्र में गहलोत की करीब पांच दशक पुरानी खाद-बीज की दुकान है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, गहलोत ने पढ़ाई पूरी करने के बाद 1972-73 के आसपास जोधपुर जिले के पीपाड़ कस्बे में कुछ समय खाद-बीज का कारोबार किया था। इसके बाद वे छात्र राजनीति, एनएसयूआई और कांग्रेस से जुड़कर राजनीतिक सफर में आगे बढ़े।
लेकिन अब इसी पुराने कारोबार को लेकर मुख्यमंत्री ने गंभीर आरोप लगाए हैं। सवाल यह है कि क्या गहलोत की दुकान पर नकली खाद-बीज पकड़े जाने का कोई प्रमाण है? और क्या उस समय लागू कानूनों के आधार पर ऐसी कार्रवाई हुई थी?
1972 की दुकान, 1983-85 के कानून और आरोपों पर सवाल
गहलोत की दुकान का शुरुआती दौर 1972-73 का बताया जाता है, जबकि बीज नियंत्रण आदेश 1983 में आया और उर्वरक नियंत्रण आदेश 1985 में लागू हुआ।
बीज अधिनियम 1966 में बना था। बीज नियंत्रण आदेश 1983 ने बीज विक्रेताओं और बिक्री पर नियंत्रण की व्यवस्था की, जबकि उर्वरक नियंत्रण आदेश 1985 में खाद की गुणवत्ता, बिक्री, लाइसेंस और निरीक्षण से जुड़े प्रावधान लागू हुए।
इसलिए 1983 और 1985 के आदेशों को आधार बनाकर 1972 में कार्रवाई होने का दावा नहीं किया जा सकता। हालांकि इसका अर्थ यह भी नहीं है कि उस समय खाद-बीज पर कोई कानूनी नियंत्रण था ही नहीं। पुराने कानूनों और उस समय लागू व्यवस्था के तहत कार्रवाई की संभावना अलग से जांच का विषय है।
सबसे अहम सवाल यह है कि क्या गहलोत की पीपाड़ स्थित दुकान पर नकली खाद-बीज पकड़ा गया था?
उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी में दुकान पर छापे, जब्ती सूची, नमूना जांच रिपोर्ट या एफआईआर का ऐसा प्रमाण सामने नहीं आया है, जिससे मुख्यमंत्री के आरोप की पुष्टि हो सके। इसलिए आरोप को स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
गहलोत ने मांगे सबूत, माफी की चुनौती
मुख्यमंत्री के आरोपों पर अशोक गहलोत ने सवाल उठाते हुए कहा कि भजनलाल शर्मा आरोपों के प्रमाण सार्वजनिक करें, अन्यथा माफी मांगें।
गहलोत का तर्क है कि उनके पुराने कारोबार को लेकर किसानों को लूटने और नकली खाद-बीज बेचने जैसे गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं, लेकिन इनके समर्थन में प्रमाण सामने नहीं रखे गए हैं।
यह विवाद अब केवल पुराने कारोबार तक सीमित नहीं रहा। इसमें राजनीतिक आरोपों की विश्वसनीयता और सार्वजनिक जीवन में प्रमाण की अहमियत भी जुड़ गई है।
गहलोत के भाई के कारोबार और पुराने दुकान के बीच अंतर
इस विवाद में गहलोत के भाई अग्रसेन गहलोत के खाद कारोबार और गहलोत की पीपाड़ स्थित पुरानी दुकान का अंतर भी महत्वपूर्ण है।
जोधपुर के पावटा स्थित ‘अनुपम कृषि’ कारोबार को अशोक गहलोत की पीपाड़ वाली दुकान के समान बताना सही नहीं होगा। किसी दूसरे कारोबारी प्रतिष्ठान पर हुई कार्रवाई को गहलोत की पुरानी दुकान से जोड़ने के लिए दोनों के बीच संबंध और आरोपों का दस्तावेजी प्रमाण जरूरी है।
किसी व्यक्ति के परिवार के कारोबार पर कार्रवाई होना और उसी व्यक्ति की पुरानी दुकान पर नकली खाद पकड़ा जाना दो अलग-अलग तथ्य हैं।
सीएमओ विवाद के बाद गहलोत पर सीधा हमला?
अशोक गहलोत पिछले दिनों मुख्यमंत्री कार्यालय की कार्यप्रणाली, अधिकारियों के बीच कथित विवाद, आईएएस अधिकारियों की भूमिका और पुलिस अधिकारियों के तबादलों को लेकर सरकार पर सवाल उठाते रहे हैं। सीएमओ में कथित खींचतान और अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर उनके बयान भी राजनीतिक चर्चा में रहे हैं।
ऐसे माहौल में जोधपुर की सभा में मुख्यमंत्री का गहलोत पर व्यक्तिगत हमला राजनीतिक जवाबी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
जोधपुर गहलोत का गृह क्षेत्र और सरदारपुरा उनका विधानसभा क्षेत्र है। ऐसे इलाके में उनके पुराने कारोबार को लेकर आरोप लगाना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। इससे भाजपा गहलोत की व्यक्तिगत छवि और कांग्रेस के किसान हितैषी दावों को चुनौती देने की कोशिश कर सकती है।
हालांकि यह कहना कि मुख्यमंत्री ने केवल गहलोत के सीएमओ संबंधी आरोपों का जवाब देने के लिए यह हमला किया, अभी राजनीतिक विश्लेषण ही है। इसकी पुष्टि किसी प्रत्यक्ष बयान या दस्तावेज से नहीं होती।
किसानों के मुद्दे पर सियासी मुकाबला
राजस्थान में खाद, बीज, सिंचाई और कृषि योजनाएं ग्रामीण मतदाताओं से सीधे जुड़ी हैं। ऐसे में किसानों को कथित रूप से लूटने का आरोप किसी नेता की राजनीतिक छवि पर बड़ा असर डाल सकता है।
भजनलाल शर्मा का हमला गहलोत की सादगी और ईमानदार छवि को चुनौती देने की रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है। लेकिन किसी नेता की छवि आरोपों से नहीं, प्रमाणित तथ्यों से तय होती है।
यदि मुख्यमंत्री के पास नकली खाद-बीज बिक्री, किसानों को नुकसान, छापेमारी या कालाबाजारी से जुड़े दस्तावेज हैं, तो उन्हें सार्वजनिक करना चाहिए। वहीं गहलोत की चुनौती का जवाब भी दस्तावेजों और जांच रिकॉर्ड के जरिए ही दिया जा सकता है।
आरोप गंभीर, प्रमाण जरूरी
इस पूरे विवाद में कानून की तारीखें, पुराने कारोबार का समय और कार्रवाई के प्रमाण सबसे महत्वपूर्ण हैं।
बीज अधिनियम 1966, बीज नियंत्रण आदेश 1983 और उर्वरक नियंत्रण आदेश 1985 से खाद-बीज की गुणवत्ता और बिक्री पर नियंत्रण की व्यवस्था विकसित हुई। लेकिन इन कानूनों की तारीखों से यह साबित नहीं होता कि गहलोत की दुकान पर नकली खाद-बीज पकड़ा गया था।
इसके लिए दुकान का नाम-पता, छापे की तारीख, कृषि विभाग की जब्ती सूची, नमूना जांच रिपोर्ट, एफआईआर या अदालत का रिकॉर्ड सामने आना जरूरी है।
राजनीतिक आरोप अपनी जगह हैं, लेकिन नकली खाद-बीज बेचने का दावा तभी तथ्य बनेगा, जब उसके समर्थन में प्रमाण हों।
गहलोत और भजनलाल के बीच बढ़ती तल्खी राजस्थान की राजनीति में नया विवाद जरूर खड़ा कर रही है, लेकिन इस विवाद का निर्णायक जवाब भाषणों से नहीं, दस्तावेजों से ही मिलेगा।


















































