महाराजा अग्रसेन ने ‘एक ईंट, एक रुपया’ से दिया सामाजिक समरसता का संदेश

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

समानता, अहिंसा और परस्पर सहयोग के प्रतीक थे महाराजा अग्रसेन; जयंती पर समाज के हर वर्ग को उनके आदर्शों से प्रेरणा लेने का आह्वान

जयपुर। महाराजा अग्रसेन जी को सामाजिक समरसता, समानता, अहिंसा और परस्पर सहयोग की भावना का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने समाज में ऐसी व्यवस्था की कल्पना प्रस्तुत की, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान के साथ आगे बढ़ने का अवसर मिले। उनकी ओर से प्रचलित मानी जाने वाली ‘एक ईंट, एक रुपया’ की परंपरा आज भी सामाजिक सहयोग, आत्मनिर्भरता और सामूहिक जिम्मेदारी का संदेश देती है। महाराजा अग्रसेन जी की जयंती के अवसर पर अखिल भारतीय वैश्य अग्रवाल महासभा के राष्ट्रीय मंत्री सुजीत सिंहल ने समाज के सभी वर्गों से उनके आदर्शों को अपनाने और जरूरतमंद लोगों की सहायता के लिए आगे आने का आह्वान किया।

अग्रोहा को बनाया समृद्ध राज्य की राजधानी

परंपरागत मान्यताओं के अनुसार, महाराजा अग्रसेन जी का जन्म सूर्यवंशी महाराजा वल्लभ देव और महारानी भगवती देवी के यहां हुआ था। उनका विवाह नागवंश के राजा की पुत्री राजकुमारी माधवी से हुआ। महाराजा अग्रसेन को अग्रवंश का संस्थापक माना जाता है। मान्यता है कि उन्होंने 18 गणराज्यों को एकजुट कर अग्रोदय साम्राज्य की स्थापना की और अग्रोहा को उसकी राजधानी बनाया। वर्तमान में अग्रोहा हरियाणा के हिसार के निकट स्थित है।

महाराजा अग्रसेन का जीवन समाज में समानता, सहयोग और लोककल्याण की भावना स्थापित करने के आदर्श से जुड़ा हुआ है। अग्रवाल समाज उन्हें अपनी परंपराओं, सामाजिक एकता और सेवा भावना का प्रेरणास्रोत मानता है।

‘एक ईंट, एक रुपया’ से आत्मनिर्भरता का संदेश

महाराजा अग्रसेन से जुड़ी ‘एक ईंट, एक रुपया’ की परंपरा सामाजिक सहयोग का विशिष्ट उदाहरण मानी जाती है। इसके अनुसार, राज्य में किसी नए परिवार के आने पर समाज के प्रत्येक परिवार की ओर से उसे एक ईंट और एक रुपया दिया जाता था। इस सहयोग से नए परिवार को घर बनाने, कारोबार शुरू करने और जीवन की आवश्यक व्यवस्थाएं जुटाने में मदद मिलती थी।

इस परंपरा की विशेषता केवल आर्थिक सहायता देना नहीं, बल्कि सहयोग को सामाजिक जिम्मेदारी और पारस्परिकता से जोड़ना था। सहायता पाने वाला परिवार भी भविष्य में किसी नए परिवार की मदद करने के लिए प्रेरित होता था। इससे न तो सहायता लेने वाले में हीनभावना पैदा होती और न ही सहयोग देने वाले में अहंकार की गुंजाइश रहती।

यह व्यवस्था समाज में नए आने वाले परिवारों को अपनाने, उन्हें आत्मनिर्भर बनाने और सामाजिक जीवन से जोड़ने की भावना को मजबूत करती थी। आज के दौर में भी इस विचार को जरूरतमंद परिवारों की शिक्षा, रोजगार, आवास और स्वरोजगार में सहयोग के रूप में अपनाया जा सकता है।

अहिंसा और समानता पर आधारित व्यवस्था

महाराजा अग्रसेन से जुड़ी परंपराओं में अहिंसा को विशेष महत्व दिया गया है। मान्यता है कि उन्होंने यज्ञों में पशुबलि का विरोध कर अहिंसा और जीवों के प्रति करुणा का संदेश दिया। उनके आदर्शों में समाज के प्रत्येक व्यक्ति के प्रति संवेदनशीलता और सम्मान की भावना प्रमुख रही।

यह भी माना जाता है कि उनके राज्य में राजपरिवार और सामान्य परिवारों के बच्चों को एक ही गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलता था। इस व्यवस्था को सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठकर समान अवसर उपलब्ध कराने के आदर्श के रूप में देखा जाता है। शिक्षा में समानता और समाज के प्रत्येक वर्ग की भागीदारी का यह संदेश आज भी प्रासंगिक है।

18 गोत्रों से जुड़ी है अग्रवंश की परंपरा

अग्रवाल समाज की परंपरा में 18 गोत्रों का विशेष उल्लेख मिलता है। इनमें मित्तल, सिंघल, गर्ग, बंसल, जिंदल, कंसल, बिंदल, मंगल, तायल, गोयल, कुच्छल, नांगल, भंगल, तिंगल, धारण, मधुकुल, कायल और ऐरण शामिल हैं। अग्रवाल समाज मां लक्ष्मी की आराधना के साथ दान, सेवा और सामाजिक सहयोग की परंपरा को भी महत्व देता है।

समाज में अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों की सहायता करना, शिक्षा और जनकल्याण के कार्यों में योगदान देना तथा सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से सहयोग करना इसी भावना का विस्तार है।

हर व्यक्ति को साथ लेकर चलने का संकल्प जरूरी : सुजीत सिंहल

अखिल भारतीय वैश्य अग्रवाल महासभा के राष्ट्रीय मंत्री सुजीत सिंहल ने कहा कि महाराजा अग्रसेन जी के आदर्श केवल किसी एक समाज तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे पूरे समाज को समानता, समरसता और सेवा का संदेश देते हैं। उनके अनुसार, आज प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार किसी जरूरतमंद का सहयोग कर सकता है। एक व्यक्ति के लिए छोटा दिखाई देने वाला सहयोग दूसरे के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकता है।

उन्होंने कहा कि समाज में ऐसा भाव विकसित होना चाहिए, जिसमें सक्षम व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की सहायता करे और सहायता प्राप्त करने वाला व्यक्ति भी भविष्य में किसी अन्य जरूरतमंद के काम आए। यही परस्पर सहयोग सामाजिक समरसता को मजबूत करता है।

महाराजा अग्रसेन जी की जयंती पर समाज के सभी वर्गों को उनके जीवन से प्रेरणा लेते हुए प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान देने, भेदभाव से दूर रहने, शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ाने तथा जरूरतमंदों की मदद के लिए आगे आने का संकल्प लेना चाहिए। यही उनके आदर्शों के प्रति सच्ची श्रद्धा और सामाजिक समरसता की दिशा में सार्थक पहल होगी।

सुजीत सिंहल
राष्ट्रीय मंत्री
अखिल भारतीय वैश्य अग्रवाल महासभा (पंजीकृत)

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