जिंदगी के अंतिम फैसले का अधिकार जयपुर में लिविंग विल काउंसलिंग सेंटर

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

बीएमसीएच की पहल: गंभीर बीमारी में मरीज की इच्छाओं और गरिमा का होगा सम्मान, स्वस्थ लोग भी ले सकेंगे मार्गदर्शन

10 अक्टूबर को विश्व हॉस्पिस एवं पैलिएटिव केयर डे पर होगी शुरुआत, सप्ताह में एक दिन मिलेगी काउंसलिंग की सुविधा

जयपुर। गंभीर बीमारी के दौरान यदि कोई व्यक्ति अपने इलाज से जुड़े फैसले लेने या अपनी इच्छा व्यक्त करने में सक्षम नहीं रह जाता, तो ऐसी स्थिति में उसकी पहले से व्यक्त चिकित्सा संबंधी इच्छाएं महत्वपूर्ण हो जाती हैं। इसी उद्देश्य से जयपुर स्थित भगवान महावीर कैंसर हॉस्पिटल (बीएमसीएच) में प्रदेश का पहला लिविंग विल काउंसलिंग सेंटर शुरू किया जा रहा है। यहां लोगों को लिविंग विल के कानूनी और चिकित्सकीय पहलुओं, इसे तैयार करने की प्रक्रिया तथा जरूरी औपचारिकताओं के बारे में मार्गदर्शन दिया जाएगा।

विश्व हॉस्पिस एवं पैलिएटिव केयर डे के अवसर पर 10 अक्टूबर को शुरू होने वाली यह पहल लोगों को गंभीर बीमारी की स्थिति में अपने इलाज से जुड़ी प्राथमिकताएं समय रहते तय करने के लिए प्रेरित करेगी। इसका उद्देश्य केवल गंभीर रूप से बीमार मरीजों को जानकारी देना नहीं, बल्कि स्वस्थ व्यक्तियों को भी भविष्य की संभावित चिकित्सा परिस्थितियों के लिए तैयार करना है।

राज्य सरकार के साथ प्रक्रिया को आगे बढ़ाने पर चर्चा

इस पहल को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाने के लिए अस्पताल प्रबंधन ने चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की प्रमुख शासन सचिव गायत्री राठौड़ से मुलाकात की। उन्होंने इस प्रयास को महत्वपूर्ण सामाजिक और मानवीय पहल बताते हुए सरकार की ओर से सहयोग का आश्वासन दिया।

बैठक में राजस्थान में लिविंग विल की प्रक्रिया को सुचारु रूप से लागू करने के लिए जरूरी सरकारी प्रक्रियाओं पर भी चर्चा हुई। इस संबंध में अक्टूबर के अंत तक अस्पताल प्रबंधन और राज्य सरकार के बीच संयुक्त बैठक प्रस्तावित है।

सप्ताह में एक दिन होगी काउंसलिंग

अस्पताल के अधिशासी निदेशक मेजर जनरल एससी पारीक ने बताया कि लिविंग विल काउंसलिंग सेंटर में पूर्व पंजीकरण के आधार पर लोगों को परामर्श दिया जाएगा। इसके जरिए व्यक्ति अपनी चिकित्सा संबंधी इच्छाओं को समझने, परिवार के साथ उन पर चर्चा करने और भविष्य में संभावित कठिन परिस्थितियों के लिए तैयारी करने में सक्षम हो सकेंगे।

अस्पताल की चिकित्सा निदेशक डॉ. गीतांजलि अग्रवाल जोशी ने बताया कि काउंसलिंग की जिम्मेदारी हॉस्पिस एवं पैलिएटिव केयर विभाग की निदेशक डॉ. अंजुम खान जोड़ संभालेंगी। वे पहले से ही लिविंग विल के क्षेत्र में कार्यरत संबंधित क्लीनिकों और विशेषज्ञों के संपर्क में हैं। इससे लोगों को उपलब्ध अनुभव और निर्धारित प्रक्रियाओं के आधार पर उचित जानकारी देने में मदद मिलेगी।

क्या है लिविंग विल, क्यों है इसकी जरूरत?

लिविंग विल एक ऐसा अग्रिम चिकित्सा निर्देश है, जिसके माध्यम से वयस्क व्यक्ति यह स्पष्ट कर सकता है कि भविष्य में यदि वह किसी गंभीर और अपरिवर्तनीय चिकित्सा स्थिति में अपनी इच्छा व्यक्त करने या इलाज से जुड़े निर्णय लेने में सक्षम न रहे, तो ऐसी परिस्थितियों में उसके उपचार को लेकर क्या इच्छाएं हैं।

इसमें निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और लागू शर्तों के तहत जीवन रक्षक उपचारों, वेंटिलेटर तथा अन्य चिकित्सकीय उपायों को लेकर अपनी प्राथमिकताएं दर्ज की जा सकती हैं। इसका मूल उद्देश्य मरीज की स्वायत्तता, गरिमा और पहले से व्यक्त इच्छाओं का सम्मान सुनिश्चित करना है।

डॉ. अंजुम खान जोड़ के अनुसार, लिविंग विल तैयार करने से पहले व्यक्ति को कुछ महत्वपूर्ण सवालों पर विचार करना चाहिए—

  • यदि भविष्य में मैं स्वयं निर्णय लेने की स्थिति में नहीं रहूं, तो मेरे इलाज से जुड़ी इच्छाएं डॉक्टरों तक कैसे पहुंचेंगी?
  • यदि ठीक होने की संभावना बेहद कम हो, तो जीवन रक्षक उपचारों को लेकर मेरी इच्छा क्या होगी?
  • क्या मैंने अपनी चिकित्सा संबंधी प्राथमिकताओं पर परिवार के साथ खुलकर बातचीत की है?

इन सवालों पर समय रहते विचार करने से व्यक्ति अपनी इच्छाएं स्पष्ट कर सकता है। साथ ही, भविष्य में परिवार को कठिन चिकित्सा निर्णयों के दौरान होने वाले मानसिक दबाव से निपटने में भी मदद मिल सकती है।

मृत्यु का विकल्प नहीं, गरिमा के साथ उपचार का सवाल

लिविंग विल का उद्देश्य मृत्यु को चुनना नहीं है। इसका मकसद उन परिस्थितियों में व्यक्ति की पहले से व्यक्त चिकित्सा संबंधी इच्छाओं का सम्मान करना है, जब वह स्वयं अपनी बात रखने में सक्षम न हो।

गंभीर बीमारी के दौरान कई बार मरीज की स्थिति में सुधार की संभावना सीमित होती है, लेकिन परिवार के सदस्य जीवन रक्षक उपचारों को लेकर निर्णय लेने में असमंजस महसूस करते हैं। ऐसी स्थिति में पहले से दर्ज इच्छाएं चिकित्सकीय टीम और परिवार के बीच संवाद का आधार बन सकती हैं। हालांकि, लिविंग विल अपने आप किसी उपचार को बंद करने का निर्देश नहीं है; इसका उपयोग लागू कानून, निर्धारित प्रक्रिया और चिकित्सकीय परिस्थितियों के अनुसार ही किया जाता है।

महाराष्ट्र, तमिलनाडु और गोवा में भी आगे बढ़े प्रयास

देश में लिविंग विल को लेकर कानूनी व्यवस्था और उसके क्रियान्वयन की प्रक्रिया पर हाल के वर्षों में अधिक ध्यान दिया गया है। महाराष्ट्र में डिजिटल पोर्टल की पहल और तमिलनाडु तथा गोवा में जारी दिशा-निर्देश इस विषय को व्यवहार में लाने की कोशिशों का हिस्सा हैं।

भारत में लिविंग विल और अग्रिम चिकित्सा निर्देशों की कानूनी स्थिति को समझने के लिए सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले और 2023 में संशोधित दिशा-निर्देश महत्वपूर्ण हैं। ऐसे दस्तावेजों को तैयार करने और लागू करने में निर्धारित कानूनी औपचारिकताओं का पालन आवश्यक है।

बुजुर्गों और परिवारों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह पहल?

बढ़ती उम्र के साथ हृदय रोग, मधुमेह और सांस संबंधी पुरानी बीमारियों का जोखिम बढ़ता है। ऐसी स्थितियों में कई बार मरीज लंबे समय तक गहन चिकित्सा सहायता पर निर्भर रह सकता है। यदि मरीज अपनी इच्छा व्यक्त करने में सक्षम न हो, तो परिवार को उपचार संबंधी कठिन फैसलों का सामना करना पड़ता है।

लिविंग विल पर पहले से विचार करने और परिवार के साथ बातचीत करने से ऐसी परिस्थितियों में मरीज की प्राथमिकताओं को समझने में मदद मिल सकती है। लंबे समय तक चलने वाले उपचार से परिवार पर पड़ने वाले आर्थिक और मानसिक दबाव को लेकर भी समय रहते चर्चा की जा सकती है।

अस्पतालों के लिए भी मरीज की इच्छाओं और चिकित्सकीय जरूरतों के बीच संतुलन महत्वपूर्ण है। उपलब्ध संसाधनों का उपयोग मरीज की वास्तविक जरूरत, उपचार की संभावनाओं और चिकित्सकीय मानकों के अनुसार किया जाना चाहिए। लिविंग विल काउंसलिंग सेंटर इसी दिशा में लोगों को जागरूक करने और जिम्मेदार चिकित्सा निर्णयों के लिए तैयार करने की पहल है।

बीएमसीएच की यह पहल राजस्थान में लिविंग विल को लेकर जागरूकता बढ़ाने के साथ व्यक्ति के गरिमापूर्ण जीवन, चिकित्सा संबंधी स्वायत्तता और परिवार की भागीदारी पर संवाद को नई दिशा दे सकती है।

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