लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
फडणवीस ने कांग्रेस पर लगाया तुष्टीकरण का आरोप अमित शाह ने भी बोला हमला
नई दिल्ली/नागपुर।(रितु मेहरा) राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच सियासी टकराव लगातार बढ़ता जा रहा है। कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) ने 19 अगस्त को अपने पुराने 1937 के प्रस्ताव पर कायम रहते हुए पार्टी के कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के केवल पहले दो अंतरे गाने का फैसला किया है। इसके बाद भाजपा ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है।
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कांग्रेस के फैसले को लेकर उस पर ‘तुष्टीकरण की राजनीति’ की ओर लौटने का आरोप लगाया। वहीं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी कांग्रेस के फैसले को लेकर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भाजपा इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाएगी।
कांग्रेस कार्यसमिति ने क्या फैसला लिया?
कांग्रेस कार्यसमिति ने बुधवार को हुई बैठक में स्पष्ट किया कि पार्टी अपने कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के पहले दो अंतरे ही गाएगी। कांग्रेस ने अपने फैसले के लिए 1937 में तत्कालीन कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा लिए गए निर्णय का हवाला दिया है।
कांग्रेस के मुताबिक, यह कोई नया फैसला नहीं बल्कि पार्टी की ऐतिहासिक स्थिति की पुनर्पुष्टि है। पार्टी का कहना है कि 1937 में भी सार्वजनिक और कांग्रेस के कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के पहले दो अंतरों को ही गाने का निर्णय लिया गया था।
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब केंद्र सरकार ने आधिकारिक आयोजनों के प्रोटोकॉल में ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण गायन पर जोर दिया है।
फडणवीस का कांग्रेस पर हमला
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कांग्रेस के फैसले पर निशाना साधते हुए इसे तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़ दिया। फडणवीस ने कहा कि कांग्रेस का यह रुख उसकी पुरानी राजनीतिक सोच की वापसी को दर्शाता है।
फडणवीस ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर भी निशाना साधा। उन्होंने राहुल गांधी को देश के अलग-अलग हिस्सों के युवाओं से संवाद करने की सलाह देते हुए कहा कि उन्हें केवल कांग्रेस नेताओं से जुड़े कॉलेजों के छात्रों तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
अमित शाह ने भी कांग्रेस को घेरा
इस विवाद में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी कांग्रेस पर तीखा हमला किया। शाह ने आरोप लगाया कि कांग्रेस का दो अंतरे गाने का फैसला उसकी ‘तुष्टीकरण की राजनीति’ की ओर वापसी को दिखाता है। उन्होंने इसे राष्ट्रीय गीत और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े लोगों का अपमान बताया।
शाह ने कहा कि भाजपा कांग्रेस के इस फैसले को लेकर जनता के बीच जाएगी और पार्टी इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से उठाएगी।
भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने बताया ‘अपमान’
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने भी कांग्रेस के फैसले पर हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने ‘वंदे मातरम्’ के सम्मान के प्रति अपने रुख को संस्थागत रूप दे दिया है और पार्टी की तुलना ‘नई मुस्लिम लीग’ से की।
भाजपा नेताओं का कहना है कि ‘वंदे मातरम्’ स्वतंत्रता आंदोलन की भावनाओं से जुड़ा राष्ट्रीय प्रतीक है और इसके पूर्ण गायन को लेकर किसी तरह की कटौती स्वीकार नहीं की जानी चाहिए।
कांग्रेस का तर्क क्या है?
कांग्रेस का कहना है कि वह ‘वंदे मातरम्’ का सम्मान करती है और उसका फैसला राष्ट्रगीत के प्रति किसी अनादर का संकेत नहीं है। पार्टी 1937 के उस निर्णय को आधार बना रही है, जिसके तहत सार्वजनिक कार्यक्रमों में पहले दो अंतरों को अपनाने की बात कही गई थी।
कांग्रेस के भीतर भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई है। कुछ नेताओं ने इसे अनावश्यक विवाद से बचने वाला ऐतिहासिक रुख बताया है, जबकि पार्टी के भीतर यह राय भी सामने आई कि इस मुद्दे को और अधिक संवेदनशीलता से संभालने की जरूरत है।
विवाद के बीच भाजपा शासित नागपुर नगर निगम में भी दो अंतरे
इस पूरे विवाद में एक दिलचस्प घटनाक्रम नागपुर से सामने आया है। भाजपा शासित नागपुर नगर निगम (NMC) की गुरुवार की आमसभा में भी ‘वंदे मातरम्’ के केवल दो अंतरे गाए गए। रिपोर्ट के मुताबिक, यह प्रशासनिक स्तर पर हुई चूक थी।
यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा और उसके नेता कांग्रेस द्वारा दो अंतरे गाए जाने की आलोचना कर रहे हैं।
1937 का फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?
‘वंदे मातरम्’ की ऐतिहासिक भूमिका भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी रही है। कांग्रेस के मौजूदा फैसले की पृष्ठभूमि 1937 के उस निर्णय से जुड़ी है, जिसमें गीत के पहले दो अंतरों को सार्वजनिक आयोजनों के लिए अपनाया गया था।
इसी ऐतिहासिक फैसले को कांग्रेस अब अपने वर्तमान कार्यक्रमों के लिए आधार बना रही है, जबकि भाजपा का जोर ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण गायन पर है। इसी अंतर ने इस मुद्दे को राजनीतिक विवाद का रूप दे दिया है।
अब आगे क्या?
‘वंदे मातरम्’ को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच विवाद आने वाले दिनों में और बढ़ने के संकेत हैं। भाजपा ने इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाने की बात कही है, जबकि कांग्रेस अपने 1937 के प्रस्ताव को ऐतिहासिक आधार बताते हुए अपने फैसले पर कायम है।
इस विवाद ने राष्ट्रवाद, इतिहास, धार्मिक संवेदनशीलता और राजनीतिक तुष्टीकरण जैसे मुद्दों को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है।






















































