लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
विशेष रिपोर्ट- सत्यनारायण सेन
मेवाड़। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की जलझूलनी एकादशी यानी डोल ग्यारस पर मेवाड़ कृष्ण भक्ति के रंग में रंगा नजर आया। चित्तौड़गढ़, राजसमंद और भीलवाड़ा के प्रमुख कृष्ण मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। मंदिरों से ठाकुरजी की रजत बेवाण और शाही पालकियां गाजे-बाजे के साथ निकलीं तो रास्ते जयकारों से गूंज उठे।
जलझूलनी एकादशी की परंपरा के तहत शाम को भगवान की प्रतिमाओं को जलाशयों के घाट तक ले जाकर जलविहार कराया गया। मेवाड़ के अलग-अलग अंचलों में निकली इन धार्मिक यात्राओं में लोक संस्कृति, भक्ति और पारंपरिक रीति-रिवाजों का अनूठा संगम दिखाई दिया।
इस पर्व पर मंडफिया के सांवरिया सेठ, गढ़बोर के चारभुजा नाथ, कोटड़ी के श्याम और गुरला के लक्ष्मीनाथ जी के मंदिर विशेष आकर्षण का केंद्र रहे।
मंडफिया के सांवरिया सेठ: व्यापारियों की आस्था का बड़ा केंद्र
चित्तौड़गढ़ जिले के मंडफिया में विराजमान श्री सांवरिया सेठ राजस्थान ही नहीं, देशभर में कृष्ण भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र हैं। भक्तों में ऐसी मान्यता है कि मनोकामना पूरी होने के बाद वे अपनी कमाई या व्यापार का एक हिस्सा सांवरिया सेठ को अर्पित करते हैं। इसी वजह से उन्हें श्रद्धालु प्रेम से अपना कारोबारी साझीदार भी कहते हैं।
जलझूलनी एकादशी पर सांवरिया सेठ का विशेष शृंगार किया गया। स्वर्णिम पोशाक और आभूषणों से सजे ठाकुरजी के बेवाण के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। नगर भ्रमण के दौरान जयकारों और भक्ति गीतों से पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा।
गढ़बोर के चारभुजा नाथ: डोल मेले में उमड़ी भीड़
राजसमंद जिले के गढ़बोर स्थित चारभुजा नाथ मंदिर मेवाड़ के प्रमुख वैष्णव तीर्थों में शामिल है। भगवान चारभुजा नाथ को लेकर स्थानीय क्षेत्र में प्राचीन धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं और मेवाड़ के लोगों में इनके प्रति गहरी आस्था है।
डोल ग्यारस के अवसर पर मंदिर परिसर में विशेष आयोजन हुआ। ठाकुरजी के बेवाण के बाहर निकलते ही श्रद्धालुओं ने ‘हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की’ के जयकारे लगाए। डोल मेले में दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं की भीड़ नजर आई। परंपरा के अनुसार भगवान को पवित्र जल से स्नान कराया गया और जलविहार कराया गया।
कोटड़ी के श्याम: चांदी के रथ में नगर भ्रमण
भीलवाड़ा जिले के कोटड़ी कस्बे में स्थित कोटड़ी के श्याम भी जलझूलनी एकादशी पर श्रद्धालुओं के प्रमुख आकर्षण रहे। स्थानीय लोगों में इस मंदिर को लेकर विशेष आस्था है और बड़ी संख्या में भक्त यहां दर्शन एवं धार्मिक आयोजनों में शामिल होते हैं।
एकादशी पर ठाकुरजी चांदी के भव्य रथ में नगर भ्रमण पर निकले। यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर भगवान का स्वागत किया। कई जगह अबीर-गुलाल उड़ाकर भक्तों ने अपनी श्रद्धा प्रकट की। पूरे मार्ग में भक्ति गीत और जयकारे सुनाई देते रहे।
गुरला के लक्ष्मीनाथ जी: लोक आस्था और परंपरा का केंद्र
भीलवाड़ा जिले के गुरला गांव में स्थित लक्ष्मीनाथ जी ठाकुरजी स्थानीय लोगों की गहरी आस्था का केंद्र हैं। चारभुजा स्वरूप में पूजे जाने वाले भगवान लक्ष्मीनाथ जी को क्षेत्र के ग्रामीण सुख-समृद्धि का आराध्य मानते हैं। गांव में होने वाले शुभ कार्यों से पहले भगवान की अनुमति लेने की परंपरा भी स्थानीय लोक आस्था का हिस्सा है।
जलझूलनी एकादशी पर मंदिर में ठाकुरजी का विशेष शृंगार किया गया। इसके बाद बेवाण के साथ नगर भ्रमण हुआ। यात्रा के दौरान लोक कलाकारों ने पारंपरिक नृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं।
शाम को जब ठाकुरजी जलाशय के तट पर पहुंचे तो जलविहार और महाआरती का आयोजन हुआ। आरती के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे और पूरा वातावरण भक्ति के जयकारों से गूंज उठा।
जलझूलनी एकादशी: भक्ति के साथ लोक संस्कृति का उत्सव
मेवाड़ में जलझूलनी एकादशी केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि लोक परंपराओं और सामाजिक सहभागिता से जुड़ा उत्सव भी है। मंदिरों से निकलने वाले बेवाण, पारंपरिक वाद्य, लोक नृत्य, पुष्पवर्षा और सामूहिक जयकारे इस पर्व को विशिष्ट बनाते हैं।
मंडफिया से गढ़बोर और कोटड़ी से गुरला तक अलग-अलग धार्मिक परंपराओं के बीच एक समान भाव दिखाई दिया—अपने आराध्य को नगर भ्रमण पर ले जाना, जलविहार कराना और सामूहिक रूप से उनकी आरती करना।
जलझूलनी एकादशी के अवसर पर मेवाड़ के इन धार्मिक स्थलों पर उमड़ी भीड़ ने एक बार फिर क्षेत्र की जीवंत धार्मिक और लोक सांस्कृतिक परंपराओं की तस्वीर सामने रखी।
























































