जकिया इनाम कैसे बनी टोंक,सियासत की बैगम, बनी 2 बार मंत्री

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

टोंक “की”, सियासत की ‘बेगम’ तीन बार विधायक, दो बार मंत्री और टोंक की राजनीति में ऐसा दबदबा, जिसकी मिसाल आज भी दी जाती है

नीरज मेहरा वरिष्ठ पत्रकार

राजस्थान की राजनीति में कई बड़े नाम आए और चले गए, लेकिन टोंक की राजनीति में एक नाम ऐसा है, जिसकी चर्चा आज भी सम्मान और प्रभाव के साथ होती है—जकिया इनाम। वह सिर्फ कांग्रेस की नेता नहीं थीं, बल्कि उस दौर में महिला नेतृत्व की ऐसी मिसाल थीं, जब राजनीति पूरी तरह पुरुष नेताओं के इर्द-गिर्द घूमती थी।

टोंक विधानसभा क्षेत्र में तीन बार विधायक चुनी जाना और दो अलग-अलग दौर में मंत्री पद तक पहुंचना बताता है कि जकिया इमाम का जनाधार कितना मजबूत था। उनकी राजनीति की सबसे बड़ी ताकत यह थी कि उन्होंने खुद को किसी एक वर्ग या समुदाय की नेता तक सीमित नहीं रखा, बल्कि पूरे टोंक की नेता के रूप में स्थापित किया।

बिलासपुर से टोंक तक का सफर

7 जुलाई 1949 को बिलासपुर में जन्मी जकिया इनाम की राजनीतिक यात्रा टोंक में विवाह के बाद शुरू हुई। डॉ. इनाम से शादी के बाद उनका सामाजिक दायरा बढ़ा और धीरे-धीरे उन्होंने जनसेवा के माध्यम से अपनी अलग पहचान बनाई।

उस समय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी सीमित थी, लेकिन जकिया इनाम ने न केवल चुनावी मैदान में उतरने का साहस दिखाया, बल्कि जीत हासिल कर यह साबित भी किया कि टोंक की जनता नेतृत्व में क्षमता देखती है, केवल परंपराएं नहीं।

1985: जब पहली जीत ने बदल दी तस्वीर

वर्ष 1985 का चुनाव जकिया इनाम के राजनीतिक जीवन का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़कर उन्होंने जीत दर्ज की और पहली बार विधायक बनीं।

उनकी राजनीतिक क्षमता को देखते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी ने उन्हें चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री बनाया। यह वह दौर था, जब ग्रामीण राजस्थान में स्वास्थ्य सुविधाएं बेहद सीमित थीं। बताया जाता है कि उनके कार्यकाल में टोंक जिले में रिकॉर्ड संख्या में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) खोले गए। यही कारण था कि गांवों में उनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती चली गई।

टोंक में क्यों बनीं ‘मजबूत महिला चेहरा’?

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि जकिया इनाम की सबसे बड़ी ताकत उनका जमीनी संपर्क था। वे लोगों के सुख-दुख में शामिल होती थीं और जनता से सीधा संवाद रखती थीं।

यही वजह रही कि 1998 में जब कांग्रेस सत्ता में लौटी तो जकिया इमाम ने फिर जीत हासिल की और राज्य सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। बाद में अशोक गहलोत सरकार में भी उन्हें महिला एवं बाल विकास और चिकित्सा विभाग जैसे अहम मंत्रालय मिले।

टिकट कटने और हार के बावजूद कायम रहा प्रभाव

राजनीति में हर सफर सीधा नहीं होता। 1993 में उन्हें कांग्रेस का टिकट नहीं मिला। इसके बावजूद उन्होंने संगठन और क्षेत्र से अपना जुड़ाव बनाए रखा।

2013 का चुनाव उनके राजनीतिक जीवन का सबसे कठिन दौर माना जाता है। उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा और बाद में 2018 में पार्टी ने टिकट भी नहीं दिया। लेकिन दिलचस्प बात यह रही कि सक्रिय राजनीति से दूर होने के बावजूद टोंक कांग्रेस में उनकी राय और प्रभाव बना रहा।

क्या था उनकी राजनीति का सबसे बड़ा सूत्र?

जकिया इनाम की राजनीति जातीय या सांप्रदायिक समीकरणों पर आधारित नहीं थी। उन्होंने विकास, स्वास्थ्य सुविधाओं और महिला सशक्तिकरण को अपना मुख्य एजेंडा बनाया।

टोंक में आज भी कई वरिष्ठ नागरिक बताते हैं कि स्वास्थ्य क्षेत्र में हुए विस्तार और ग्रामीण इलाकों तक चिकित्सा सुविधाएं पहुंचाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। यही कारण है कि उन्हें केवल नेता नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधि के रूप में याद किया जाता है।

कांग्रेस की उस पीढ़ी की आखिरी कड़ी

जकिया इनाम उस कांग्रेस संस्कृति का हिस्सा थीं, जिसमें संगठन, कार्यकर्ता और जनता के बीच सीधा रिश्ता होता था। वे उन नेताओं में शामिल थीं जिन्होंने जमीन से उठकर मंत्री पद तक का सफर तय किया।

22 सितंबर 2020 को जयपुर में उनके निधन के साथ टोंक की राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया। लेकिन आज भी जब टोंक की सबसे प्रभावशाली महिला नेताओं की बात होती है, तो जकिया इमाम का नाम सबसे पहले लिया जाता है।

जो बात उन्हें खास बनाती है

जकिया इनाम की असली ताकत केवल चुनाव जीतना नहीं थी, बल्कि टोंक में कांग्रेस के सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को एक साथ साधने की क्षमता थी। उन्होंने ऐसे दौर में अपनी पहचान बनाई, जब महिला नेताओं को अक्सर प्रतीकात्मक भूमिका तक सीमित माना जाता था। तीन बार विधायक और मंत्री बनने का उनका सफर इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने जनता के बीच भरोसे की ऐसी पूंजी बनाई, जो हार और टिकट कटने के बाद भी समाप्त नहीं हुई। टोंक की राजनीति में आज भी उनकी पहचान एक ऐसी नेता के रूप में है, जिसने सत्ता को पद नहीं, बल्कि जनसेवा का माध्यम बनाया।

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