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रितू मेहरा
आज विटामिन-D की कमी एक आम स्वास्थ्य चिंता बन चुकी है। खासकर शहरों में घर, ऑफिस और वाहन की बंद जीवनशैली, धूप से कम संपर्क और खान-पान की आदतें इसका एक कारण हो सकती हैं। भारत में विटामिन-D की कमी व्यापक होने की बात विशेषज्ञ अध्ययनों में सामने आई है, हालांकि इसका प्रतिशत उम्र, क्षेत्र, जीवनशैली और जांच में इस्तेमाल किए गए मानकों के अनुसार अलग-अलग मिलता है।
सवाल यह है कि आखिर विटामिन-D शरीर के लिए इतना जरूरी क्यों है? इसकी कमी कैसे पहचानी जाए? क्या सिर्फ धूप से इसकी पूर्ति हो सकती है? शाकाहारी और मांसाहारी भोजन में इसके कौन से स्रोत हैं? और क्या हर व्यक्ति को विटामिन-D की गोली लेना जरूरी है?
विटामिन-D आखिर करता क्या है?
विटामिन-D शरीर में कैल्शियम और फॉस्फोरस के इस्तेमाल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसका सीधा संबंध हड्डियों और मांसपेशियों के स्वास्थ्य से है।
बच्चों में गंभीर कमी होने पर रिकेट्स जैसी समस्या हो सकती है, जिसमें हड्डियां कमजोर और विकृत हो सकती हैं। किशोरों और वयस्कों में गंभीर कमी ऑस्टियोमलेशिया यानी हड्डियों के कमजोर होने और हड्डियों में दर्द की वजह बन सकती है। मांसपेशियों में कमजोरी भी इसके साथ जुड़ी हो सकती है।
हालांकि विटामिन-D को कैंसर, हृदय रोग, डायबिटीज या अन्य कई बीमारियों से बचाने वाली “रामबाण दवा” मानना सही नहीं है। शोध में इन बीमारियों और विटामिन-D के स्तर के बीच संबंध जरूर पाए गए हैं, लेकिन सामान्य स्वस्थ लोगों में अतिरिक्त विटामिन-D लेने से इन बीमारियों की रोकथाम कितनी होती है, इस पर प्रमाण सीमित और कई जगह अनिश्चित हैं।

कमी क्यों होती है?
विटामिन-D की कमी का सबसे बड़ा कारण केवल भोजन की कमी नहीं है। इसके कई कारण हो सकते हैं—
धूप से कम संपर्क:
जो लोग ज्यादातर समय घर, ऑफिस या अन्य बंद स्थानों में रहते हैं, उनमें जोखिम बढ़ सकता है।
शरीर का अधिकांश हिस्सा ढका रहना:
त्वचा को मिलने वाली UVB किरणें विटामिन-D बनाने में भूमिका निभाती हैं।
उम्र बढ़ना:
उम्र के साथ त्वचा की विटामिन-D बनाने की क्षमता कम हो सकती है।
गहरी त्वचा:
त्वचा में अधिक मेलानिन होने पर सूर्य की UVB किरणों से विटामिन-D बनने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत कम प्रभावी हो सकती है।
मोटापा:
मोटापे में विटामिन-D की कमी का जोखिम बढ़ सकता है।
आंतों में अवशोषण की समस्या:
कुछ बीमारियों में शरीर भोजन से विटामिन-D ठीक से अवशोषित नहीं कर पाता।
किडनी की बीमारी:
किडनी विटामिन-D को शरीर में उपयोगी रूप में बदलने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
क्या धूप सबसे आसान उपाय है?
धूप विटामिन-D का महत्वपूर्ण प्राकृतिक स्रोत है। सूर्य की UVB किरणें त्वचा में विटामिन-D3 बनने की प्रक्रिया शुरू करती हैं। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है—हर व्यक्ति के लिए धूप में बैठने का कोई एक निश्चित समय नहीं है।
समय मौसम, स्थान, त्वचा का रंग, उम्र, कपड़ों, बादल, वायु प्रदूषण और शरीर के खुले हिस्से पर निर्भर करता है। इसलिए यह कहना कि “हर व्यक्ति को रोज 20 मिनट धूप लेना ही पर्याप्त है”, वैज्ञानिक रूप से सार्वभौमिक नियम नहीं है।
भारत में किए गए एक अध्ययन में विटामिन-D की कमी वाले पुरुषों के एक समूह को सुबह 11 बजे से दोपहर 3 बजे के बीच चेहरे और अग्रबाहुओं पर कम से कम 20 मिनट सूर्य exposure दिया गया था। यह एक अध्ययन की व्यवस्था थी, सभी लोगों के लिए निर्धारित सार्वभौमिक नुस्खा नहीं।
इसलिए धूप का फायदा लेने के साथ सनबर्न और अत्यधिक UV exposure से बचना भी जरूरी है। बहुत देर तक तेज धूप में रहना त्वचा के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
और एक जरूरी तथ्य—खिड़की के शीशे के पीछे बैठने से सामान्यतः विटामिन-D बनाने वाली UVB किरणें पर्याप्त मात्रा में त्वचा तक नहीं पहुंचतीं।

क्या केवल खाने से विटामिन-D पूरा हो सकता है?
यहीं सबसे बड़ी गलतफहमी है।
प्राकृतिक रूप से बहुत कम खाद्य पदार्थों में पर्याप्त मात्रा में विटामिन-D पाया जाता है। इसलिए केवल सामान्य भोजन के सहारे पर्याप्त विटामिन-D प्राप्त करना कई लोगों के लिए कठिन हो सकता है।
शाकाहारी लोगों के लिए क्या विकल्प हैं?
शाकाहारी भोजन में प्राकृतिक स्रोत सीमित हैं। इनमें प्रमुख हैं—
- मशरूम, खासकर UV प्रकाश से उपचारित मशरूम में विटामिन-D2 अधिक हो सकता है।
- विटामिन-D से फोर्टिफाइड दूध या अन्य खाद्य पदार्थ, यदि उनमें विटामिन-D मिलाया गया हो।
- फोर्टिफाइड अनाज/सीरियल, जहां उपलब्ध हों।
- कुछ फोर्टिफाइड डेयरी या प्लांट-बेस्ड उत्पाद।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि सामान्य सब्जियां और दालें विटामिन-D के प्रमुख स्रोत नहीं हैं। इसी तरह गेहूं, बाजरा, ज्वार, मक्का या अन्य अनाज की सामान्य रोटी को विटामिन-D का अच्छा स्रोत नहीं माना जा सकता।
अर्थात “कौन सी रोटी खाएं कि विटामिन-D पूरा हो जाए” का सीधा जवाब है—कोई सामान्य अनाज की रोटी विटामिन-D की पर्याप्त पूर्ति का भरोसेमंद साधन नहीं है।

मांसाहारी भोजन में क्या खाएं?
मांसाहारी भोजन में विटामिन-D के बेहतर प्राकृतिक स्रोत उपलब्ध हैं।
फैटी फिश यानी वसायुक्त मछलियां—जैसे सैल्मन, ट्राउट, टूना और मैकेरल—प्रमुख स्रोतों में शामिल हैं।
इसके अलावा—
- अंडे की जर्दी
- कुछ मात्रा में लीवर
- चीज
- फिश लिवर ऑयल
में भी विटामिन-D पाया जाता है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि केवल मांसाहारी भोजन करने वाला व्यक्ति विटामिन-D की कमी से सुरक्षित है। धूप, शरीर की विटामिन-D बनाने की क्षमता और अन्य स्वास्थ्य स्थितियां भी महत्वपूर्ण हैं।
क्या हर किसी को विटामिन-D की गोली लेनी चाहिए?
नहीं।
यही बात सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।
स्वस्थ वयस्कों में बिना किसी विशेष कारण के अधिक मात्रा में विटामिन-D की खुराक लेना जरूरी नहीं माना जाता। 2024 की Endocrine Society guideline स्वस्थ 75 वर्ष से कम उम्र के वयस्कों में सामान्य अनुशंसित दैनिक मात्रा से अधिक विटामिन-D की routine supplementation के खिलाफ सुझाव देती है।
वहीं जिन लोगों में वास्तविक कमी है, डॉक्टर उनकी स्थिति के अनुसार supplementation की सलाह दे सकते हैं।
विटामिन-D की कमी की पुष्टि के लिए आमतौर पर रक्त में 25-hydroxyvitamin D [25(OH)D] की जांच की जाती है। लेकिन स्वस्थ हर व्यक्ति की routine screening भी जरूरी नहीं मानी जाती।
यानी दवा का सवाल व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य, जोखिम और जांच के परिणाम पर निर्भर करता है।

ज्यादा विटामिन-D भी नुकसानदेह हो सकता है
यह सोच भी सही नहीं है कि विटामिन-D जितना ज्यादा होगा, स्वास्थ्य उतना बेहतर होगा।
विटामिन-D वसा में घुलने वाला विटामिन है। अत्यधिक supplementation से शरीर में कैल्शियम बहुत बढ़ सकता है और इससे स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए डॉक्टर की सलाह के बिना लंबे समय तक हाई-डोज विटामिन-D लेना उचित नहीं है।
किन लोगों को विशेष सावधानी रखनी चाहिए?
इन लोगों में विटामिन-D की कमी का जोखिम अपेक्षाकृत अधिक हो सकता है—
- बुजुर्ग
- लंबे समय तक घर के अंदर रहने वाले लोग
- धूप से बहुत कम संपर्क वाले लोग
- मोटापे से ग्रस्त व्यक्ति
- गहरी त्वचा वाले लोग
- कुछ आंतों की बीमारियों से पीड़ित व्यक्ति
- वे लोग जिनमें शरीर विटामिन-D को ठीक से अवशोषित या उपयोग नहीं कर पाता
- कुछ किडनी संबंधी समस्याओं वाले मरीज।
ऐसे मामलों में डॉक्टर की सलाह ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है।

बचाव का आसान तरीका क्या है?
विटामिन-D की कमी से बचने के लिए कोई एक जादुई उपाय नहीं है। बेहतर तरीका है—
धूप + संतुलित भोजन + जरूरत के अनुसार फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थ + चिकित्सकीय सलाह।
रोजमर्रा की जिंदगी में बाहर निकलना, सुरक्षित तरीके से सूर्य का संपर्क लेना, भोजन में उपलब्ध विटामिन-D स्रोत शामिल करना और जोखिम वाले लोगों में डॉक्टर से सलाह लेना उपयोगी कदम हैं।
अगर लगातार हड्डियों में दर्द, मांसपेशियों में कमजोरी या अन्य संबंधित लक्षण हों, तो खुद से दवा शुरू करने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना बेहतर है।
सबसे जरूरी बात
विटामिन-D को लेकर दो अतियां हैं।
एक तरफ लोग इसकी कमी को मामूली मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। दूसरी तरफ कुछ लोग बिना जांच और चिकित्सकीय सलाह के हाई-डोज सप्लीमेंट शुरू कर देते हैं।
दोनों से बचना जरूरी है।
धूप जरूरी है, लेकिन धूप का मतलब घंटों तेज गर्मी में बैठना नहीं।
भोजन जरूरी है, लेकिन सामान्य सब्जियों या रोटी से विटामिन-D पूरा होने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
सप्लीमेंट उपयोगी हो सकता है, लेकिन हर व्यक्ति के लिए जरूरी नहीं।
विटामिन-D का सही प्रबंधन व्यक्ति की उम्र, जीवनशैली, भोजन, धूप के संपर्क और स्वास्थ्य स्थिति को देखकर किया जाना चाहिए।
याद रखें—विटामिन-D सिर्फ एक गोली का नाम नहीं, बल्कि शरीर की हड्डियों और मांसपेशियों के स्वास्थ्य से जुड़ा महत्वपूर्ण पोषक तत्व है। इसकी कमी को समझना जरूरी है, लेकिन इसका इलाज भी वैज्ञानिक तरीके से ही होना चाहिए।






















































