नंदलाल मीणा, राजनीति का वो चेहरा, जिसने कांठल से भाजपा की जड़ें मजबूत की

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

35 साल की सक्रिय राजनीति, 7 बार विधायक, एक बार सांसद और तीन बार मंत्री

जनता पार्टी से सियासत शुरू की, भाजपा के गठन के दौर में पार्टी से जुड़े; प्रतापगढ़ को बनाया राजनीतिक कर्मभूमि

1993 में समाज कल्याण मंत्री से लेकर वसुंधरा राजे सरकार में जनजाति क्षेत्र विकास मंत्री तक का सफर

नीरज मेहरा वरिष्ठ संवाददाता

राजस्थान की आदिवासी राजनीति में नंदलाल मीणा का नाम उस पीढ़ी के नेताओं में लिया जाता है, जिन्होंने भाजपा के शुरुआती दौर में आदिवासी अंचल में संगठन की जमीन तैयार की। प्रतापगढ़ के अम्बामाता का खेड़ा गांव से निकलकर विधानसभा, लोकसभा और राज्य सरकार में मंत्री पद तक पहुंचने वाले नंदलाल मीणा का राजनीतिक सफर करीब चार दशक तक राजस्थान की राजनीति से जुड़ा रहा।

25 जनवरी 1946 को जन्मे नंदलाल मीणा ने उदयपुर के मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय से बीए और एलएलबी की पढ़ाई की। इसके बाद खेती के साथ सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय हुए। वर्ष 1972 में उन्होंने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन सफलता नहीं मिली। इसके पांच साल बाद 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर उदयपुर ग्रामीण (एसटी) से पहली बार विधायक बने। उस समय राजस्थान में भैरों सिंह शेखावत के नेतृत्व में बनी पहली गैर-कांग्रेसी सरकार में उन्हें राज्य मंत्री बनाया गया था।

भाजपा की स्थापना के दौर में मुंबई में थे नंदलाल

नंदलाल मीणा की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पड़ाव 1980 रहा। जनता पार्टी के विभाजन के बाद मुंबई में भारतीय जनता पार्टी के गठन के समय वे वहां मौजूद रहे और बाद में भाजपा के शुरुआती संगठन से जुड़ गए। प्रतापगढ़ और आसपास के आदिवासी इलाकों में पार्टी का आधार मजबूत करने में उनकी भूमिका को भाजपा से जुड़े नेताओं और उनके निधन के बाद प्रकाशित श्रद्धांजलि आलेखों में रेखांकित किया गया है।

यही वह दौर था जब नंदलाल मीणा ने प्रतापगढ़ को अपनी स्थायी राजनीतिक कर्मभूमि बना लिया।

7 बार विधानसभा पहुंचे, लेकिन बीच में दो चुनाव हारे

नंदलाल मीणा के विधानसभा सफर को आंकड़ों के लिहाज से देखें तो उनकी सात जीतें दर्ज हैं।

वर्ष सीट परिणाम
1977 उदयपुर ग्रामीण जनता पार्टी से जीत
1980 प्रतापगढ़ भाजपा से जीत
1985 प्रतापगढ़ चुनाव हारे
1990 प्रतापगढ़ चुनाव नहीं जीते
1993 प्रतापगढ़ भाजपा से जीत
1998 प्रतापगढ़ भाजपा से जीत
2003 प्रतापगढ़ भाजपा से जीत
2008 प्रतापगढ़ भाजपा से जीत
2013 प्रतापगढ़ भाजपा से जीत

प्रतापगढ़ में 1993 से 2013 तक उन्होंने लगातार छह विधानसभा चुनाव जीते। 1985 में कांग्रेस के धनराज मीणा और 1990 में भाजपा के ही राखब चंद ने प्रतापगढ़ से जीत दर्ज की थी। इसके बाद 1993 में नंदलाल मीणा ने वापसी की और फिर 2013 तक लगातार जीतते रहे।

यानी 35 साल से ज्यादा लंबे विधानसभा सफर में उनकी सबसे मजबूत राजनीतिक पहचान प्रतापगढ़ से बनी।

लोकसभा भी पहुंचे, वो भी बेहद करीबी मुकाबले में

1989 में नंदलाल मीणा ने लोकसभा का चुनाव लड़ा और सलूंबर (एसटी) लोकसभा सीट से भाजपा के टिकट पर सांसद चुने गए।

यह चुनाव बेहद करीबी था। नंदलाल मीणा को 2,03,888 वोट मिले, जबकि कांग्रेस के भेरूलाल मीणा को 2,03,010 वोट मिले। जीत का अंतर सिर्फ 878 वोट रहा। वे 1989 से 1991 तक लोकसभा सदस्य रहे।

इस तरह विधानसभा की राजनीति से निकलकर उन्होंने संसद तक भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।

दूसरी बार सत्ता में लौटे शेखावत तो मिला मंत्री पद

1993 के विधानसभा चुनाव में नंदलाल मीणा ने प्रतापगढ़ से फिर जीत हासिल की। इसके बाद भैरों सिंह शेखावत के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनी और दिसंबर 1993 में नंदलाल मीणा को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। उपलब्ध समकालीन राजनीतिक रिकॉर्ड में उनका नाम राज्य मंत्री के रूप में दर्ज है, जबकि उनके जन्मदिन कार्यक्रम में भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया ने भी 1993 में उनके समाज कल्याण मंत्री बनने का उल्लेख किया था।

इस तरह शेखावत सरकार उनके राजनीतिक सफर का दूसरा बड़ा मंत्री पद वाला पड़ाव बनी।

वसुंधरा राजे के दोनों कार्यकाल में मजबूत भूमिका

नंदलाल मीणा का राजनीतिक प्रभाव आगे चलकर वसुंधरा राजे के नेतृत्व वाली भाजपा सरकारों में भी दिखाई दिया।

2013 में भाजपा की सत्ता में वापसी के बाद 20 दिसंबर को उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किया गया और जनजाति क्षेत्र विकास विभाग की जिम्मेदारी दी गई।

2013 से 2018 तक वे वसुंधरा राजे सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे। आदिवासी इलाकों में छात्रावास, सड़क, सिंचाई, एनीकट और पेयजल जैसी योजनाओं को लेकर उनके समर्थक उनके मंत्री कार्यकाल को विशेष रूप से याद करते हैं।

यही वजह रही कि नंदलाल मीणा की पहचान केवल विधायक के रूप में नहीं, बल्कि कांठल और आदिवासी क्षेत्र के प्रभावशाली भाजपा नेता के तौर पर बनी।

भील प्रदेश पर बदला रुख, सियासत में चर्चा

नंदलाल मीणा की राजनीति का एक दिलचस्प पहलू भील प्रदेश की मांग को लेकर उनका बदला हुआ रुख भी रहा।

रिपोर्टों के अनुसार 2014 में उन्होंने अलग भील प्रदेश की मांग का विरोध किया था, लेकिन 2016 में वे इस मांग के समर्थन में सामने आए। यहां तक कि उन्होंने कहा था कि यदि इसके लिए मंत्री पद छोड़ना पड़े तो वे तैयार हैं।

यह रुख इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि उस समय वे खुद वसुंधरा राजे सरकार में मंत्री थे। यानी आदिवासी क्षेत्र से आने वाले इस वरिष्ठ भाजपा नेता ने पार्टी और सरकार के भीतर रहते हुए आदिवासी राज्य की मांग को लेकर अपनी अलग राजनीतिक स्थिति रखी।

2018 में बेटे हेमंत को सौंपी राजनीतिक विरासत

2018 के विधानसभा चुनाव के दौरान स्वास्थ्य और उम्र संबंधी कारणों से नंदलाल मीणा सक्रिय चुनावी राजनीति से दूर हुए। भाजपा ने प्रतापगढ़ से उनके बेटे हेमंत मीणा को मैदान में उतारा। हालांकि उस चुनाव में हेमंत मीणा कांग्रेस के रामलाल मीणा से हार गए।

इसके बाद 2023 में हेमंत मीणा ने प्रतापगढ़ से जीत दर्ज की और भजनलाल शर्मा सरकार के मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री बने। इस तरह नंदलाल मीणा की राजनीतिक विरासत अगली पीढ़ी तक पहुंची।

लेकिन किरोड़ी लाल मीणा से नाराजगी की कहानी कितनी सही?

नंदलाल मीणा और डॉ. किरोड़ी लाल मीणा के बीच कथित नाराजगी को लेकर राजनीतिक चर्चाएं जरूर मिलती हैं, लेकिन उपलब्ध विश्वसनीय स्रोतों में ऐसी कोई स्पष्ट, प्रत्यक्ष घटना या सार्वजनिक बयान नहीं मिला जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि दोनों के बीच व्यक्तिगत राजनीतिक दुश्मनी या कोई निश्चित विवाद था।

दरअसल प्रतापगढ़ की राजनीति में एक अलग घटनाक्रम जरूर सामने आता है। रामलाल मीणा पहले भाजपा में थे, बाद में भाजपा से अलग होकर किरोड़ी लाल मीणा के साथ जुड़े और 2013 में किरोड़ी की राजस्थान जनतांत्रिक पार्टी से चुनाव लड़ा। इसके बाद किरोड़ी के भाजपा में लौटने पर रामलाल मीणा कांग्रेस में चले गए और 2018 में कांग्रेस के टिकट पर प्रतापगढ़ से नंदलाल मीणा के बेटे हेमंत मीणा को हराया।

इसलिए नंदलाल बनाम किरोड़ी की सीधी व्यक्तिगत लड़ाई बताना उपलब्ध प्रमाणों से ज्यादा बड़ा दावा होगा। हां, दोनों की अलग-अलग राजनीतिक धाराएं और प्रतापगढ़ में उनके समर्थक खेमों से जुड़े समीकरण समय-समय पर चर्चा में रहे।

नंदलाल मीणा की राजनीति की सबसे बड़ी विरासत क्या रही?

नंदलाल मीणा की राजनीतिक यात्रा को तीन हिस्सों में देखा जा सकता है—

पहला—संगठन:
भाजपा के शुरुआती दौर में आदिवासी बहुल क्षेत्र में पार्टी का आधार तैयार करना।

दूसरा—सत्ता:
सात बार विधायक, एक बार सांसद और तीन अलग-अलग दौर में राजस्थान सरकार में मंत्री रहना।

तीसरा—राजनीतिक विरासत:
2018 में सक्रिय राजनीति से दूरी के बाद बेटे हेमंत मीणा को आगे बढ़ाना और 2023 में उनके बेटे का विधायक बनकर मंत्री तक पहुंचना।

नंदलाल मीणा का निधन 26 सितंबर 2025 को अहमदाबाद के एक अस्पताल में 79 वर्ष की उम्र में हुआ। उनके निधन के साथ राजस्थान भाजपा की उस पीढ़ी का एक प्रमुख चेहरा चला गया, जिसने जनता पार्टी के दौर से लेकर भाजपा के गठन और फिर पार्टी के सत्ता में स्थापित होने तक का राजनीतिक सफर अपनी आंखों से देखा और उसमें सक्रिय भूमिका निभाई।

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