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बात सम्मान पर आई तो छोड़ दी भाजपा: डॉ. मीना

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

डॉ. किरोड़ी लाल मीना की राजनीतिक बगावत की इनसाइड स्टोरी

जयपुर | नीरज मेहरा

राजस्थान की राजनीति में “बाबा” के नाम से पहचान रखने वाले डॉ. किरोड़ी लाल मीना का राजनीतिक सफर जितना संघर्षपूर्ण रहा है, उतना ही दिलचस्प भी। आदिवासी समाज के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाने वाले डॉ. मीना ने कई बार यह साबित किया कि उनके लिए पद से ज्यादा महत्वपूर्ण सिद्धांत और सम्मान हैं। यही वजह रही कि एक समय उन्होंने कैबिनेट मंत्री पद और भाजपा जैसी बड़ी पार्टी तक छोड़ने में भी संकोच नहीं किया।

किसान परिवार से राजनीति के शिखर तक

3 नवंबर 1951 को दौसा जिले के एक साधारण किसान परिवार में जन्मे डॉ. किरोड़ी लाल मीना पेशे से डॉक्टर थे। पिता मनोहर लाल मीना और माता फूला देवी के संस्कारों के बीच पले-बढ़े किरोड़ी लाल ने चिकित्सा क्षेत्र से अपना करियर शुरू किया, लेकिन जनता की समस्याओं ने उन्हें राजनीति की राह पर ला खड़ा किया।

उनकी पत्नी गोलमा देवी भी राजनीति में सक्रिय रहीं और राजस्थान सरकार में मंत्री एवं विधायक के रूप में कार्य कर चुकी हैं।

पहली जीत और जननेता की पहचान

डॉ. किरोड़ी लाल मीना ने 1985 में महुआ विधानसभा सीट से जीत दर्ज कर विधानसभा में प्रवेश किया। इसके बाद 1989 में सवाई माधोपुर से लोकसभा चुनाव जीतकर राष्ट्रीय राजनीति में पहुंचे। अपने राजनीतिक जीवन में वे कई बार विधायक, दो बार लोकसभा सांसद और एक बार राज्यसभा सांसद रहे हैं।

पूर्वी राजस्थान और विशेष रूप से मीणा समाज में उनकी लोकप्रियता इतनी अधिक रही कि उन्हें समाज का सर्वमान्य नेता माना जाने लगा।

जब सिद्धांतों के लिए छोड़ दिया मंत्री पद

साल 2007 में गुर्जर आरक्षण आंदोलन अपने चरम पर था। उस समय वसुंधरा राजे सरकार में डॉ. किरोड़ी लाल मीना रसद एवं खाद्य मंत्री थे। बताया जाता है कि गुर्जरों को एसटी आरक्षण में शामिल करने को लेकर सरकार स्तर पर विचार-विमर्श चल रहा था।

इसी दौरान मुख्यमंत्री आवास पर हुई एक महत्वपूर्ण बैठक में डॉ. मीना अपना इस्तीफा लेकर पहुंच गए। माना जाता है कि उन्होंने इस मुद्दे पर अपनी असहमति जताते हुए मंत्री पद छोड़ने का फैसला किया। यहीं से उनके और तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बीच राजनीतिक दूरियां बढ़ने लगीं।

एक वाक्य ने बढ़ा दी नाराजगी

2008 विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा में टिकट वितरण को लेकर बैठकों का दौर चल रहा था। डॉ. किरोड़ी लाल मीना ने पूर्वी राजस्थान की सीटों के लिए अपने समर्थकों की सूची पार्टी नेतृत्व को सौंपी थी।

राजनीतिक गलियारों में चर्चा रही कि पार्टी नेतृत्व उनकी सिफारिशों को ज्यादा महत्व देने के पक्ष में नहीं था। यहां तक कि उन्हें केवल एक टिकट देने की बात कही गई। इसी दौरान पार्टी की एक बैठक में कथित तौर पर की गई एक टिप्पणी—”डॉ. किरोड़ी बेचता क्या है?”—ने विवाद को और गहरा कर दिया।

कहा जाता है कि इस टिप्पणी को डॉ. मीना ने व्यक्तिगत और राजनीतिक अपमान के रूप में लिया। नतीजा यह हुआ कि उन्होंने भाजपा का टिकट तक स्वीकार नहीं किया और पार्टी छोड़ने का फैसला कर लिया।

भाजपा से अलग होकर दिखाई ताकत

भाजपा छोड़ने के बाद डॉ. किरोड़ी लाल मीना और उनकी पत्नी गोलमा देवी ने निर्दलीय चुनाव लड़ा। गोलमा देवी चुनाव जीतने में सफल रहीं और बाद में अशोक गहलोत सरकार में मंत्री भी बनीं।

इसके बाद 2009 में डॉ. मीना ने दौसा लोकसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीत दर्ज कर यह संदेश दिया कि उनकी राजनीति किसी पार्टी की मोहताज नहीं है।

बनाई अपनी पार्टी, खड़े किए 134 उम्मीदवार

2013 में डॉ. किरोड़ी लाल मीना ने राष्ट्रीय जनता पार्टी (राजपा) के बैनर तले विधानसभा चुनाव लड़ा। उन्होंने प्रदेशभर में 134 उम्मीदवार मैदान में उतारे। खुद समेत चार विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे और यह साबित कर दिया कि पूर्वी राजस्थान में उनकी अलग राजनीतिक पकड़ है।

मोदी-शाह की रणनीति और भाजपा में वापसी

करीब एक दशक तक भाजपा से दूर रहने के बाद केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद परिस्थितियां बदलीं। भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के प्रयासों से डॉ. किरोड़ी लाल मीना की घर वापसी का रास्ता साफ हुआ।

11 मार्च 2018 को उन्होंने अपनी पार्टी राष्ट्रीय जनता पार्टी (राजपा) का भाजपा में विलय कर दिया। जयपुर स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय में वे अपनी पत्नी गोलमा देवी और विधायक गीता वर्मा के साथ भाजपा में शामिल हुए।

आज फिर सत्ता के केंद्र में

भाजपा में वापसी के बाद डॉ. किरोड़ी लाल मीना लगातार संगठन और सरकार दोनों में सक्रिय भूमिका निभाते रहे। वर्तमान में वे राजस्थान की भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं और अपनी आक्रामक कार्यशैली, छापेमार कार्रवाइयों तथा जनहित के मुद्दों को लेकर लगातार चर्चा में बने रहते हैं।

निष्कर्ष

डॉ. किरोड़ी लाल मीना की राजनीतिक यात्रा सिर्फ चुनावी जीत-हार की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस नेता की कहानी है जिसने कई बार सत्ता से ज्यादा सम्मान और सिद्धांतों को प्राथमिकता दी। यही कारण है कि आज भी राजस्थान की राजनीति में उनका नाम एक प्रभावशाली, बेबाक और जनाधार वाले नेता के रूप में लिया जाता है।

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