लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
समदड़ी/बालोतरा। पश्चिमी राजस्थान की जीवनरेखा मानी जाने वाली मरुगंगा लूणी नदी एक बार फिर प्रदूषण के संकट को लेकर सुर्खियों में है। मानसून की बारिश के बीच नेहड़ा बांध में लंबे समय से जमा फैक्ट्रियों का केमिकल युक्त दूषित पानी बांध के गेट खोलकर लूणी नदी में छोड़े जाने का आरोप लगाते हुए क्षेत्र के किसानों और ग्रामीणों ने चिंता जताई है।
ग्रामीणों का कहना है कि दूषित पानी के प्रवाह से लूणी नदी के आसपास के क्षेत्रों में कृषि भूमि, भूजल स्रोत, पशुधन और आमजन के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। किसानों का आरोप है कि वर्षों से औद्योगिक इकाइयों के रासायनिक अपशिष्ट के कारण खेतों की उर्वरता कम हो रही है, उत्पादन प्रभावित हो रहा है और पशुओं पर भी इसका असर दिखाई दे रहा है।
उच्च स्तरीय वैज्ञानिक सर्वे की मांग
समाजसेवी हुकम सिंह अजीत ने राज्य सरकार से मांग की है कि पाली, जोधपुर और बालोतरा के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाले अनुपचारित रासायनिक अपशिष्ट के कारण प्रभावित क्षेत्रों का उच्च स्तरीय संयुक्त वैज्ञानिक सर्वे कराया जाए।
उन्होंने कहा कि जोजरी, बांडी और लूणी नदी के तटवर्ती इलाकों में कृषि भूमि, भूजल, ट्यूबवेल, कुएं, पशुधन और लोगों के स्वास्थ्य पर पड़े प्रभाव का आकलन कर प्रभावित किसानों को उचित मुआवजा दिया जाना चाहिए। 
“संघर्ष उद्योगों के खिलाफ नहीं, प्रदूषण के खिलाफ है”
हुकम सिंह अजीत ने कहा कि यह लड़ाई उद्योगों के विरोध में नहीं है, बल्कि प्रदूषण के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास स्वीकार्य नहीं हो सकता जो किसानों की उपजाऊ जमीन को बंजर बना दे, भूजल को जहरीला कर दे और क्षेत्र की जीवनदायिनी नदियों को संकट में डाल दे।
उन्होंने कहा कि मरुगंगा लूणी केवल एक नदी नहीं, बल्कि पश्चिमी राजस्थान की संस्कृति, कृषि, पशुधन और लाखों लोगों की आजीविका का आधार है। इसके संरक्षण के लिए सरकार को समयबद्ध, पारदर्शी और कठोर कदम उठाने होंगे।
किसानों को राहत की उम्मीद
क्षेत्र के किसानों का कहना है कि प्रदूषण की समस्या वर्षों पुरानी है और अब इसका स्थायी समाधान जरूरी है। किसानों ने सरकार से मांग की है कि प्रभावित परिवारों की पहचान कर उन्हें आर्थिक सहायता दी जाए तथा प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों पर प्रभावी कार्रवाई की जाए।
ग्रामीणों का कहना है कि लूणी नदी और इससे जुड़े जल स्रोतों को बचाना केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा सवाल है।