लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
बोले राठौड़—जनता के फैसले को स्वीकार करने के बजाय संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाना उचित नहीं
जयपुर। (रूपनारायण सांवरिया) भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के हालिया बयानों पर पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस की राजनीति में विरोधाभास साफ दिखाई दे रहा है। राठौड़ ने कहा कि जीत मिलने पर कांग्रेस नेता वोटों के आंकड़े गिनाकर अपनी पीठ थपथपाते हैं, लेकिन हार का सामना होने पर सत्ता के दुरुपयोग और अन्य आरोपों का सहारा लेते हैं।
डोटासरा ने हालिया निकाय चुनावों को लेकर भाजपा सरकार पर पुलिस और प्रशासनिक तंत्र के कथित दुरुपयोग के आरोप लगाए हैं। कांग्रेस ने कुछ निकायों में निर्वाचित पार्षदों पर दबाव बनाने और चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के आरोप भी लगाए हैं।
‘जीत पर श्रेय, हार पर आरोप क्यों?’
मदन राठौड़ ने कहा कि यदि सत्ता का दुरुपयोग हुआ होता तो कांग्रेस को इतने वोट कैसे मिलते? उन्होंने कहा कि कांग्रेस नेताओं की स्थिति यह है कि जहां उन्हें चुनावी सफलता मिलती है, वहां वे उसे अपनी रणनीति और संगठन की जीत बताते हैं, जबकि जहां परिणाम उनके पक्ष में नहीं आते, वहां सत्ता के दुरुपयोग जैसे आरोप लगाए जाते हैं।
राठौड़ ने कहा कि डोटासरा को चुनाव परिणामों पर सवाल उठाने के बजाय अपनी पार्टी के प्रदर्शन पर आत्ममंथन करना चाहिए।
संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाने पर निशाना
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया से जुड़ी संस्थाओं और लोकतांत्रिक व्यवस्था की निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठाना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है कि वे संवैधानिक संस्थाओं और चुनावी प्रक्रिया की मर्यादा का सम्मान करें।
राठौड़ ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी को जनता के निर्णय को स्वीकार करना चाहिए और अपनी राजनीतिक स्थिति की समीक्षा करनी चाहिए, न कि लगातार संस्थाओं पर सवाल उठाकर चुनावी हार की जिम्मेदारी दूसरों पर डालने का प्रयास करना चाहिए।
आरोपों पर भाजपा-कांग्रेस आमने-सामने
निकाय चुनावों के बाद राजस्थान में भाजपा और कांग्रेस के बीच चुनावी प्रक्रिया को लेकर आरोप-प्रत्यारोप तेज हुए हैं। डोटासरा ने पुलिस-प्रशासन के कथित इस्तेमाल को लेकर सरकार पर सवाल उठाए हैं, जबकि भाजपा की ओर से इन आरोपों को राजनीतिक प्रतिक्रिया बताया जा रहा है।
अब पंचायत चुनावों से पहले दोनों प्रमुख दलों के बीच यह सियासी टकराव आगे बढ़ने के संकेत हैं। ऐसे में चुनावी परिणामों के साथ-साथ प्रशासनिक निष्पक्षता, संस्थाओं की भूमिका और राजनीतिक दलों के दावों पर भी बहस तेज होने की संभावना है।















































