राजस्थान मंत्रिमंडल में बढ़ती बेचैनी, कई नए पुराने चेहरों को उम्मीद!

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
अहसास की कलम से……
22 तारीख का डर, अंता हार की चोट और कुर्सियों पर मंडराते बादल**
राजस्थान की राजनीति इन दिनों सिर्फ सरकार बनाम विपक्ष नहीं है—
ये मुकाबला सरकार बनाम उसकी अपनी बेचैनी बन गया है।
22 तारीख का कैलेंडर… और मंत्रियों की बढ़ती धड़कनें
जैसे-जैसे 22 तारीख नजदीक आ रही है, कई मंत्रियों के लिए ये तारीख किसी त्यौहार की नहीं, बल्कि परीक्षा के रिज़ल्ट डे की तरह लग रही है।
कुर्सियाँ सलामत रहेंगी या नहीं—इस पर इतना सस्पेंस है कि कई मंत्री इन दिनों अपने विभाग से ज्यादा अपनी किस्मत की लाइनें देख रहे हैं।
पार्टी के भीतर अफवाहों का बाजार गर्म है—
किसका प्रमोशन होगा?
किसका टिकट कटेगा?
कौन बाहर जाएगा और कौन नई एंट्री मारेगा?
कुर्सियों की खटपट ने माहौल ऐसा कर दिया है कि मंत्रीजी कार्यक्रमों में मुस्कुरा तो रहे हैं, लेकिन फोटोज़ ही बता देती हैं—
दिल किसी और टेंशन में डूबा है।
मंत्रिमंडल विस्तार: अंदर ही अंदर उबल रहा है लावा
सरकार में मंत्रिमंडल विस्तार महीनों से “जल्द होगा” मोड में फंसा हुआ है—
और इसी इंतज़ार में कई नेता “उम्मीदवार” से “अति-उम्मीदवार” बन चुके हैं।
जो पहले कहते थे – हमें जिम्मेदारी मिले तो अच्छा है,
अब कहते दिखते हैं –
“अब नहीं मिला तो गलत होगा!”
पार्टी के भीतर खींचतान, बैलेंसिंग, जातीय समीकरण—सबके नाम पर बात टलती जा रही है,
पर बेचैनी हर दिन बढ़ती जा रही है।
अंता उपचुनाव की हार–सरकार के लिए लाल संकेत
अंता की हार ने सरकार के भीतर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
ये सिर्फ एक सीट नहीं थी—
ये सरकार की छवि, कामकाज और संगठन की पकड़ का परीक्षा-पत्र था।
विपक्ष ने इसे “जनता का संदेश” बताया,
लेकिन उससे बड़ी बात ये है कि सरकार के अपने लोग भी भीतर ही भीतर इसे गंभीर संकेत मान रहे हैं।
कहा जा रहा है कि—
“अगर अंता जैसी सीट पर जनता ने नाराज़गी दिखाई, तो आगे क्या होगा?”
सरकार के भीतर इस हार पर जिम्मेदारी तय होने का डर कुछ नेताओं को ज्यादा बेचैन कर रहा है।
सरकार के हालात: बाहर विरोध, अंदर फूट
राजस्थान की राजनीति इस वक्त दो मोर्चों पर लड़ी जा रही है—
1. विपक्ष का हमला,
2. पार्टी के अंदर असंतोष।
संगठन और सरकार के बीच कोऑर्डिनेशन की कमी की चर्चा भी तेज है।
कुछ मंत्री सत्ता का स्वाद थोड़ा ज्यादा ले रहे हैं,
और कुछ नेताओं को लगता है कि उन्हें उनका “हिस्सा” नहीं मिला।
राजनीतिक समीकरणों की इस खिचड़ी में
सरकार एक कदम आगे बढ़ाती है और दो कदम पीछे खिंच जाती है।
राजस्थान की राजनीति का मौजूदा माहौल
नेता चैनलों में मुस्कुरा रहे हैं, लेकिन कमरे में फोन साइलेंट करकर बैठते हैं।
नए दावेदार रोज़ “दिल्ली दौड़” कर रहे हैं।
मंत्री अपनी परफॉर्मेंस रिपोर्ट से ज्यादा विधायकों की शिकायतों से परेशान हैं।
संगठन के लोग मानते हैं कि “ग्राउंड पर मैसेजिंग बैठ नहीं रही है।”
और जनता कह रही है—
“अभी तो शुरुआत है, आगे भी हिसाब होगा।”
22 तारीख के साथ ही फैसला सिर्फ मंत्रिमंडल का नहीं होगा,
बल्कि
सरकार की दिशा, ताकत और इक्वेशन का भी परीक्षण होगा।
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