बाबोसा के भतीजे कैसे बने कांग्रेस के ‘फायरब्रांड’ नेता

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

विरोधियों के चक्रव्यूह को तोड़ विपक्ष की सबसे दमदार आवाज बने “खाचरियावास”

छात्र राजनीति से कैबिनेट मंत्री तक संघर्ष और बेबाकी से बनाई प्रतापसिंह ने अपनी अलग पहचान, एबीवीपी से टिकट नहीं मिला तो निर्दलीय जीता चुनाव, पूर्व मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत के भतीजे ने खुद लिखी अपनी सियासी इबारत

नीरज मेहरा। जयपुर । कहने को तो वे देश के पूर्व उप राष्ट्रपति और राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री ‘बाबोसा’ भैरोंसिंह शेखावत के भतीजे हैं, लेकिन राजनीति की बिसात पर उन्होंने कभी विरासत का सहारा नहीं लिया। राजस्थान विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति से कदम बढ़ाकर सूबे की सरकार में कैबिनेट मंत्री बनने तक का सफर कभी आसान नहीं था। भाजपा की वैचारिक पृष्ठभूमि से निकलकर कांग्रेस के ‘फायरब्रांड’ और विपक्ष की सबसे दमदार आवाज बनने की यह कहानी कड़ी मेहनत, जनता के जुड़ाव और कभी न झुकने वाले तेवरों की गवाह है। जी हां, आज की इनसाइड स्टोरी में बात कर रहे हैं प्रताप सिंह खाचरियावास।

जब करियर की शुरुआत में ही विरोधियों ने घेरा- 

प्रतापसिंह का सियासी सफर साल 1992 में राजस्थान विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष बनने से शुरू हुआ था। भाजपा पृष्ठभूमि होने के बावजूद जब अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने उन्हें टिकट देने से इनकार कर दिया, तो इस युवा नेता ने हार नहीं मानी। उन्होंने बागी होकर निर्दलीय चुनाव लड़ा और एकतरफा जीत हासिल कर अपने दमखम का परिचय दिया। इसके बाद वे भाजपा युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे, लेकिन अपनों के ही राजनीतिक छलावे और टिकट न मिलने के कारण विरोधियों ने शुरुआत में ही उनका करिअर कुचलने की पूरी कोशिश की।

कांग्रेस में बनाई जगह, बने संकटमोचक –

साल 2004 के आसपास प्रतापसिंह खाचरियावास ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दामन थाम लिया। विचारधारा पूरी तरह अलग थी, लेकिन अपनी आक्रामक शैली और जमीनी पकड़ के चलते उन्होंने बहुत जल्द कांग्रेस आलाकमान का भरोसा जीत लिया। साल 2008 में कांग्रेस ने उन्हें जयपुर की हॉट सीट ‘सिविल लाइंस’ से मैदान में उतारा, जहां उन्होंने शानदार जीत दर्ज की। हालांकि 2013 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन 2018 में वे फिर से इसी सीट से विधायक चुने गए और पूर्ववर्ती अशोक गहलोत सरकार में परिवहन तथा खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति जैसे महत्वपूर्ण विभागों के कैबिनेट मंत्री रहे। उन्होंने लोकसभा का चुनाव भी लड़ा और हर मोर्चे पर पार्टी के लिए मजबूती से खड़े रहे।

सड़कों के संघर्ष से बने विपक्ष की ‘फायरब्रांड’ आवाज

खाचरियावास की सबसे बड़ी यूएसपी उनका जनता के बीच रहना और जनता के मुद्दों पर सड़क पर उतर जाना है। चाहे अपनी ही सरकार के खिलाफ बेबाकी से बोलना हो या केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई के खिलाफ डटकर खड़े होना, वे हमेशा मुखर रहे हैं। आज भले ही सूबे की सत्ता बदल चुकी है, लेकिन सदन से लेकर सड़क तक वे कांग्रेस और विपक्ष की सबसे मजबूत तथा धारदार आवाज बनकर सरकार को घेर रहे हैं। उनका यह सफर इस बात का प्रमाण है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो सियासत की राह में आने वाले हर कांटे को जनसमर्थन के बल पर हटाया जा सकता है।

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