हरिसिंह महुवा,गांव की सरपंची से सत्ता के गलियारों तक पहुंचा वह चेहरा

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

खेड़ला बुजुर्ग की चौपाल से शुरू हुआ सफर, चार बार विधानसभा पहुंचे, सरकार में मंत्री रहे और विधानसभा के मुख्य सचेतक की जिम्मेदारी संभाली

नीरज मेहरा 

राजस्थान की राजनीति में कई ऐसे नेता रहे हैं, जिन्होंने किसी बड़े राजनीतिक परिवार या शहरी सियासी पृष्ठभूमि के बजाय गांव की जमीन से अपना सफर शुरू किया और आगे चलकर प्रदेश की सत्ता में अपनी पहचान बनाई। हरिसिंह महुवा भी ऐसा ही नाम थे।

दौसा जिले के खेड़ला बुजुर्ग गांव से निकले हरिसिंह ने पहले ग्रामीण राजनीति में अपनी जगह बनाई। इसके बाद पंचायत समिति की राजनीति से होते हुए विधानसभा पहुंचे और महुवा क्षेत्र के लगातार चार चुनाव जीतकर कांग्रेस के प्रमुख गुर्जर नेताओं में शामिल हुए। विधानसभा में सरकारी मुख्य सचेतक की जिम्मेदारी संभालने के साथ वे सरकार में मंत्री भी रहे। राजस्थान विधानसभा के उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार वे 22 मार्च 1999 से 4 दिसंबर 2003 तक सरकारी मुख्य सचेतक रहे।

किसान परिवार से निकला राजनीतिक चेहरा

हरिसिंह महुवा का जन्म 3 जुलाई 1941 को खेड़ला बुजुर्ग में एक किसान गुर्जर परिवार में हुआ था। गांव से शुरुआती शिक्षा लेने के बाद उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए जयपुर का रुख किया। 1965 में राजस्थान विश्वविद्यालय से बीए और एलएलबी की पढ़ाई पूरी की।

कानून की पढ़ाई ने उन्हें व्यवस्था और प्रशासन को समझने का नजरिया दिया, जबकि ग्रामीण परिवेश ने उन्हें स्थानीय समस्याओं और लोगों के बीच काम करने का अनुभव दिया। आगे चलकर यही मेल उनकी राजनीति की पहचान बना।

उनकी सक्रिय राजनीति का शुरुआती बड़ा पड़ाव खेड़ला बुजुर्ग ग्राम पंचायत की सरपंची रहा। गांव की चौपाल से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे महुवा क्षेत्र की व्यापक राजनीति तक पहुंच गया।

पंचायत की जमीन से विधानसभा तक

ग्रामीण राजनीति में मजबूत पकड़ बनाने के बाद हरिसिंह महुवा पंचायत समिति की राजनीति में पहुंचे और यहां भी प्रभाव स्थापित किया। इसके बाद विधानसभा चुनाव उनके राजनीतिक जीवन का निर्णायक मोड़ बने।

1980 में उन्होंने पहली बार महुवा विधानसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीता। यह मुकाबला बेहद करीबी था। हरिसिंह को 18,705 वोट मिले, जबकि भाजपा के किरोड़ीलाल को 18,689 वोट मिले—यानी जीत का अंतर महज 16 वोट था।

1985 में वे चुनाव हार गए। भाजपा के किरोड़ीलाल ने 37,101 वोट हासिल कर उन्हें 1,632 वोट से पराजित किया।

लेकिन यह हार उनके राजनीतिक सफर का अंत नहीं बनी।

1990, 1993 और 1998 में हरिसिंह ने लगातार तीन बार महुवा से कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की। इस तरह 1980 की जीत को मिलाकर वे कुल चार बार विधानसभा पहुंचे। 1998 में उन्होंने भाजपा के हरिज्ञान सिंह को 2,851 वोट से हराया।

यही वह दौर था जब महुवा से बाहर भी उनका राजनीतिक प्रभाव बढ़ता गया।

विधानसभा में बढ़ा कद, मुख्य सचेतक की जिम्मेदारी

लगातार चुनावी सफलता के बाद पार्टी और सरकार में उनका कद बढ़ा। वे कांग्रेस संगठन में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से जुड़े रहे।

राजस्थान विधानसभा के रिकॉर्ड के अनुसार 22 मार्च 1999 को उन्हें सरकारी मुख्य सचेतक बनाया गया और वे 4 दिसंबर 2003 तक इस पद पर रहे।

मुख्य सचेतक की जिम्मेदारी विधानसभा में सरकार के विधायी कामकाज और सदन में पार्टी के अनुशासन से जुड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हरिसिंह ने इस जिम्मेदारी के जरिए संगठन और सदन, दोनों में अपनी पकड़ दिखाई।

इसी राजनीतिक दौर में वे सरकार में मंत्री भी रहे और कांग्रेस के प्रभावशाली नेताओं में उनकी गिनती होने लगी।

महुवा से आगे पूर्वी राजस्थान तक प्रभाव

हरिसिंह महुवा की राजनीति केवल एक विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं रही। दौसा के साथ करौली और भरतपुर के आसपास के इलाकों में भी उनका प्रभाव माना जाता था।

वे कांग्रेस संगठन में प्रदेश स्तर की जिम्मेदारियों से जुड़े रहे। संगठन में काम करने का अनुभव और विधानसभा का लंबा कार्यकाल उनके राजनीतिक व्यक्तित्व के दो मजबूत आधार बने।

उनका राजनीतिक जुड़ाव राजेश पायलट और बाद में सचिन पायलट के दौर की कांग्रेस राजनीति से भी रहा। पूर्वी राजस्थान की गुर्जर राजनीति में पायलट परिवार के प्रभाव के बीच हरिसिंह महुवा की अपनी अलग राजनीतिक पहचान थी।

गुर्जर आरक्षण आंदोलन के दौर में भी वे सामाजिक और राजनीतिक चर्चाओं में सक्रिय रहे। 2010 में गुर्जर नेताओं की बैठकों में पूर्व मंत्री हरिसिंह महुवा की मौजूदगी का उल्लेख मिलता है।

गहलोत के भरोसेमंद नेताओं में गिने गए

1998 में राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनी और अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने। इसी राजनीतिक दौर में हरिसिंह महुवा सरकार और कांग्रेस संगठन के प्रमुख चेहरों में रहे। 1998-2003 की विधानसभा में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही और 1999 से 2003 तक मुख्य सचेतक का पद भी उनके पास रहा।

राजनीतिक हलकों में उन्हें गहलोत के भरोसेमंद नेताओं में गिना जाता था। हालांकि उनकी अपनी पहचान पूर्वी राजस्थान के जमीनी गुर्जर नेता की थी।

2003 में बदला चुनावी समीकरण

चार बार विधायक बनने के बाद 2003 का चुनाव उनके लिए निर्णायक साबित हुआ।

भाजपा ने इस बार हरिज्ञान सिंह को मैदान में उतारा। दिलचस्प बात यह थी कि 1998 में हरिसिंह महुवा ने हरिज्ञान सिंह को हराया था। पांच साल बाद हरिज्ञान सिंह ने पलटवार किया।

2003 में भाजपा के हरिज्ञान सिंह को 51,975 वोट मिले, जबकि कांग्रेस के हरि सिंह को 30,231 वोट मिले। हरिज्ञान सिंह ने 21,744 वोट के बड़े अंतर से जीत दर्ज की।

इस हार के साथ महुवा विधानसभा में हरिसिंह के लंबे चुनावी प्रभुत्व का दौर समाप्त हो गया।

इसके बाद महुवा की राजनीति में नए चेहरे और नए सामाजिक-राजनीतिक समीकरण उभरने लगे। 2008 में सीट पर निर्दलीय गोलमा देवी मीणा ने जीत दर्ज की और 2013 में भाजपा के ओमप्रकाश हुड़ला विजयी हुए।

लेकिन राजनीति से रिश्ता आखिरी दौर तक बना रहा

विधानसभा से बाहर आने के बाद भी हरिसिंह महुवा सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहे। सामाजिक कार्यक्रमों, गुर्जर समाज से जुड़े मुद्दों और क्षेत्रीय गतिविधियों में उनकी भागीदारी बनी रही।

2010 के एक कार्यक्रम में उन्हें पूर्व मंत्री के रूप में संबोधित किया गया, जबकि 2011 की एक रिपोर्ट में वे मुख्य सचेतक के रूप में कार्यक्रम की अध्यक्षता करते दिखाई देते हैं।

इससे यह साफ होता है कि चुनावी राजनीति से दूरी के बावजूद इलाके में उनकी राजनीतिक-सामाजिक मौजूदगी कायम थी।

निधन के बाद भी गांव से रिश्ता कायम

23 मार्च 2016 को हरिसिंह महुवा का निधन हुआ। उनके जाने के बाद उनके बेटे अजीत सिंह महुवा ने राजनीतिक-सामाजिक विरासत को आगे बढ़ाया और दौसा क्षेत्र में सक्रिय रहे।

हरिसिंह महुवा के निधन के बाद भी उनके पैतृक गांव खेड़ला बुजुर्ग में उनके नाम और काम की चर्चा बनी रही। वर्ष 2021 में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने खेड़ला बुजुर्ग में उनकी प्रतिमा का वर्चुअल अनावरण किया। इस मौके पर गहलोत ने उन्हें जमीन से जुड़ा नेता बताते हुए विधानसभा में मुख्य सचेतक सहित विभिन्न पदों पर उनकी भूमिका को याद किया। साथ ही खेड़ला बुजुर्ग को उप तहसील बनाने और गांव में खेल स्टेडियम का नाम हरिसिंह महुवा के नाम पर रखने की घोषणा की।

आज खेड़ला बुजुर्ग को उनके राजनीतिक सफर की शुरुआत से जोड़ा जाता है। स्थानीय स्तर पर उनके बेटे अजीत सिंह महुवा भी सक्रिय रहे हैं और परिवार की राजनीतिक-सामाजिक विरासत को आगे बढ़ाते रहे हैं।

चौपाल से सत्ता तक—यही थी हरिसिंह महुवा की पहचान

हरिसिंह महुवा की कहानी केवल चार बार विधायक बनने या मंत्री पद तक पहुंचने की कहानी नहीं है।

यह उस दौर की राजनीति का भी दस्तावेज है, जब गांव का सरपंच विधानसभा का रास्ता तय करता था और स्थानीय पकड़ ही किसी नेता की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी होती थी।

खेड़ला बुजुर्ग की ग्राम पंचायत से निकला यह नेता महुवा की राजनीति में लगातार चार बार विधानसभा पहुंचा, प्रदेश कांग्रेस संगठन में जिम्मेदारियां संभालीं, सरकार में मंत्री बना और विधानसभा के मुख्य सचेतक की कुर्सी तक पहुंचा।

1980 में महज 16 वोट की जीत से शुरू हुई विधानसभा की कहानी 1998 में चौथी जीत तक पहुंची और 2003 में चुनावी हार के साथ उसका एक अध्याय समाप्त हुआ।

लेकिन राजनीति में कुछ नाम चुनावी नतीजों से बड़े हो जाते हैं।

हरिसिंह महुवा उन्हीं नेताओं में रहे—जिनकी पहचान महुवा की सियासत, पूर्वी राजस्थान की गुर्जर राजनीति और गांव से उठकर सत्ता के गलियारों तक पहुंचने वाले जमीनी नेतृत्व के रूप में लंबे समय तक बनी रही।

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