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लोक टुडे न्युज़ नेटवर्क
दलित वोट भाजपा की ओर शिफ्ट होने लगा
*भाजपा का सही टिकट वितरण सत्ता और संगठन में भागीदारी देने से बढ़ा झुकाव
*दलित संविधान और आरक्षण विरोधी बयान बाजी पर लगे लगाम तो भाजपा को मिले और फायदा
कांग्रेस ने समझा सिर्फ वोट बैंक, सत्ता और संगठन में नहीं मिलती उचित भागीदारी!जयपुर। राजस्थान की राजनीति में दलित वोट लंबे समय तक कांग्रेस पार्टी का सबसे मजबूत और परंपरागत वोट बैंक माना जाता रहा है। कांग्रेस का मानना रहा है कि दलित समाज स्वाभाविक रूप से उसे ही समर्थन देता है। लेकिन हाल के वर्षों में यह समीकरण तेजी से बदलता दिखाई दे रहा है। चुनावी नतीजों और समाज के भीतर बढ़ती राजनीतिक जागरूकता ने संकेत दिया है कि दलित मतदाता अब कांग्रेस को “अपना प्राकृतिक विकल्प” नहीं मान रहा, बल्कि भाजपा की ओर भी बड़ी संख्या में झुकाव दिखा रहा है।
दलित समाज की नाराज़गी: पद, प्रतिनिधित्व और सम्मान पर सवाल
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि दलित समाज कांग्रेस से कई वर्षों से शिकायतें रखता आया है।
सत्ता में आने के बाद दलित समाज को सीमित, कम प्रभावी मंत्रालय मिलना
क्लास-1 विभाग या प्रमुख मंत्रालयों में कम प्रतिनिधित्व
संगठनात्मक ढांचों में दलित नेताओं की अनदेखी
आयोग/समिति जैसे कम राजनीतिक प्रभाव वाले पदों पर ही नियुक्ति
ये सभी कारण दलित समाज में यह धारणा मजबूत करते हैं कि कांग्रेस उन्हें केवल चुनावी मौसम में याद करती है लेकिन सत्ता में आने के बाद उनका वास्तविक सशक्तिकरण नहीं करती।
दलित संगठनों का आरोप है कि कांग्रेस अक्सर यह मानकर चलती है कि “दलित वोट उसके ही हिस्से में आएगा”, जबकि अब समाज के भीतर यह मानसिकता तेजी से टूट रही है।
हालिया चुनावों में भाजपा का लाभ
पिछले दो विधानसभा चुनावों के नतीजे इस बदलाव को स्पष्ट करते हैं।
राजस्थान में 33 एससी सीटों में से 27 पर भाजपा की जीत
कई क्षेत्रों में दलित वोट भाजपा की ओर खुलकर शिफ्ट
भाजपा द्वारा दलित नेतृत्व को महत्व देने की रणनीति सफल
भाजपा ने हाल के वर्षों में दलित नेतृत्व को संगठन और सरकार, दोनों में सक्रिय भूमिका दी है।
उपमुख्यमंत्री डॉ. प्रेमचंद बैरवा, शिक्षा मंत्री मदन दिलावर तथा मंत्री कमसा मेघवाल जैसे नाम इस रणनीति का हिस्सा हैं। संगठन में भी जितेंद्र गोठवाल जैसे नेताओं को प्रमुख जिम्मेदारियाँ मिली हैं।
इससे दलित समाज में यह संदेश गया कि भाजपा अब केवल सवर्ण नेतृत्व वाली पार्टी नहीं, बल्कि दलित समाज को भी मुख्य भूमिका में ला रही है।
कांग्रेस के भीतर आत्ममंथन की जरूरत
कांग्रेस के नेता यह बात स्वीकार कर चुके हैं कि दलित समाज के बीच पार्टी की पकड़ कमजोर हुई है।
कांग्रेस भले ही इस बार नेता प्रतिपक्ष को दलित समाज से लेकर आई है, लेकिन ज़मीन पर पार्टी का पारंपरिक वोट बैंक जैसी कोई स्थिति नहीं दिख रही।
सत्ता में आने पर हमारे लिए प्रमुख मंत्रालय क्यों नहीं?
हमारे नेताओं को निर्णयकारी भूमिका क्यों नहीं मिलती?
चुनाव के बाद हमारा महत्व क्यों कम हो जाता है?
यह सवाल कांग्रेस की पुरानी सोच को चुनौती देते हैं।
दलितों के खिलाफ बयानबाजी का असर, लेकिन फिर भी वोट में बदलाव जारी
भाजपा के कुछ नेताओं के विवादित बयान—संविधान बदलने, आरक्षण खत्म करने, या मनुस्मृति की बात करने—से दलित समाज में असहजता रहती है।
लेकिन इसके बावजूद दलित समाज भाजपा की ओर झुक रहा है, जिसका कारण है:
भाजपा सरकार द्वारा दलित नेताओं को मजबूत जिम्मेदारियाँ
– स्तर पर संगठन में सक्रिय भागीदारी
पंचायत, नगरपालिकाओं में दलित प्रतिनिधियों को बढ़ती भूमिका
मोदी सरकार द्वारा दलित कल्याण योजनाओं पर फोकस यानी विवादित बयानों का असर सीमित रहा, जबकि राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ती गई।
दलित मतदाता अब “स्थायी वोट बैंक” नहीं
राजस्थान समेत पूरे उत्तर भारत की राजनीति में यह बदलाव साफ दिखाई देता है—
दलित समाज अब किसी भी पार्टी को “अपना स्थायी विकल्प” मानकर वोट नहीं देता।
मतदाता अब
✔ मुद्दों
✔ प्रतिनिधित्व
✔ सम्मान
✔ और नेतृत्व की भागीदारी
के आधार पर फैसला ले रहा है।
दलित मतदाता भी आम नागरिक की तरह विकल्प चुनने की आज़ादी और राजनीतिक जागरूकता के साथ निर्णय ले रहा है।
निष्कर्ष: कांग्रेस को बदलना होगा रवैया, भाजपा को भी सावधान रहना होगा।दलित समाज के वोट अब कांग्रेस की “जन्मसिद्ध संपत्ति” नहीं हैं।
समाज समझ चुका है कि उसका वोट उसकी शक्ति है, किसी भी पार्टी का बंधुआ नहीं।
कांग्रेस को दलित नेतृत्व को वास्तविक अधिकार देना होगा
भाजपा को दलित विरोधी बयानों पर तुरंत कार्रवाई करनी होगी
दोनों पार्टियों के लिए दलित समाज अब निर्णायक और स्वतंत्र वोटर बन चुका है
राजस्थान समेत कई राज्यों में अगले चुनावों में दलित वोट का यह बदलाव बड़ा राजनीतिक असर दिखा सकता है।
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