लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
डोर-टू-डोर कचरा संग्रह से लेकर स्रोत पर कचरा अलग करने तक की व्यवस्था, लेकिन असली बदलाव नागरिकों के व्यवहार में नजर आया
स्वच्छ शहर सिर्फ व्यवस्था से नहीं बनता,लोगों की आदत से बनता है
भुवनेश्वर। किसी शहर की पहचान केवल उसकी इमारतों, चौड़ी सड़कों और बाजारों से नहीं होती। शहर की असली तस्वीर वहां की स्वच्छता, हरियाली और लोगों की जीवनशैली से सामने आती है।
ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में घूमते हुए एक बात खास तौर पर महसूस होती है—यहां सफाई केवल सरकार या नगर निकाय की जिम्मेदारी नहीं दिखाई देती, बल्कि आम नागरिक भी इसे अपनी जिम्मेदारी मानते हैं।
नगर निकाय की कचरा संग्रह व्यवस्था, नियमित सफाई, सार्वजनिक स्थानों की देखभाल और कचरे के प्रबंधन के साथ लोगों का सहयोग इस शहर को साफ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता नजर आता है।
यानी यहां संदेश सिर्फ यह नहीं है कि—
“सरकार सफाई करे।”
बल्कि सोच यह दिखाई देती है—
“सरकार व्यवस्था करे और नागरिक उसे सफल बनाएं।”
घर से कचरा उठाने की व्यवस्था, सड़क पर डालने की जरूरत नहीं
शहरी स्वच्छता व्यवस्था में डोर-टू-डोर कचरा संग्रह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ओडिशा की शहरी स्वच्छता नीति में घरों और संस्थानों से कचरा नियमित रूप से एकत्र करने, उसे अलग-अलग श्रेणियों में रखने और वैज्ञानिक तरीके से आगे भेजने पर जोर दिया गया है।
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यही है कि लोगों के सामने कचरा सड़क, खाली प्लॉट या नाले में डालने का बहाना नहीं रहता।
घर से कचरा उठाने की व्यवस्था हो और नागरिक उसे सही तरीके से सौंपें, तो सार्वजनिक जगहों पर गंदगी फैलने की संभावना काफी कम हो जाती है।
लेकिन भुवनेश्वर की कहानी सिर्फ यहां खत्म नहीं होती।
असली फर्क लोगों की आदतों में दिखाई देता है।

टैक्सी ड्राइवर ने यात्री को टोका, कहा- सड़क आपकी कूड़ेदान नहीं
भुवनेश्वर की यात्रा के दौरान सफाई को लेकर लोगों की सजगता का एक बेहद सामान्य लेकिन प्रभावी उदाहरण सामने आया।
कार में बैठे यात्रियों ने खाने के बाद गुटखे की पीक और रैपर सड़क पर फेंकने की कोशिश की।
टैक्सी चालक ने तुरंत रोक दिया।
उसका कहना था—
“सर, कचरा सड़क पर मत डालिए। गाड़ी में रख दीजिए, मैं इसे कचरा पात्र में डाल दूंगा।”
यह कोई सरकारी कर्मचारी नहीं था।
न कोई सफाई निरीक्षक…
न कोई चालान काटने वाला अधिकारी।
एक सामान्य टैक्सी चालक था।
लेकिन उसे पता था कि सड़क पर फेंका गया एक छोटा रैपर भी शहर की तस्वीर बिगाड़ सकता है।
यही जागरूकता किसी भी स्वच्छता अभियान की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।

भुवनेश्वर में सफाई देखकर सवाल नहीं, सीख लेने की जरूरत
अक्सर हम किसी साफ शहर में पहुंचकर पहला सवाल करते हैं—
“यहां सफाई कैसे होती है?”
लेकिन दूसरा सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण है—
“यहां के लोग कचरा कहां डालते हैं?”
भुवनेश्वर में सरकारी व्यवस्था के साथ नागरिकों की भूमिका पर ध्यान देना इसलिए जरूरी है क्योंकि कोई भी नगर निकाय हर नागरिक के पीछे सफाई कर्मचारी नहीं लगा सकता।
अगर एक व्यक्ति सड़क पर कचरा फेंके और दूसरा उसे देखकर चुप रहे, तो व्यवस्था पर दबाव बढ़ता जाएगा।
लेकिन अगर लोग स्वयं एक-दूसरे को रोकने लगें तो स्थिति बदल सकती है।
एक नागरिक की जागरूकता दूसरे नागरिक की आदत बदल सकती है।
दुकानदार भी सफाई व्यवस्था का हिस्सा
फल बेचने वाले हों, चाट की दुकान लगाने वाले हों या सड़क किनारे छोटे कारोबारी…
इनसे निकलने वाला कचरा किसी भी शहर के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
भुवनेश्वर में ऐसे स्थानों पर कचरे को निर्धारित पात्र में डालने और आसपास गंदगी नहीं फैलाने के लिए लोगों को प्रेरित किया जाता दिखाई देता है।
इसका सीधा फायदा सड़क और फुटपाथ पर दिखाई देता है।
दुकानदार का छोटा-सा कूड़ापात्र…
ग्राहक की छोटी-सी सावधानी…
और नगर निकाय की नियमित व्यवस्था…
तीनों मिलकर बड़ा बदलाव पैदा कर सकते हैं।
शहर की हरियाली भी नागरिक जिम्मेदारी का हिस्सा
भुवनेश्वर की एक और खासियत यहां दिखाई देने वाली हरियाली है।
सड़कों के किनारे पेड़-पौधे, खुले स्थान और साफ सार्वजनिक क्षेत्र शहर को अलग पहचान देते हैं।
लेकिन हरियाली सिर्फ पौधे लगाने से कायम नहीं रहती।
उसके लिए जरूरी है कि लोग पेड़ों के आसपास कचरा न डालें, सार्वजनिक स्थानों को नुकसान न पहुंचाएं और नगर निकाय द्वारा विकसित हरित क्षेत्रों को अपनी संपत्ति की तरह समझें।
पेड़ सरकार लगा सकती है, लेकिन उनकी देखभाल समाज को करनी पड़ती है।
सफाई कर्मचारी अपना काम कर रहे हैं, नागरिकों को अपना काम करना होगा
शहर की सफाई में सफाई कर्मचारियों की मेहनत सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है।
वे सुबह से सड़कों, बाजारों और सार्वजनिक स्थानों को साफ करने में जुटे रहते हैं।
लेकिन अगर सफाई होने के कुछ घंटे बाद ही लोग फिर कचरा डालना शुरू कर दें तो पूरी मेहनत बेअसर हो सकती है।
इसलिए स्वच्छता का सही मॉडल है—
सफाई कर्मचारी अपना काम करें, नगर निकाय व्यवस्था संभाले और नागरिक कचरा फैलाने से बचें।
तीनों में से कोई एक कड़ी कमजोर हुई तो परिणाम भी कमजोर होगा।
राजस्थान के शहरों के लिए भी बड़ा संदेश
राजस्थान के नगर निकायों के सामने भी यही चुनौती है।
अधिकारियों को देश-विदेश के स्वच्छ शहरों का अध्ययन कराने पर खर्च किया जाता है। यह अच्छी पहल हो सकती है, लेकिन उससे भी पहले हमें अपने देश के उन शहरों को देखना चाहिए जहां सरकारी तंत्र और नागरिक व्यवहार साथ-साथ काम करते हैं।
भुवनेश्वर, इंदौर और राजस्थान का डूंगरपुर ऐसे उदाहरण हैं जिनसे अलग-अलग स्तर पर सीख ली जा सकती है।
सवाल केवल यह नहीं कि नगर निगम कितनी बार सड़क साफ करता है।
सवाल यह भी है कि—
हम कितनी बार सड़क गंदी करते हैं?
सफाई की शुरुआत घर से नहीं, आदत से होती है
कचरा अलग करना…
कूड़ेदान का इस्तेमाल करना…
सड़क पर रैपर नहीं फेंकना…
पान या गुटखे की पीक सार्वजनिक जगह पर नहीं थूकना…
खाने के बाद बचा सामान नाली या सड़क पर नहीं डालना…
दुकान के सामने कचरा जमा न होने देना…
और अगर कोई दूसरा व्यक्ति गंदगी फैलाए तो विनम्रता से उसे रोकना…
ये छोटी बातें लग सकती हैं।
लेकिन शहर की तस्वीर इन्हीं छोटी आदतों से बनती है।
भुवनेश्वर से एक सीधा संदेश
भुवनेश्वर को देखकर यह समझने की जरूरत है कि स्वच्छता कोई एक दिन का अभियान नहीं है।
यह रोज की जिम्मेदारी है।
नगर निकाय कचरा उठाने की व्यवस्था कर सकता है…
सरकार नियम बना सकती है…
सफाई कर्मचारी सड़कें साफ कर सकते हैं…
लेकिन शहर को लगातार साफ रखने का काम नागरिकों की भागीदारी के बिना संभव नहीं है।
इसलिए अगली बार हाथ में कचरे का रैपर हो और सामने सड़क दिखाई दे तो एक पल रुकिए।
सड़क पर मत डालिए।
जेब में रखिए, गाड़ी में रखिए या कूड़ेदान तक पहुंचाइए।
और अगर कोई आपके सामने कचरा सड़क पर फेंकने लगे तो उसे रोकिए।
क्योंकि—

















































