लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
हैदराबाद। त्रयनगर स्थित कारवान दादावाड़ी में आयोजित श्री संघ शास्ता वर्षावास-2026 के अंतर्गत शुक्रवार को खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिन मणि प्रभसूरीश्वरजी महाराज ने अपने चातुर्मासिक मंगल प्रवचन में जीवन को सकारात्मक सोच, विनम्रता और सद्व्यवहार से संवारने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि “जीवन का दूसरा पन्ना हमें स्वयं लिखना है, इसलिए उसे प्रेम, नम्रता और मधुर व्यवहार से भरना चाहिए।”
आचार्यश्री ने कहा कि परम शांति और समाधि का अनुभव तभी संभव है, जब मनुष्य की सोच सकारात्मक, स्वभाव सरल, वाणी मधुर और हृदय पवित्र हो। उन्होंने कहा कि व्यक्ति अकेला नहीं जीता, बल्कि परिवार और समाज के बीच जीवन व्यतीत करता है। ऐसे में उसके व्यवहार और शब्दों का प्रभाव केवल उस पर नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज पर पड़ता है। एक व्यक्ति का सद्व्यवहार पूरे परिवार को स्वर्ग बना सकता है, जबकि उसका दुर्व्यवहार उसी घर को नरक में बदल सकता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य अक्सर दूसरों के व्यवहार का मूल्यांकन अधिक करता है और स्वयं का कम। यदि कोई हम पर क्रोध करे तो उसके क्रोध को देखने के बजाय उसके कारण को समझने का प्रयास करना चाहिए। कारण समझने पर प्रतिशोध नहीं, बल्कि करुणा का भाव उत्पन्न होता है। उन्होंने कहा कि अच्छा दिखने की नहीं, बल्कि अच्छा बनने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि जो वास्तव में अच्छा होता है, वही स्वतः अच्छा दिखाई देता है।
जीवन रूपी डायरी का दूसरा पन्ना हमारे हाथ में
आचार्यश्री ने जीवन की तुलना तीन पन्नों वाली एक डायरी से करते हुए कहा कि पहला पन्ना जन्म का और तीसरा पन्ना मृत्यु का है। ये दोनों हमारे पूर्व कर्मों के अनुसार पहले से लिखे जा चुके हैं, लेकिन बीच का दूसरा पन्ना कोरा होता है, जिसे लिखने का अधिकार केवल हमें मिला है। यही वर्तमान भविष्य का निर्माण करता है। इसलिए इस पन्ने को क्रोध, ईर्ष्या, कटुता और कठोर वचनों से नहीं, बल्कि प्रेम, नम्रता, मधुरता और सद्व्यवहार से भरना चाहिए।
उन्होंने भगवान श्रीराम का उदाहरण देते हुए कहा कि वनवास देने वाली माता कैकेयी के प्रति भी भगवान श्रीराम का सम्मान और श्रद्धा उतनी ही थी, जितनी माता कौशल्या के प्रति। यही उनके भगवानत्व का वास्तविक स्वरूप था।
संस्कारों से तय हो व्यवहार
प्रवचन के समापन में आचार्यश्री ने कहा कि हमारा व्यवहार सामने वाले के स्वभाव से नहीं, बल्कि अपने संस्कारों से निर्धारित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि अच्छे व्यक्ति के साथ अच्छा व्यवहार करना सामान्य बात है, लेकिन बुरे व्यक्ति के साथ भी भलाई करना ही परमात्मा का मार्ग है।
उन्होंने कहा कि जैसे लोहा नरम होकर उपयोगी औजार बनता है और सोना नरम होकर सुंदर आभूषण का रूप लेता है, उसी प्रकार मनुष्य भी विनम्रता और मधुर व्यवहार अपनाकर परमात्मा बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
प्रवचन के अंत में उपस्थित श्रद्धालुओं ने सद्व्यवहार, सकारात्मक सोच और विनम्रता को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।

















































