हेमराज तिवारी वरिष्ठ पत्रकार
मेरा उद्देश्य भारतीय समाज की गहराई में पैठ चुके विघटन पर चिंतन करना और ‘हम भारतीय’ के भाव को पुनर्जीवित करना है क्या आप साथ आयेंगे?
“मैं” का अंधकार और “हम” की उजड़ी हुई रोशनी: भारतीय समाज का सांस्कृतिक विघटन
भारतीय संस्कृति सदा से एक “हम” की संस्कृति रही है — जिसमें परिवार पहले आता है, फिर समाज, फिर राष्ट्र और अंत में “मैं”। यही वो सभ्यता थी जिसने हजारों वर्षों तक विविधताओं को अपनाया, सहा, समाहित किया। लेकिन आज, जब हम 21वीं सदी के “विकसित भारत” की ओर देख रहे हैं, तो सबसे बड़ी क्षति किसी इमारत की नहीं, किसी तकनीक की नहीं, बल्कि इस ‘हम’ की संस्कृति की है।
“मैं”, जो पहले आत्मज्ञान की ओर ले जाने वाला साधन था, आज अहंकार और स्वार्थ का हथियार बन चुका है।
हमारे पूर्वजों ने सिखाया था – “वसुधैव कुटुम्बकम्”, अर्थात “पूरा विश्व ही मेरा परिवार है”। यही सोच हमें मुसलमान आक्रांताओं के लिए भी अतिथि बनकर भूमि देने पर मजबूर करती है।
8वीं शताब्दी में जब अरब आक्रांता भारत में आए, तब दक्षिण भारत के शासकों ने उन्हें शरण, ज़मीन और सम्मान दिया।
यह ‘हम’ की शक्ति थी – जो बिना भय के दूसरों को अपनाने का साहस रखती थी।
लेकिन, 1947 में, इस ‘हम’ को चीरकर “मेरा धर्म, मेरा राष्ट्र” का नारा बुलंद हुआ।
भारत माता के दो टुकड़े हुए।
मगर तब भी, भारत ने “हम” का भाव नहीं छोड़ा।
लेकिन क्या आज भी हम वो ‘हम’ हैं?
वर्तमान परिदृश्य:
आज हम उस दौर में जी रहे हैं जहां:
परिवार अब संयुक्त नहीं, संयुक्त भ्रम है।
समाज अब विचारों का संगम नहीं, विचारों का युद्धभूमि है।
रिश्ते अब अपनत्व नहीं, औपचारिकता और पाखंड बन चुके हैं।
आज “मैं क्या पहनता हूँ, मैं क्या मानता हूँ, मैं क्या सोचता हूँ” – यही केंद्र है हर विचार का।
“हम क्या हैं?”, “हमारा कर्तव्य क्या है?” – ये प्रश्न अब नदारद हैं।
धर्म की भूमिका:
धर्म, जो कभी “धारण” करने वाला था
आज “विभाजन” का औज़ार बन चुका है।
जहाँ पहले धर्म आत्मा के विकास का साधन था,
आज वह राजनीतिक एजेंडा बन गया है।
हिंदू हो या मुसलमान, ईसाई हो या सिख — हर समुदाय में “मैं पहले” की होड़ है, “हम” की तलाश खो चुकी है।
सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न
बुज़ुर्ग उपेक्षित हैं, बच्चे डिप्रेशन में हैं।
शादी अब संस्कार नहीं, समझौता है।
त्योहार अब उत्सव नहीं, इंस्टाग्राम की रील हैं।
धर्म अब ध्यान नहीं, बहस बन गया है।
हमने ‘हम’ से इतना किनारा कर लिया है कि अब
“मैं ठीक हूँ” कहने वाले हज़ार मिलते हैं,
पर “तू कैसा है?” पूछने वाला कोई नहीं मिलता।
समाधान की ओर – ‘हम’ की वापसी
1. परिवार को पुनः प्राथमिकता दी जाए।
साथ बैठकर भोजन, संवाद, त्योहार — यह ‘हम’ की शुरुआत है।
2. बच्चों में ‘मैं’ नहीं, ‘हम’ का भाव भरें।
शिक्षा में सह-अस्तित्व, सेवाभाव, समाजहित का पाठ शामिल हो।
3. धर्म को आत्मकल्याण की ओर मोड़ें, विवाद नहीं।
हर धर्म का मूल है — “दूसरे के लिए भी जियो।”
4. सोशल मीडिया को सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ा जाए।
Likes से ज्यादा ज़रूरी है समझना और जोड़ना।
अगर हम अब भी नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियाँ ‘हम’ शब्द को सिर्फ इतिहास की किताबों में पढ़ेंगी।
भारत सिर्फ एक भूमि नहीं, एक विचार है — और वह विचार है “हम सब मिलकर एक हैं”।
ये देश एक परिवार है — और परिवारों को ‘मैं’ नहीं, ‘हम’ ही बचा सकते हैं।
आइए — फिर से “हम भारतीय” बनें।
advt















































