लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का इस्तीफा”
हेमराज तिवारी वरिष्ठ पत्रकार
21 जुलाई 2025 को एक ऐसी संवैधानिक घटना घटी जिसने देश के राजनैतिक गलियारों में न केवल हलचल मचा दी, बल्कि लोकतंत्र की गरिमा और नेतृत्व की जिम्मेदारी के बीच एक नया विमर्श भी खड़ा कर दिया। भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने स्वास्थ्य कारणों से अपने पद से इस्तीफा दे दिया। यह त्यागपत्र राष्ट्रपति को सौंपा गया और औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया गया।
जहां एक ओर यह इस्तीफा मानवीय दृष्टिकोण से सम्मानजनक प्रतीत होता है, वहीं यह देश की संवैधानिक व्यवस्था में खाली हुई दूसरी सर्वोच्च कुर्सी को लेकर राजनीतिक रणनीतियों, शक्ति संतुलन और भविष्य के संकेतों को भी उजागर करता है।
एक परिचय
जगदीप धनखड़ का जन्म 18 मई 1951 को राजस्थान के झुंझुनूं ज़िले में हुआ। पेशे से वकील और विचारधारा से स्पष्टवादी, धनखड़ का राजनीतिक करियर जनता दल से शुरू होकर भाजपा तक पहुंचा।
1989 में संसद सदस्य बने
1990 में केंद्रीय मंत्री बने
2019 में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के रूप में नियुक्त और 2022 में देश के 14वें उपराष्ट्रपति चुने गए ,उनकी पहचान एक ऐसे संवैधानिक पदाधिकारी के रूप में रही जिन्होंने कई बार सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को मंच से खुलकर नसीहत दी। राज्यसभा में उन्होंने गरिमामय आचरण के साथ-साथ राजनीतिक व्याख्यानों में संतुलन बनाए रखने की कोशिश की।
कारण और संकेत
आधिकारिक बयान में यह स्पष्ट किया गया कि श्री धनखड़ ने “स्वास्थ्य कारणों और चिकित्सकीय परामर्श” के चलते त्यागपत्र दिया है। उनकी उम्र 74 वर्ष है, और गत एक वर्ष में सार्वजनिक कार्यक्रमों में उनकी सक्रियता में कमी आई थी।
नेतृत्व की नैतिक जिम्मेदारी का प्रतीक हैव्यक्तिगत स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने की सीख है और साथ ही, संवैधानिक परंपराओं के सम्मान का आदर्श उदाहरण भी।
संवैधानिक दृष्टिकोण से इस्तीफे का प्रभाव
राज्यसभा की कुर्सी रिक्त
चूंकि उपराष्ट्रपति राज्यसभा के पदेन सभापति होते हैं, उनका इस्तीफा संसद के उच्च सदन की संचालन प्रणाली को सीधे प्रभावित करता है।
अनुच्छेद 66 और 67 की सक्रियता
अब संविधान के अनुच्छेद 66 (चुनाव की प्रक्रिया) और 67 (कार्यकाल समाप्ति या इस्तीफा) के अंतर्गत राष्ट्रपति को अगली कार्यवाही करनी होगी। 60 दिनों के भीतर चुनाव की संभावना
राष्ट्रपति को नई अधिसूचना जारी कर नए उपराष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया शुरू करनी होगी, जो संभवतः सितंबर 2025 तक पूरी हो सकती है।
राजनीतिक संकेत और संभावनाएं
यह इस्तीफा उस समय आया है जब 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद सत्ता समीकरणों में नया मोड़ आया है।
क्या NDA एक सर्वसम्मति वाले चेहरे को लाएगा?
क्या विपक्ष अपना साझा उम्मीदवार उतारेगा जैसा 2022 में मार्गरेट अल्वा को लाया गया था?
या यह एकमात्र अवसर है, जब दोनों पक्ष किसी गैर-राजनीतिक चेहरे को सामने लाकर संविधान की गरिमा बढ़ाएंगे?
यह सब आने वाले सप्ताहों में स्पष्ट होगा, लेकिन इतना तो तय है कि यह इस्तीफा एक खाली कुर्सी से ज्यादा, नेतृत्व की नई परिभाषा बनकर सामने आया है।
न्याय, गरिमा और विरासत
धनखड़ के कार्यकाल में कई कठिन बहसें, तीखी टकराहटें और कभी-कभी गर्मागर्म सत्र देखने को मिले। लेकिन इसके बीच उन्होंने राज्यसभा में अनुशासन, गरिमा और शब्दों की मर्यादा का ख्याल रखा।
उनकी आलोचना भी हुई — विशेषकर विपक्षी दलों से — कि वे सरकार की ओर झुके रहते हैं। परंतु उनके भाषणों में संसदीय व्यवस्था, भारत की सांस्कृतिक चेतना और संविधान के प्रति आस्था स्पष्ट रही।
त्याग और परंपरा का संगम
धनखड़ का इस्तीफा एक सामान्य संवैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि उस नेतृत्व की पहचान है जो कर्तव्य और स्वास्थ्य के बीच सही निर्णय चुनने की क्षमता रखता है।
यह इस्तीफा बताता है कि कोई भी पद — चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो — व्यक्ति से बड़ा नहीं होता। और व्यक्ति — अगर ईमानदार हो — तो खुद ही वह मिसाल बन जाता है, जो संविधान की किताब में नहीं, बल्कि लोगों के दिलों में दर्ज होती है।


















































