सत्ता में बीजेपी, फिर लोकतंत्र बचाने की रैली क्यों? विपक्ष के आरोपों का जवाब सड़क से क्यों ?

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

 लोकतंत्र बचाने की लड़ाई या सियासी शक्ति प्रदर्शन? सत्ता पक्ष के सड़क पर उतरने से उठे सवाल

लोक टुडे न्यूज | राजनीतिक विश्लेषण

देश की राजनीति में एक सवाल तेजी से चर्चा का विषय बन रहा है। केंद्र में पिछले करीब 12 वर्षों से भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार है। देश के अनेक राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं या उसके सहयोगी दल सत्ता में हैं। ऐसे राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा को लोकतंत्र बचाने के नाम पर रैलियां निकालने, शक्ति प्रदर्शन करने और विपक्ष के आरोपों का जवाब सड़क पर देने की जरूरत क्यों पड़ रही है?

लोकतंत्र में सरकार और विपक्ष की भूमिकाएं स्पष्ट मानी जाती हैं। सरकार का काम शासन चलाना, जनहित के फैसले लेना और जनता के प्रति जवाबदेह रहना है। वहीं विपक्ष की जिम्मेदारी सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना, गलतियों को सामने लाना और जनता की आवाज बनना है।

लेकिन जब सत्ता पक्ष ही लोकतंत्र बचाने की लड़ाई सड़क पर लड़ने उतर जाए, तो सवाल केवल राजनीतिक ताकत का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार और विपक्ष की भूमिका का भी खड़ा होता है।

सत्ता में रहते हुए लोकतंत्र बचाने की जरूरत क्यों?

भाजपा का तर्क है कि लोकतंत्र केवल सरकार बनाने तक सीमित नहीं है। चुनावी प्रक्रिया, संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता, जनता का विश्वास और राजनीतिक व्यवस्था की विश्वसनीयता भी लोकतंत्र के महत्वपूर्ण आधार हैं।

यदि विपक्ष चुनाव आयोग या चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर आरोप लगाता है, तो सत्ता पक्ष के लिए उसका जवाब देना स्वाभाविक है। भाजपा यह कह सकती है कि विपक्ष के आरोपों से लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा प्रभावित होती है और तथ्यों के साथ उनका जवाब देना जरूरी है।

लेकिन यहां एक बड़ा सवाल है।

यदि सरकार और उसके सहयोगी दल सत्ता में हैं, तो लोकतंत्र की रक्षा की जिम्मेदारी सबसे पहले सरकार की नहीं होनी चाहिए?

क्या सरकार को विपक्ष के आरोपों का जवाब प्रशासनिक तथ्यों, पारदर्शिता और संस्थागत प्रक्रियाओं के जरिए नहीं देना चाहिए?

सड़क पर उतरना राजनीतिक अधिकार है, लेकिन सत्ता में रहते हुए लोकतंत्र बचाने की लड़ाई का अर्थ और तरीका भी स्पष्ट होना चाहिए।

विपक्ष का विरोध गलत, तो सत्ता पक्ष का विरोध सही कैसे?

भारतीय राजनीति में धरना, प्रदर्शन, घेराव, काले झंडे और पुतला दहन लंबे समय से विरोध के स्थापित तरीके रहे हैं।

जब भाजपा विपक्ष में थी, तब उसने भी केंद्र और विभिन्न राज्यों की सरकारों के खिलाफ आंदोलन किए। सरकारों की नीतियों पर सवाल उठाए, विरोध प्रदर्शन किए और राजनीतिक दबाव बनाने के लिए सड़क का सहारा लिया।

यह लोकतंत्र का हिस्सा है।

आज कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल सरकार की नीतियों, चुनावी प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं को लेकर सवाल उठा रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाना उसका लोकतांत्रिक अधिकार है।

वहीं भाजपा का पक्ष है कि विपक्ष बिना पर्याप्त प्रमाण के आरोप लगाकर जनता को भ्रमित कर रहा है और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर चोट पहुंचा रहा है।

दोनों पक्षों के अपने तर्क हैं।

लेकिन सवाल यह है कि क्या आरोपों का जवाब आरोपों से और राजनीतिक विरोध का जवाब शक्ति प्रदर्शन से ही दिया जाएगा?

लोकतंत्र में सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन सवालों का जवाब देना सत्ता की जिम्मेदारी।

यदि विपक्ष के आरोप गलत हैं, तो सरकार को तथ्यों के साथ उन्हें खारिज करना चाहिए। और यदि आरोपों में कोई तथ्य है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

लोकतंत्र में किसी भी पक्ष को केवल राजनीतिक सुविधा के आधार पर सही या गलत नहीं ठहराया जा सकता।

पुतला दहन और काले झंडे: विरोध का अधिकार या कानून का उल्लंघन?

राजनीतिक विरोध के तरीकों को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

कभी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के पुतले जलाना, काले झंडे दिखाना और मुर्दाबाद के नारे लगाना राजनीतिक आंदोलनों का हिस्सा हुआ करता था।

आज कई स्थानों पर ऐसे प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई, गिरफ्तारी और मुकदमों की खबरें सामने आती हैं।

यहां यह समझना जरूरी है कि हर विरोध प्रदर्शन कानून के दायरे में नहीं होता। हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान, धमकी, रास्ता रोकने या कानून व्यवस्था बिगाड़ने जैसी गतिविधियों पर कार्रवाई हो सकती है।

लेकिन शांतिपूर्ण विरोध और कानून का उल्लंघन एक ही बात नहीं हैं।

किसी नेता को काला झंडा दिखाना अपने आप में हिंसा नहीं है। सरकार के खिलाफ नारे लगाना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति की अभिव्यक्ति है।

यदि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ केवल राजनीतिक विरोध के कारण कार्रवाई होती है, तो यह लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर चिंता पैदा करता है।

दूसरी ओर, यदि प्रदर्शन की आड़ में हिंसा या सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाया जाता है, तो कानून का पालन भी जरूरी है।

असल सवाल यह है कि कानून का इस्तेमाल सभी राजनीतिक दलों के लिए समान रूप से हो रहा है या विरोध करने वालों के राजनीतिक परिचय के आधार पर कार्रवाई का तरीका बदल जाता है?

इसका जवाब सरकारों को पारदर्शी कार्रवाई और निष्पक्ष जांच के जरिए देना चाहिए।

चुनाव आयोग पर आरोप और भाजपा का जवाब

वर्तमान राजनीतिक विवाद में विपक्ष की ओर से चुनाव आयोग और चुनावी प्रक्रिया को लेकर आरोप लगाए जा रहे हैं।

विपक्ष का कहना है कि चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता, मतदाता सूची और संस्थाओं की निष्पक्षता जैसे मुद्दों पर सवाल उठाना जरूरी है। उसका दावा है कि लोकतंत्र में चुनाव केवल मतदान कराने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि मतदाता के विश्वास की व्यवस्था भी है।

भाजपा इन आरोपों को राजनीतिक अभियान का हिस्सा मान सकती है। उसका कहना है कि विपक्ष चुनावी हार या राजनीतिक असफलता के बाद संस्थाओं पर सवाल उठाकर जनता को गुमराह कर रहा है।

लेकिन यहां भी एक बुनियादी प्रश्न है।

यदि चुनाव आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष है, तो उसे आरोपों का जवाब देने के लिए राजनीतिक दलों की रैलियों पर निर्भर क्यों होना चाहिए?

चुनाव आयोग की विश्वसनीयता राजनीतिक दलों के समर्थन या विरोध से नहीं, बल्कि उसके निर्णयों, प्रक्रियाओं और पारदर्शिता से तय होती है।

विपक्ष को भी आरोप लगाने के साथ प्रमाण प्रस्तुत करने चाहिए। केवल राजनीतिक बयानबाजी से किसी संस्था की निष्पक्षता पर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

और सत्ता पक्ष को भी यह समझना होगा कि संस्थाओं पर उठने वाले सवालों का जवाब राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन से नहीं, बल्कि संस्थागत विश्वास मजबूत करके दिया जाता है।

सरकार सबकी है या केवल भाजपा की?

यह सवाल राजनीतिक बहस के केंद्र में होना चाहिए।

सरकार किसी एक पार्टी की चुनावी जीत से बनती जरूर है, लेकिन शासन पूरे देश और प्रदेश के नागरिकों के लिए होता है।

विपक्ष के नेता, उनके समर्थक और सरकार की आलोचना करने वाले नागरिक भी उसी लोकतांत्रिक व्यवस्था के हिस्से हैं।

यदि विपक्ष सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करता है, तो उसे केवल राजनीतिक दुश्मनी के रूप में देखना लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप नहीं है।

इसी तरह विपक्ष को भी सरकार के हर फैसले का विरोध केवल विरोध के लिए नहीं करना चाहिए।

सरकार के अच्छे कामों को स्वीकार करना और गलत फैसलों पर सवाल उठाना, दोनों लोकतंत्र की स्वस्थ परंपरा हैं।

लेकिन जब राजनीतिक माहौल ऐसा बन जाए कि सरकार से सवाल पूछने पर जवाब विपक्षी नेताओं या पार्टी कार्यकर्ताओं के माध्यम से दिया जाए, तो जवाबदेही की मूल भावना कमजोर पड़ सकती है।

सरकार का जवाब सरकार को देना चाहिए। राजनीतिक दलों का जवाब राजनीतिक दल दे सकते हैं, लेकिन शासन की जिम्मेदारी से सत्ता पक्ष बच नहीं सकता।

क्या लोकतंत्र बचाने की रैली राजनीतिक फैशन बन रही है?

यह सवाल भाजपा की रैलियों पर भी लागू होता है और विपक्ष के आंदोलनों पर भी।

लोकतंत्र बचाने का नारा तभी सार्थक है, जब उसके पीछे स्पष्ट मुद्दे, ठोस तथ्य और लोकतांत्रिक सुधारों की मांग हो।

यदि रैली केवल राजनीतिक ताकत दिखाने, विरोधियों को चुनौती देने या चुनावी माहौल बनाने का माध्यम बन जाती है, तो लोकतंत्र बचाने का मूल उद्देश्य पीछे छूट सकता है।

सत्ता पक्ष के लिए यह सवाल इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसके पास शासन चलाने और संस्थागत सुधार करने की जिम्मेदारी भी है।

विपक्ष के लिए भी यह जरूरी है कि वह केवल आरोपों तक सीमित न रहे। उसे वैकल्पिक नीतियां, प्रमाण और समाधान सामने रखने चाहिए।

लोकतंत्र में सड़क पर उतरना गलत नहीं है। लेकिन सड़क पर उतरने का उद्देश्य क्या है, यह जरूर स्पष्ट होना चाहिए।

क्या भाजपा चुनाव आयोग पर लगाए गए आरोपों का जवाब देने के लिए रैली कर रही है? क्या वह विपक्ष के आरोपों को खारिज करने के लिए राजनीतिक अभियान चला रही है? या फिर यह आगामी चुनावों से पहले अपने समर्थकों को एकजुट करने की रणनीति है?

इन सवालों का जवाब राजनीतिक दलों के बयानों और उनके वास्तविक कार्यक्रमों से ही सामने आ सकता है। केवल रैली के नाम से उसकी मंशा तय करना उचित नहीं होगा।

लोकतंत्र में विरोध भी जरूरी, जवाबदेही भी

लोकतंत्र की मजबूती इस बात से नहीं मापी जाती कि सत्ता पक्ष कितनी बड़ी रैली करता है या विपक्ष कितने प्रदर्शन करता है।

लोकतंत्र की असली परीक्षा तब होती है, जब सरकार आलोचना को स्वीकार करती है, विपक्ष जिम्मेदारी से सवाल उठाता है और संवैधानिक संस्थाएं बिना राजनीतिक दबाव के काम करती हैं।

यदि विपक्ष को शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार नहीं मिलता, तो लोकतंत्र कमजोर होता है।

यदि विपक्ष बिना प्रमाण आरोप लगाता है, तो लोकतांत्रिक बहस की विश्वसनीयता कमजोर होती है।

यदि सत्ता पक्ष हर आलोचना को राजनीतिक साजिश बताकर खारिज करता है, तो जवाबदेही कमजोर होती है।

और यदि सरकार अपने काम का जवाब देने के बजाय केवल राजनीतिक विरोधियों से भिड़ने में समय लगाए, तो जनता के मूल मुद्दे पीछे छूट सकते हैं।

सबसे बड़ा सवाल: लोकतंत्र बचाने की जिम्मेदारी किसकी?

लोकतंत्र किसी एक राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है।भाजपा सत्ता में हो या विपक्ष में, कांग्रेस सरकार में हो या विपक्ष में, सभी दलों की जिम्मेदारी लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करना है।

लेकिन शासन की जिम्मेदारी जिस दल के पास है, उससे जवाबदेही की अपेक्षा भी अधिक होती है।

विपक्ष का काम सवाल पूछना है। सत्ता पक्ष का काम जवाब देना है।

विपक्ष को विरोध का अधिकार है, लेकिन उसे प्रमाण और जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल करना चाहिए।

सरकार को कार्रवाई का अधिकार है, लेकिन उसे कानून के समान और निष्पक्ष इस्तेमाल के साथ लागू करना चाहिए।

लोकतंत्र में विरोधी विचारों का होना कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी ताकत है।

यदि सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करना लोकतंत्र का हिस्सा है, तो सरकार के पक्ष में प्रदर्शन करना भी अधिकार है। लेकिन किसी भी पक्ष को यह अधिकार नहीं कि वह दूसरे पक्ष की लोकतांत्रिक आवाज को दबाने की कोशिश करे।

आज भाजपा की लोकतंत्र बचाओ रैलियों से उठ रहा सवाल केवल भाजपा तक सीमित नहीं है। यह पूरे राजनीतिक तंत्र से जवाब मांगता है।

क्या लोकतंत्र बचाने की लड़ाई वास्तव में लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने के लिए है?

क्या विपक्ष के आरोपों का जवाब तथ्यों से दिया जाएगा?

क्या शांतिपूर्ण विरोध को राजनीतिक पहचान से ऊपर उठकर देखा जाएगा?

और क्या सत्ता पक्ष यह स्वीकार करेगा कि लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना सरकार के खिलाफ होना नहीं, बल्कि लोकतंत्र के प्रति जिम्मेदारी निभाना है?

क्योंकि लोकतंत्र केवल सत्ता में बने रहने का नाम नहीं है। लोकतंत्र सत्ता से सवाल पूछने, जवाब मांगने और असहमति को सम्मान देने की व्यवस्था है।

सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, यदि लोकतंत्र बचाने की बात कर रहे हैं, तो सबसे पहले लोकतंत्र की उन मर्यादाओं का पालन करना होगा, जिनकी रक्षा का दावा किया जा रहा है।

यही लोकतंत्र की असली कसौटी है।

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