विश्वेंद्र सिंह का कांग्रेस को ‘राम-राम’, कार्रवाई से पहले खुद छोड़ी पार्टी

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

कांग्रेस से विश्वेंद्र सिंह का इस्तीफा: कार्रवाई से पहले खुद छोड़ी पार्टी, अब BJP में जाने की अटकलें तेज

गोविंद सिंह डोटासरा से विवाद के बाद उठाया कदम

नीरज मेहरा वरिष्ठ संवाददाता

जयपुर। राजस्थान कांग्रेस में चल रही अंदरूनी खींचतान के बीच भरतपुर के दिग्गज नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री विश्वेंद्र सिंह ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है। पिछले कुछ दिनों से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा को लेकर उनके तीखे बयानों के बाद पार्टी के भीतर उनके खिलाफ कार्रवाई की चर्चाएं चल रही थीं। इसी बीच विश्वेंद्र सिंह ने पार्टी की ओर से किसी अनुशासनात्मक कार्रवाई का इंतजार करने के बजाय खुद ही कांग्रेस से नाता तोड़ लिया।

विश्वेंद्र सिंह ने अपने इस्तीफे के साथ कांग्रेस नेतृत्व और प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। इससे पहले उन्होंने भरतपुर में नगर निकाय चुनावों में टिकट वितरण को लेकर भी सवाल उठाए थे और डोटासरा के इस्तीफे की मांग की थी। उनके बयानों के बाद कांग्रेस के भीतर विवाद खुलकर सामने आ गया था।

इस्तीफे से पहले बढ़ता गया टकराव

विश्वेंद्र सिंह और कांग्रेस प्रदेश नेतृत्व के बीच टकराव अचानक नहीं हुआ। पिछले दिनों उन्होंने पार्टी संगठन और टिकट वितरण को लेकर सार्वजनिक रूप से नाराजगी जाहिर की। इसके बाद भरतपुर और डीग के कांग्रेस जिला नेतृत्व की ओर से उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग किए जाने की खबरें सामने आईं।

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज हुई कि पार्टी उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकती है। हालांकि कांग्रेस की ओर से कार्रवाई की औपचारिक घोषणा होने से पहले ही विश्वेंद्र सिंह ने इस्तीफा दे दिया।

‘स्वाभिमान’ को बनाया इस्तीफे का आधार

इस्तीफा देते हुए विश्वेंद्र सिंह ने कांग्रेस में अपने अनुभव और पार्टी की मौजूदा कार्यशैली को लेकर तीखी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने अपने संदेश में कहा कि पार्टी में बने रहना उनके लिए मुश्किल हो गया था और उन्होंने स्वाभिमान के साथ अलग होने का फैसला किया।

विश्वेंद्र सिंह का यह कदम ऐसे समय आया है, जब राजस्थान कांग्रेस हालिया नगर निकाय चुनावों के बाद संगठन के भीतर उठ रहे सवालों से जूझ रही है। भरतपुर और डीग में भी चुनावी प्रदर्शन और संगठन की भूमिका को लेकर पार्टी के भीतर मतभेद सामने आए हैं।

विश्वेंद्र सिंह के लिए पार्टी बदलना नया नहीं

विश्वेंद्र सिंह का राजनीतिक सफर कई दलों से होकर गुजरा है। वे जनता दल से जुड़े, बाद में भाजपा में गए और लंबे समय तक भाजपा की राजनीति की। 2008 में उन्होंने भाजपा छोड़कर कांग्रेस का दामन थामा। कांग्रेस में रहते हुए वे राजस्थान की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका में रहे और अशोक गहलोत सरकार में कैबिनेट मंत्री भी बने।

उनके राजनीतिक सफर में 2020 का घटनाक्रम भी अहम रहा, जब सचिन पायलट के नेतृत्व वाले विद्रोह में उनके शामिल होने के बाद उन्हें गहलोत मंत्रिमंडल से हटा दिया गया था। बाद में वे फिर सरकार में शामिल हुए।

यानी विश्वेंद्र सिंह के लिए पार्टी बदलना या नेतृत्व से टकराव का यह पहला मामला नहीं है। उनका राजनीतिक इतिहास बताता है कि वे कई बार अपनी पार्टी के नेतृत्व से असहमति के कारण अलग राह अपनाते रहे हैं।

पत्नी दिव्या सिंह का भी रहा अलग राजनीतिक सफर

विश्वेंद्र सिंह की पत्नी दिव्या सिंह भी सक्रिय राजनीति में रही हैं। वे भाजपा के टिकट पर भरतपुर से लोकसभा सांसद रह चुकी हैं। इसके बाद उन्हें राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) का सदस्य बनाया गया था। 2012 में उन्होंने RPSC सदस्य पद से इस्तीफा दिया था।

इस परिवार की राजनीति भी भरतपुर के राजनीतिक समीकरणों से लंबे समय से जुड़ी रही है। विश्वेंद्र सिंह और दिव्या सिंह दोनों ने अलग-अलग समय में सक्रिय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं।

अब अगला कदम क्या? BJP में जाने की चर्चा

विश्वेंद्र सिंह के कांग्रेस छोड़ने के बाद सबसे बड़ा सवाल उनके अगले राजनीतिक कदम को लेकर है। राजनीतिक हलकों में उनके भाजपा में जाने की अटकलें तेज हैं। हालांकि अभी उनके भाजपा में शामिल होने की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, इसलिए इसे फिलहाल राजनीतिक संभावना और चर्चा के रूप में ही देखा जा रहा है।

कुछ राजनीतिक विश्लेषण इसे अशोक गहलोत खेमे से उनकी निकटता और कांग्रेस के भीतर चल रहे सत्ता-संगठन संघर्ष के संदर्भ में भी देख रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, उनके लंबे समय से संगठनात्मक रूप से सक्रिय नहीं रहने और प्रदेश नेतृत्व से बढ़ती दूरी को भी इस्तीफे की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भरतपुर की राजनीति पर पड़ेगा असर?

विश्वेंद्र सिंह के इस्तीफे का सबसे सीधा असर भरतपुर-डीग क्षेत्र की राजनीति में देखने को मिल सकता है। भरतपुर की राजनीति में जाट मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। ऐसे में यदि विश्वेंद्र सिंह भविष्य में भाजपा के साथ जाते हैं तो स्थानीय स्तर पर राजनीतिक समीकरणों में बदलाव की संभावना पर चर्चा स्वाभाविक है।

हालांकि इसका वास्तविक असर कितना होगा, यह उनके अगले राजनीतिक कदम, संगठनात्मक भूमिका और स्थानीय नेताओं के साथ समीकरण पर निर्भर करेगा। फिलहाल इतना जरूर है कि विश्वेंद्र सिंह के कांग्रेस से बाहर होने के साथ राजस्थान कांग्रेस के भीतर चल रहा विवाद एक नए राजनीतिक मोड़ पर पहुंच गया है।

निकाय चुनावों के बाद पहले से ही संगठनात्मक सवालों का सामना कर रही कांग्रेस के लिए भरतपुर के पुराने और प्रभावशाली नेता का पार्टी छोड़ना एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि विश्वेंद्र सिंह अपनी अगली राजनीतिक पारी किस मंच से शुरू करते हैं।

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