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संझा पर्व की विदाई, सोलह दिन बाद देवी का विसर्जन

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लोक टुडे न्यूज नेटवर्क

गंगधार, झालावाड़ (सुनील निगम)। नवरात्रि के प्रमुख पर्वों में से एक संझा पर्व का आज पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ विसर्जन किया गया। यह पर्व मुख्य रूप से मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात सहित कई क्षेत्रों में बड़े उत्साह और आस्था के साथ मनाया जाता है।

संझा पर्व भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन मास की अमावस्या तक चलता है। श्राद्ध पूजा के बाद इसका आरंभ होता है और नवरात्रि, रामलीला, झांकियों के साथ यह पर्व दशहरे तक उत्साह का माहौल बनाए रखता है।

संझा पर्व की परंपराएं

गांवों और कस्बों में लड़कियां घरों के बाहर, दरवाजों और दीवारों पर गाय के गोबर से कलात्मक आकृतियां बनाती हैं। संझा देवी की आकृतियों को हार, चूड़ियां, फूल-पत्तों, रंग-बिरंगे कपड़ों और सिंदूर से सजाया जाता है।

संध्या समय महिलाएं और बालिकाएं एकत्र होकर पूजन करती हैं, घी का दीपक जलाया जाता है और देवी को भोग अर्पित किया जाता है। इसके बाद संझा देवी के गीत गाए जाते हैं, भजन-कीर्तन और नृत्य होता है। प्रतिदिन अलग-अलग घरों से प्रसाद सामग्री वितरित की जाती है।

उत्साह और कलाकृतियां

अंतिम पांच दिनों में विशेष कलाकृतियां जैसे हाथी-घोड़े, किला-कोट, जाढी जसोदा, पतली पेमा, चांद-सूरज और गाड़ी आदि बनाई जाती हैं।

अमावस्या पर विसर्जन

आज अमावस्या के दिन सोलह दिन चले इस संझा पर्व का समापन हुआ और संझा देवी का विसर्जन किया गया। पर्व के दौरान महिलाओं और बालिकाओं में विशेष उत्साह देखने को मिला।

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