लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
चौमहला (झालावाड़)। रक्षाबंधन के पावन पर्व पर चौमहला क्षेत्र की ग्रामीण महिलाएं गोबर से आकर्षक और पर्यावरण अनुकूल राखियां तैयार कर आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रही हैं। यह पहल जहां महिलाओं को रोजगार का अवसर दे रही है, वहीं गौसंरक्षण और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी पहुंचा रही है।
सहकार भारती, गौपियर गौसेवा संरक्षण समिति भवानीमंडी और एस.एस. सोनोग्राफी सेंटर चौमहला के संयुक्त प्रयास से शुरू की गई इस पहल का उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ना और गौ आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है।
एस.एस. सोनोग्राफी सेंटर की संचालिका डॉ. रेखा वर्मा ने बताया कि महिला सशक्तिकरण और गौ-आर्थिक तंत्र को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इस अभियान की शुरुआत गोलखेड़ी गांव से की गई। यहां महिलाओं को गोबर से राखियां और दीपक बनाने का प्रशिक्षण दिया गया।
इसके बाद गंगधार क्षेत्र के गोलखेड़ी, पीपाखेड़ी, बोरखेड़ी सहित कई गांवों की महिला स्वयं सहायता समूहों को गौमय उत्पाद तैयार करने का प्रशिक्षण दिया गया। वर्तमान में चौमहला, पीपाखेड़ी, गोलखेड़ी, बिलावली, बोरखेड़ी और जेताखेड़ी सहित कई गांवों की महिलाएं इस कार्य से जुड़कर स्वरोजगार प्राप्त कर रही हैं।
महिलाओं द्वारा तैयार की जा रही राखियों में गाय के गोबर, काली मिट्टी और प्राकृतिक गोंद का उपयोग किया जा रहा है। इसके बाद गोटा-पत्ती, मोती, नग और अन्य सजावटी सामग्री से इन्हें आकर्षक रूप दिया जाता है। आधुनिक डिजाइन और बेहतर फिनिशिंग के कारण इन राखियों की मांग भी बढ़ रही है। लखनऊ सहित कई शहरों से इनके ऑर्डर मिलने लगे हैं।
महिलाओं ने बताया कि गांवों में गोबर से कच्चा माल तैयार किया जाता है, जिसे चौमहला केंद्र पर लाकर डिजाइनिंग, सजावट और पैकिंग के बाद बाजार के लिए तैयार किया जाता है। वर्तमान में प्रतिदिन करीब 250 से 300 राखियां तैयार की जा रही हैं, जिससे महिलाओं की आय बढ़ रही है और वे आर्थिक रूप से मजबूत बन रही हैं।
सहकार भारती के विपणन विभाग अध्यक्ष रविंद्र कुमार जायसवाल ने इस पहल को ग्रामीण स्वरोजगार का उत्कृष्ट उदाहरण बताया। वहीं सहकार भारती के वरिष्ठ राष्ट्रीय पदाधिकारी तुषार कुमार श्रीवास्तव और अनुराधा श्रीवास्तव ने महिलाओं को गोबर से दीपक एवं अन्य गौमय उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण देकर ग्रामीण क्षेत्रों में गौ आधारित उद्योगों की संभावनाओं पर जोर दिया।
डॉ. रेखा वर्मा ने बताया कि रक्षाबंधन के बाद संस्था का लक्ष्य एक करोड़ गोबर के दीपक तैयार करने का है। इसके अलावा गोबर से धार्मिक एवं सजावटी मूर्तियों सहित अन्य पर्यावरण हितैषी उत्पाद भी तैयार किए जाएंगे।
यह पहल साबित कर रही है कि स्थानीय संसाधनों, प्रशिक्षण और नवाचार के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है, साथ ही गौसंरक्षण और पर्यावरण संरक्षण को भी नई दिशा दी जा सकती है।