लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
सामाजिक संगठनों और श्रमिक आंदोलनों से राजनीति तक पहुंचे बैरवा ने 1962, 1967 और 1971 में दर्ज की जीत
नीरज मेहरा वरिष्ठ पत्रकार
राजनीति में पहचान बनाने के लिए बड़े राजनीतिक परिवार या सत्ता की विरासत हमेशा जरूरी नहीं होती। सामाजिक सरोकार, संगठनात्मक सक्रियता और जनता के बीच लगातार काम करने की प्रतिबद्धता भी किसी व्यक्ति को संसद तक पहुंचा सकती है। कोटा के पूर्व सांसद ओंकार लाल बैरवा का राजनीतिक सफर इसी बात को सामने रखता है। निर्माण और सड़क ठेकेदारी से जुड़े बैरवा ने सामाजिक संगठनों और कर्मचारी यूनियनों के बीच काम किया और भारतीय जनसंघ के टिकट पर लगातार तीन लोकसभा चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक पहचान बनाई।
कोटा में जन्म, सामाजिक संगठनों से जुड़ाव
ओंकार लाल बैरवा का जन्म जनवरी 1916 में कोटा में हुआ था। उनके पिता का नाम किशन लाल था। पेशे से निर्माण और सड़क ठेकेदारी से जुड़े बैरवा सार्वजनिक जीवन में भी सक्रिय रहे।
वे अखिल भारतीय बैरवा महासभा, कोटा की बैरवा सुधार समिति और विभिन्न कर्मचारी संगठनों से जुड़े थे। रेलवे तथा डाक-तार कर्मचारियों के संगठनों के अलावा जिला परिषद, यातायात समिति और जिला स्वास्थ्य समिति जैसी संस्थाओं में भी उनकी भागीदारी रही। सामाजिक और श्रमिक संगठनों से जुड़ाव ने उन्हें सार्वजनिक जीवन में पहचान दिलाई और आगे चलकर उनकी राजनीतिक यात्रा का आधार तैयार किया।
1957 का चुनाव: एक जैसे नाम, लेकिन अलग-अलग नेता
ओंकार लाल बैरवा के राजनीतिक इतिहास में 1957 का लोकसभा चुनाव एक महत्वपूर्ण प्रसंग है। इस चुनाव में कोटा की दो-सदस्यीय लोकसभा सीट से कांग्रेस के ओंकार लाल निर्वाचित हुए थे। चुनावी रिकॉर्ड में उनके पिता का नाम जमना लाल दर्ज है।
इसी चुनाव में किशन लाल के पुत्र ओंकार लाल ने भारतीय जनसंघ के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
इसलिए कांग्रेस से सांसद बने ओंकार लाल और बाद में जनसंघ के टिकट पर लगातार तीन बार लोकसभा पहुंचने वाले ओंकार लाल बैरवा को एक ही व्यक्ति मानना सही नहीं है। नाम की समानता के कारण दोनों के राजनीतिक इतिहास में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।
1962 में पहली बार पहुंचे लोकसभा
ओंकार लाल बैरवा की संसदीय सफलता का सिलसिला 1962 के लोकसभा चुनाव से शुरू हुआ। उस समय कोटा की लोकसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित थी। भारतीय जनसंघ ने बैरवा को उम्मीदवार बनाया और उनका मुकाबला कांग्रेस के ओंकार लाल से हुआ।
उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के अनुसार, बैरवा को 96,421 वोट मिले, जबकि कांग्रेस उम्मीदवार को 82,716 मत प्राप्त हुए। इस तरह उन्होंने 13,705 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की और पहली बार लोकसभा पहुंचे।
यह जीत उनके राजनीतिक जीवन का निर्णायक पड़ाव बनी। सामाजिक संगठनों और कर्मचारी गतिविधियों से जुड़े नेता के रूप में पहचान बनाने के बाद अब उन्हें संसद में कोटा का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला।
1967 में दूसरी बार जीत, कांग्रेस के ओंकार लाल को हराया
पहली जीत के बाद ओंकार लाल बैरवा ने 1967 के लोकसभा चुनाव में भी अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखी। भारतीय जनसंघ के उम्मीदवार के रूप में उन्हें 1,51,258 वोट मिले, जबकि कांग्रेस के ओंकार लाल को 1,25,375 मत प्राप्त हुए।
बैरवा ने 25,883 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की।
इस चुनाव की खास बात यह थी कि जीतने वाले और हारने वाले दोनों उम्मीदवारों का नाम ओंकार लाल था, लेकिन दोनों अलग-अलग व्यक्ति थे। लगातार दूसरी जीत ने बैरवा की संसदीय स्थिति को मजबूत किया और कोटा की राजनीति में उनकी पहचान को और स्थापित किया।
1971 में तीसरी जीत, कोटा में कायम रहा जनाधार
1971 के लोकसभा चुनाव में ओंकार लाल बैरवा ने लगातार तीसरी बार जीत हासिल की। इस चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के धन्ना लाल को 33,251 वोटों से हराया।
1962, 1967 और 1971 में लगातार जीत दर्ज कर उन्होंने तीन लोकसभा कार्यकालों तक कोटा का प्रतिनिधित्व किया। उनकी यह उपलब्धि उस दौर में उनके मजबूत चुनावी आधार और जनसंघ के साथ उनकी राजनीतिक पहचान को दर्शाती है।
लगातार तीन चुनाव जीतना उनके संसदीय जीवन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि रही।
आंदोलनों में सक्रियता और गिरफ्तारियों का उल्लेख
ओंकार लाल बैरवा की राजनीति केवल चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं रही। जनसंघ से संबंधित जीवनी में विभिन्न आंदोलनों के दौरान उनकी गिरफ्तारियों का उल्लेख मिलता है।
महंगाई के खिलाफ आंदोलन, कच्छ के रण से जुड़ा आंदोलन और राजस्थान रोडवेज पर करों के विरोध में हुई हड़ताल जैसे प्रसंग उनके राजनीतिक जीवन से जुड़े रहे। इन घटनाओं से उनकी संगठनात्मक सक्रियता का पता चलता है।
हालांकि, कांग्रेस से जनसंघ में आने के पीछे की सटीक वजहों और प्रत्येक आंदोलन में उनकी विशिष्ट भूमिका के बारे में पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए उनके राजनीतिक बदलाव को किसी एक विवाद या व्यक्तिगत नाराजगी का परिणाम बताने के बजाय प्रमाणित तथ्यों के आधार पर देखना जरूरी है।
1977 में समाप्त हुआ लगातार जीत का सिलसिला
1977 के लोकसभा चुनाव में कोटा से जनता पार्टी के कृष्ण कुमार गोयल निर्वाचित हुए। इसके साथ ही ओंकार लाल बैरवा का लगातार तीन बार सांसद रहने का सिलसिला समाप्त हो गया।
उनके बाद के राजनीतिक जीवन और सक्रिय राजनीति से दूरी बनाने के कारणों पर विस्तृत प्रमाणित जानकारी सीमित है। इसलिए उनके राजनीतिक सफर के अंतिम दौर के बारे में किसी एक कारण को निर्णायक मानना उचित नहीं होगा।
परिवार की राजनीतिक विरासत के संदर्भ में उनके पौत्र सुरेश बैरवा के भाजपा से जुड़े होने का उल्लेख मिलता है। हालांकि, उनकी वर्तमान संगठनात्मक जिम्मेदारी या राजनीतिक भूमिका की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।
ओंकार लाल बैरवा की विरासत: सामाजिक सक्रियता से संसद तक
ओंकार लाल बैरवा का राजनीतिक सफर उस दौर की राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जब सामाजिक संगठनों से जुड़ाव, श्रमिक वर्ग के बीच सक्रियता और संगठनात्मक कामकाज किसी नेता की पहचान बनाने में भूमिका निभाते थे।
कोटा में जन्मे बैरवा ने भारतीय जनसंघ के टिकट पर लगातार तीन लोकसभा चुनाव जीतकर अपनी जगह बनाई। उनका सफर यह भी दिखाता है कि अनुसूचित जाति के नेताओं की राजनीतिक भागीदारी का इतिहास किसी एक दल या एक दौर तक सीमित नहीं रहा है।
उनकी कहानी को केवल तीन चुनावी जीत तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। सामाजिक संस्थाओं और कर्मचारी संगठनों से उनका जुड़ाव भी उनके सार्वजनिक जीवन का अहम पहलू था।
ओंकार लाल बैरवा का राजनीतिक इतिहास इस बात की याद दिलाता है कि किसी नेता की विरासत को समझने के लिए उसके चुनावी परिणामों के साथ सामाजिक भूमिका, संगठनात्मक सक्रियता और ऐतिहासिक संदर्भों को भी देखना जरूरी है।





















































