लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
डाकिए की घंटी से मोबाइल की रिंग तक बदला संवाद का अंदाज, पीले पड़े कागज आज भी समेटे हैं अपनापन और इंतजार की अनमोल यादें
गंगधार, झालावाड़। (लोक टुडे, सुनील निगम)
एक दौर था, जब गली में डाकिए की साइकिल की घंटी सुनाई देती थी तो घर के दरवाजे पर निगाहें टिक जाती थीं। डाकिया दिखाई देता और मन में एक ही सवाल उठता—किसका खत आया होगा?
हाथ में थमा लिफाफा केवल कागज का टुकड़ा नहीं होता था। उसमें किसी अपने की आवाज होती थी, दूर बैठे किसी खास व्यक्ति का एहसास होता था और उन शब्दों में रिश्तों की गर्माहट महसूस होती थी।
आज मोबाइल ने संदेश पहुंचाने की दूरी को लगभग खत्म कर दिया है, लेकिन इसी तेजी के बीच चिट्ठियों से जुड़ा वह इंतजार और अपनापन कहीं पीछे छूट गया है।
पीले पड़ गए कागज, मगर यादें आज भी ताजा
चिट्ठियां लिखने का भी अपना एक अंदाज था। शब्दों को कागज पर उतारने से पहले सोचा जाता था। कभी हालचाल पूछा जाता, कभी घर-परिवार की बातें लिखी जातीं तो कभी दूर बैठे किसी अपने को अपनी यादों में शामिल किया जाता।
चिट्ठी लिखने में समय लगता था और जवाब आने में उससे भी ज्यादा।
कई बार एक खत के जवाब के लिए कई दिन तो कभी कई सप्ताह इंतजार करना पड़ता था। लेकिन यही इंतजार उस रिश्ते की खूबसूरती भी था।
पुरानी संदूकचियों और अलमारियों में आज भी कई घरों में ऐसे पीले पड़ चुके कागज मिल जाते हैं। कागज भले पुराना हो गया हो, स्याही फीकी पड़ गई हो, लेकिन उसमें दर्ज भावनाएं आज भी ताजा हैं।
मोबाइल ने संवाद आसान किया, एहसास नहीं
तकनीक ने जिंदगी को आसान बना दिया। मोबाइल ने दुनिया को हमारी हथेली में ला दिया। अब किसी अपने को संदेश भेजने के लिए न कागज चाहिए, न डाक टिकट और न ही डाकिए का इंतजार।
एक क्लिक में संदेश पहुंच जाता है। आवाज सुनाई देती है, वीडियो कॉल पर चेहरा सामने होता है और तस्वीरें पल भर में एक जगह से दूसरी जगह पहुंच जाती हैं।
लेकिन इस सुविधा ने इंतजार की उस खूबसूरत परंपरा को जरूर बदल दिया।
आज कुछ मिनट तक संदेश का जवाब न मिले तो बेचैनी होने लगती है। कभी किसी चिट्ठी के जवाब के लिए पूरा सप्ताह भी कम लगता था। तब संवाद धीमा था, लेकिन शायद रिश्तों में ठहराव ज्यादा था।
डाकिए की घंटी से मोबाइल की रिंग तक
समय के साथ साधन बदले और संवाद का तरीका भी बदल गया। कभी डाकिए की साइकिल की घंटी किसी खुशखबरी का संकेत होती थी, आज मोबाइल की रिंग वही काम करती है।
फर्क सिर्फ इतना है कि पहले संदेश के साथ इंतजार आता था और आज संदेश के साथ तुरंत जवाब की उम्मीद।
पहले चिट्ठी को संभालकर रखा जाता था। उसे बार-बार पढ़ा जाता था। कई लोग पुराने खतों को वर्षों तक संदूक में सहेजकर रखते रहे। आज हजारों संदेश मोबाइल में जमा हैं, लेकिन उनमें से कितने संदेश कुछ साल बाद भी उसी भाव से पढ़े जाएंगे, यह सवाल जरूर खड़ा होता है।
इंतजार भी रिश्ते का हिस्सा था
चिट्ठियों के दौर की सबसे बड़ी खूबसूरती शायद यही थी कि इंतजार भी रिश्ते का हिस्सा हुआ करता था।
डाकिए के आने का इंतजार, खत खोलने की उत्सुकता, अपने किसी खास की लिखावट देखकर चेहरे पर आने वाली मुस्कान और फिर उस खत को बार-बार पढ़ना—ये सब अब बीते समय की तस्वीरें बन चुके हैं।
मोबाइल ने दूरियां जरूर कम कर दीं, लेकिन चिट्ठियों ने दूर रहकर भी दिलों को जिस तरह जोड़े रखा, उसका एहसास आज भी उन पुराने कागजों में महसूस किया जा सकता है।
चिट्ठियां अब इतिहास हैं और मोबाइल वर्तमान।
लेकिन उन पीले पड़े कागजों में कैद शब्द आज भी यही याद दिलाते हैं कि कभी किसी अपने के दो शब्दों के लिए इंतजार करना भी जिंदगी के सबसे खूबसूरत पलों में शामिल हुआ करता था।



















































