लोक टुडे न्युज़ नेटवर्क
रिपोर्ट — गौतम शर्मा, राजसमंद
राजसमंद।
कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला छठ महापर्व या षष्ठी पूजा सूर्योपासना का एक अनुपम लोकपर्व है। यह पर्व मुख्यतः बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और नेपाल के तराई क्षेत्रों में बड़े श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है।
छठ महापर्व की उत्पत्ति
छठ महापर्व की शुरुआत के संबंध में कई धार्मिक कथाएं प्रचलित हैं।
कहा जाता है कि जब भगवान शिव और माता पार्वती ने अपने पुत्र कार्तिकेय के जन्म पर कृतज्ञता स्वरूप छः कृतिकाओं (छठ मैया) की पूजा की, तभी से इस पर्व का आरंभ हुआ। छठ मैया को सतित्व, स्वच्छता और पवित्रता की प्रतीक माना जाता है।
एक अन्य मान्यता के अनुसार, भगवान राम और माता सीता ने अयोध्या लौटने पर ब्रह्महत्या दोष से मुक्ति के लिए इस व्रत का पालन किया था।
वहीं, महाभारत काल में कुंतीपुत्र कर्ण को भी छठ व्रत का प्रथम उपासक माना गया है। उन्होंने अंग देश (वर्तमान बिहार के भागलपुर क्षेत्र) में सूर्यदेव की आराधना की थी।
मार्कण्डेय पुराण में वर्णित है कि सृष्टि की अधिष्ठात्री देवी ने स्वयं को छह भागों में विभाजित किया और उनका छठा अंश मातृ देवी के रूप में पूजनीय हुआ। द्रौपदी द्वारा भी छठ व्रत रखने का उल्लेख मिलता है।
कैसे मनाया जाता है छठ महापर्व
चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व स्वच्छता, संयम और श्रद्धा का प्रतीक है। महिलाएं और पुरुष दोनों अपने परिवार और संतान की दीर्घायु व मंगलकामना के लिए 36 घंटे का निर्जल व्रत रखते हैं।
पहला दिन — नहाय-खाय
व्रत की शुरुआत स्नान कर पवित्रता के साथ शुद्ध भोजन ग्रहण करने से होती है।
दूसरा दिन — खरना (छोटकी छठ)
इस दिन व्रती महिलाएं निर्जला उपवास शुरू करती हैं। शाम को सूर्य को अर्घ्य देने के बाद गुड़ और चावल की खीर का प्रसाद ग्रहण किया जाता है।
तीसरा दिन — बड़ी छठ
संध्या के समय व्रतधारी महिलाएं तालाब या नदी किनारे जाकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देती हैं। ठेकुआ, खजूर, और मौसमी फलों का प्रसाद तैयार किया जाता है। रातभर भजन-कीर्तन और मंगलगीत गाए जाते हैं।
चौथा दिन — पारण
सुबह स्नान-ध्यान कर उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और प्रसाद का वितरण किया जाता है। महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद देती हैं।
पर्व का महत्व
छठ पर्व केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय संदेश भी देता है।
यह पर्व प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक है — पूजा में उपयोग होने वाली हर सामग्री जैसे बाँस की डलिया, मिट्टी के दीये, मौसमी फल और गन्ना, स्थानीयता और हस्तशिल्प को बढ़ावा देते हैं।
यह पर्व भाईचारे और सामाजिक सद्भाव का प्रतीक भी है, जहाँ हर जाति, वर्ग और समुदाय के लोग एक साथ मिलकर पूजा-अर्चना करते हैं।
आत्मविश्वास और संयम का पर्व
लगातार चार दिनों तक बिना जल ग्रहण किए व्रत रखने वाली महिलाएं आत्मबल, संयम और श्रद्धा का अनोखा उदाहरण पेश करती हैं। यह एकमात्र ऐसा पर्व है जिसे किसी शुभ मुहूर्त की आवश्यकता नहीं होती — क्योंकि इसकी पवित्रता स्वयं इसकी शक्ति है।
संदेश
छठ पर्व हमें यह सिखाता है कि अंधकार के बाद सूर्य अवश्य उदित होता है, बस विश्वास अडिग होना चाहिए।
यह आस्था, श्रद्धा, पवित्रता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का पर्व है।
सभी देशवासियों को छठ महापर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।
जय छठ मैया।
— अन्नु राठौड़ “रुद्रांजली”, कांकरोली, राजसमंद।


















































