लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
— हेमराज तिवारी वरिष्ठ पत्रकार
“जब तकनीक ठप हो जाए और व्यवस्था मौन — तब सबसे बड़ा शिकार होता है एक सामान्य नागरिक। और इस बार शिकार बने हैं वो हज़ारों छात्र, जिनका सपना डॉक्टर बनकर देश की सेवा करना था।”
राजस्थान में NEET UG काउंसलिंग 2025 के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया 28 जुलाई से शुरू हुई। RUHS द्वारा संचालित यह पोर्टल उन हज़ारों छात्रों की उम्मीदें समेटे था, जो वर्षों की मेहनत के बाद अब MBBS की सीट के लिए आवेदन करना चाह रहे थे। लेकिन शुरुआत से ही तकनीकी असफलता और विभागीय उदासीनता ने यह स्पष्ट कर दिया कि इस देश में व्यवस्था, नागरिक के लिए नहीं, बल्कि अपनी सुविधा के लिए चलती है।
तकनीकी गड़बड़ी या प्रणालीगत निकम्मापन?
यह पहली बार नहीं है जब किसी सरकारी पोर्टल ने अंतिम समय में जवाब देना बंद कर दिया हो। न तो सर्वर सही से काम कर रहा है, न डेटा सुरक्षित तरीके से फॉर्म जमा करवा पा रहा है। हज़ारों छात्र न केवल स्वयं प्रयास कर रहे हैं, बल्कि ई-मित्र केंद्रों के बाहर घंटों कतारों में खड़े हो रहे हैं — पर परिणाम शून्य।
सरकारी हेल्पलाइन नंबर “मौन” है। पोर्टल पर कोई अपडेट नहीं है। और सबसे शर्मनाक बात — न तो शिक्षा विभाग और न ही RUHS की ओर से कोई आधिकारिक वक्तव्य जारी हुआ है।
अभिभावकों का आक्रोश और छात्र का असहाय डर
अब जबकि 1 अगस्त रजिस्ट्रेशन की अंतिम तिथि है, छात्रों और उनके माता-पिता की चिंता एक स्वाभाविक और संवेदनशील बिंदु पर आ गई है। किसी का ड्रॉप का डर, किसी का साल बर्बाद होने का डर, और किसी की परिवारिक आर्थिक स्थिति खराब हो जाने का भय — ये सब मिलकर एक गहरी असुरक्षा और अविश्वास को जन्म दे रहे हैं।
जिम्मेदारी किसकी?
क्या यह केवल “सर्वर की गलती” है? या यह उस व्यवस्था की परछाईं है, जो प्रबंधन की अनदेखी, तकनीकी तैयारी की कमी, और मानवता की उपेक्षा का मिश्रण बन चुकी है?
यदि किसी छात्र का सपना केवल इस वजह से अधूरा रह जाए कि सरकार एक पोर्टल सही तरीके से नहीं चला पाई, तो यह केवल तकनीकी असफलता नहीं — एक पीढ़ी के साथ किया गया अन्याय है।
छात्रों की मांग – क्या यह अनसुनी रह जाएगी?
छात्रों की मांग अत्यंत साधारण और न्यायसंगत है:
“रजिस्ट्रेशन की अंतिम तिथि को कम से कम 3 दिन आगे बढ़ाया जाए और पोर्टल को तुरंत सुधार कर सार्वजनिक जानकारी दी जाए।”
क्या इतनी सी बात को भी समझने के लिए व्यवस्था को धरना, प्रदर्शन, या न्यायालय की फटकार का इंतज़ार करना होगा?
क्या व्यवस्था सोती ही रहेगी?
राज्य सरकारें जब शिक्षा, स्वास्थ्य और नौकरियों के मामलों में तकनीकी प्रणाली पर भरोसा करती हैं, तो यह उनकी ज़िम्मेदारी बनती है कि वह प्रणाली न केवल पारदर्शी हो, बल्कि उत्तरदायी भी हो।
व्यवस्था तभी व्यवस्था कहलाती है जब वो संकट में नागरिक के साथ खड़ी हो — न कि उनके खिलाफ।
आज एक तकनीकी गड़बड़ी नहीं, एक संवैधानिक विफलता सामने आई है।
और इस बार मुद्दा केवल रजिस्ट्रेशन नहीं — युवा भारत की आस्था का है।
राजस्थान सरकार और RUHS को चाहिए कि वे तुरंत इस विषय में संज्ञान लें, पोर्टल की स्थिति पर पारदर्शी रिपोर्ट दें और रजिस्ट्रेशन की समयसीमा बढ़ाकर छात्रों को न्याय दें। अन्यथा यह तकनीकी चूक नहीं, व्यवस्थागत अपराध बन जाएगा।















































