“पिता — सनातन परंपरा का स्तंभ है “

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लोक टुडे न्यूज नेटवर्क

हम पश्चिमी परंपराओं से प्रेरित होकर “फादर्स डे” तो मनाते हैं, लेकिन सनातन संस्कृति में पिता का जो स्थान है, वह किसी एक दिन के उत्सव से कहीं ऊपर है।
पिता सिर्फ पालनहार नहीं, वह वह आदर्श पुरुष हैं जो धर्म, कर्म और ज्ञान का सजीव प्रतीक होते हैं।

जहाँ माँ को जीवनदायिनी माना गया है, वहीं पिता को धर्मदायिनी की संज्ञा दी गई है। वह वह दीपक हैं जो स्वयं जलकर संतान को उजाला देते हैं।

सनातन में पिता: केवल संबंध नहीं, एक उत्तरदायित्व

‘पिता’ शब्द संस्कृत धातु “पाति” से बना है, जिसका अर्थ है — पालन करना।
पिता वह हैं जो:

संतान को न केवल जन्म देते हैं, बल्कि उसे संस्कार, अनुशासन और दृष्टिकोण भी देते हैं।

स्वयं दायित्व, त्याग और मर्यादा में जीते हुए अपने वंश का आधार बनते हैं।

शास्त्रों में कहा गया है:
“पिता स्वर्गः, पिता धर्मः, पिता हि परमं तपः।
पितरि प्रीतिमापन्ने, प्रीयन्ते सर्वदेवता॥”
(मनुस्मृति 2.145)
अर्थ: पिता स्वर्ग के समान है, वह धर्मस्वरूप है और परम तपस्वी है। जब पिता प्रसन्न होते हैं तो समस्त देवता भी प्रसन्न हो जाते हैं।

वेदों में पिता के उपदेश:

ऋग्वेद, यजुर्वेद और उपनिषदों में पिता को ‘गुरु’ के समान माना गया है।
पिता से प्राप्त शिक्षा को ‘पितृवाक्य’ कहा गया — जिसे जीवन भर स्मरण रखना चाहिए।

ऋग्वेद 1.164.39
“मातृदेवो भव, पितृदेवो भव।”
— अर्थात माता और पिता दोनों देवता के समान पूजनीय हैं।

अथर्ववेद 6.43.1
“यथा माता प्रियं पुत्रं, रक्षति ब्रुवते सदा।
एवं पितृन्यनुं मत्वा, श्रद्धया पूजयेत सदा॥”
जिस प्रकार माता अपने पुत्र को प्रेम से सदा रक्षित करती है, उसी प्रकार पितरों (पूर्वजों) और पिता का सदा श्रद्धा से पूजन करें।
महाकाव्यों में पिता के चरित्र:

रामायण में दशरथ पिता का आदर्श रूप हैं, जिन्होंने अपने वचन के लिए प्राण तक त्याग दिए, और श्रीराम ने भी बिना प्रश्न किए वनवास स्वीकार कर लिया।

महाभारत में शांतनु, भीष्म, धृतराष्ट्र जैसे पात्र पिता की भूमिका के विविध पक्ष प्रस्तुत करते हैं — सत्ता, मोह, न्याय और धर्म के बीच का संघर्ष।

आज के परिप्रेक्ष्य में सनातन पितृत्व:

आज का पिता सिर्फ कमाकर लाने वाला पुरुष नहीं, बल्कि मानसिक, नैतिक और भावनात्मक मार्गदर्शक भी है।
परिवार में उसका योगदान मौन रहता है, लेकिन वही मौन स्थिरता का आधार बनता है।
आज जब पिता के प्रति प्रेम सोशल मीडिया की पोस्ट तक सीमित हो गया है, तब ज़रूरत है कि हम अपने बच्चों को यह समझाएँ:
पिता वह पेड़ हैं जो फल नहीं खाते, पर अपनी छाया से संतान को तपने नहीं देते।

“फादर्स डे” मनाना एक आधुनिक प्रथा हो सकती है, लेकिन सनातन संस्कृति में हर दिन ‘पितृ-पूजा’ है।
वह पूजा कर्मकांड से नहीं, बल्कि सम्मान, आदर और अनुशासन से होती है।

आइए, इस दिवस पर हम उस पिता को नमन करें —
जो अपनी थकान नहीं दिखाता, पर थक कर भी हमें थामे रहता है।
जो खुद पुराने जूते पहनता है, ताकि हम नए सपनों में चल सकें।

पिता कोई कहानी नहीं, वो पूरा एक दर्शन है।”
“जो पिता के वचनों में धर्म देखता है, वही सनातन पथ पर चलता है।”

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