
जयपुर। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉक्टर सतीश पूनिया को बदला जाना पार्टी के लिए असंभव नजर आ रहा है। हालांकि लगातार उनके कार्यकाल पूरा होने और हटाए जाने की चर्चाओं का दौर गर्म है । लेकिन प्रदेश में 45 से 50 सीटें जाट बहुल है। सरकार भले ही किसी भी पार्टी की बनती हो लेकिन हर सरकार में लगभग 35-40 विधायक जाट समाज के जीत कर आते हैं। ऐसी स्थिति में भारतीय जनता पार्टी अब कोई भी जोखिम नहीं उठाना चाहेगी कि वह जाट प्रदेश अध्यक्ष को बदलकर किसी नए व्यक्ति को अध्यक्ष पद पर आसीन करें। यदि यह काम 2 साल पूर्व हो गया होगा तो शायद इसका असर नहीं पड़ता। लेकिन अब चुनाव से जस्ट पूर्व सतीश पूनिया को हटाया जाता है तो इससे जाट समाज में भाजपा के खिलाफ नाराजगी होगी और भाजपा के खिलाफ नाराजगी वोटों में भी तब्दील हो सकती है।
जगदीप धनकड़ के उपराष्ट्रपति बनाने का भी मिलेगा फायदा
वर्तमान में जगदीप धनकड़ को उपराष्ट्रपति बनाए जाने से जाट समाज का झुकाव भाजपा की तरफ हुआ है लेकिन फिर भी यदि सतीश पूनियां को हटा दिया जाएगा तो इसका सीधा सीधा असर राजस्थान की राजनीति पर पड़ेगा और उसका नुकसान भारतीय जनता पार्टी को भुगतना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में भारतीय जनता पार्टी ऐसा कदम नहीं उठाना चाहेगी, जिससे किसी वर्ग विशेष में नाराजगी हो और उसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़े। कुछ लोग इस बात को लगातार हवा दे रहे हैं कि चुनाव से पूर्व सतीश पुनिया को हटा दिया जाएगा और उनके स्थान पर कोई नया अध्यक्ष कमान संभाल लेगा । लेकिन पार्टी यदि किसी भी जातीय समीकरण के आधार पर प्रदेश अध्यक्ष बनाती है, तो उसे जाटों के विरोध का सामना करना ही पड़ेगा। यदि राजपूत को बनाती है तो वैसे दोनों जातियों के बीच छत्तीस का आंकड़ा है, तो फिर खुलकर सामने आ जाएगा । ब्राह्मण को बनाती है तो भी फिर नाराजगी का सामना करना पड़ेगा। कुछ लोगों का कहना है कि सतीश पूनियां के रहते राजपूत समाज के लोग वोट नहीं देंगे तो दूसरी और लोगों का कहना है कि ऐसा सरासर गलत है। सतीश पूनिया अध्यक्ष है ऐसी स्थिति में अब यदि सतीश पूनिया को हटाकर उनकी जगह किसी राजपूत को अध्यक्ष बनाया जाएगा निश्चित तौर पर जाट समाज में नाराजगी बढ़ जाएगी। राजपूत समाज भले ही इससे भाजपा के पक्ष में जा सकता है। लेकिन आज की तारीख में सतीश पूनिया के खिलाफ जाट समाज ही नहीं किसी भी समाज में उनकी कार्यशैली को लेकर नाराजगी नहीं है।
पूनियां विरोधियों की सूची तैयार
यह बात भी सभी को स्वीकार करनी पड़ेगी सतीश पूनिया अन्य समाजों में भी स्वीकार्य हो गए हैं। इस स्थिति में पार्टी उनको हटाने की बजाए नेतृत्व में ही चुनाव लड़े तो ज्यादा फायदेमंद होगा। पार्टी को उनके खिलाफ बगावत करने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई करनी चाहिए। जिससे वे लोग किसी व्यक्ति की बजाय पार्टी से जुड़े। केंद्र भी सतीश पूनियां की खिलाफत करने वालों की कुंडली खंगाल रहा है। पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को लगता है की भाजपा व्यक्ति परक नहीं होकर नीतिपरक पार्टी है। सिद्दांत परक पार्टी होने के कारण जो भी उसका अध्यक्ष होता है उसे सबको मानना ही पड़ता है। इसलिए सतीश पूनियां का विरोध केंद्रीय नेतृत्व का विरोध करने के समान है। इसलिए केद्र तय कर चुका है विधानसभा चुनावों तक सतीश पूनियां ही प्रदेश अध्यक्ष बने रहेंगे। अपनी ही पार्टी में लगातार विऱोध और एक बड़े खेमे के विरोध के बावजूद सतीश पूनियां ने अपनी पहचान बनाई है। वे लगातार प्रदेश के दौरे पर रहे हैं। लगातार अलग-अलग मुद्दों पर सरकार के खिलाफ हल्ला बोल रहे हैं। उन्होंने उन्होंने वसुंधरा गुट की नाराजगी के बावजूद और असहयोग के बावजूद भी पार्टी को सही तरीके से चलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लगातार सदन में और सदन के बाहर, सड़क पर सरकार के खिलाफ अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं । ऐसी स्थिति में भाजपा भी और खास तौर पर संघ परिवार जानता है कि फिलहाल सतीश पूनिया को बदला जाना किसी भी सूरत में ठीक नहीं होगा।
| विधानसभा चुनाव से पूर्व नहीं बदले जाएंगे सतीश पूनियाजयपुर I राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने से पूर्व भाजपा के |













































