लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
‘तार्किक विसंगति’ के आधार की होगी जांच
दिल्ली में SIR प्रक्रिया पर सुनवाई, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा—पुराने मतदाताओं को नए सिरे से आवेदन करने के लिए क्यों कहा जा रहा है?
नई दिल्ली (रितु मेहरा)। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान नाम हटाने और ‘तार्किक विसंगति’ के आधार पर मतदाताओं को चिह्नित करने की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग की ओर से इस्तेमाल किए जा रहे ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार की वैधता पर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है। इस मामले की अलग से जांच की जानी बाकी है।
बुधवार, 28 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे।
‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ पर अभी अंतिम फैसला नहीं
सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि बिहार में SIR प्रक्रिया को लेकर दिए गए पूर्व फैसले को ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार पर मतदाताओं को चिह्नित करने की वैधता पर अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि बिहार में यह विशिष्ट आधार विचाराधीन नहीं था, जबकि पश्चिम बंगाल में इस व्यवस्था को अंतरिम तौर पर अनुमति दी गई थी।
पीठ ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि क्या मतदाताओं को चिह्नित करने की प्रक्रिया में वास्तविक मानवीय जांच की जा रही है या सॉफ्टवेयर के जरिए विसंगतियां सामने आने पर स्वतः नोटिस जारी किए जा रहे हैं।
पुराने मतदाताओं को फॉर्म-6 भरने की जरूरत पर सवाल
सुनवाई में दिल्ली की मतदाता सूची से नाम छूटने वाले लोगों को दोबारा नाम जुड़वाने के लिए फॉर्म-6 भरने की प्रक्रिया पर भी चर्चा हुई। अदालत ने कहा कि जो व्यक्ति पहले से मतदाता सूची में शामिल था और केवल अपना निवास स्थान बदल चुका है, उसके मामले में फॉर्म-8 जैसी मौजूदा व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश ने चुनाव आयोग से कहा कि वह मतदाताओं तक खुद पहुंचने और उन्हें सही प्रक्रिया की जानकारी देने के लिए कदम उठाए। अदालत ने आयोग को सरल भाषा में सार्वजनिक सूचना जारी करने तथा संबंधित फॉर्म स्वीकार करने की प्रक्रिया जारी रखने पर भी विचार करने को कहा।
चुनाव आयोग को दो सप्ताह में कदमों की जानकारी देने को कहा
अदालत ने चुनाव आयोग से कहा कि वह मतदाता सूची में नाम शामिल कराने और पता बदलने से जुड़े आवेदनों को स्वीकार करने की प्रक्रिया जारी रखे। पीठ ने फिलहाल 30 अक्टूबर की समयसीमा के बाद भी संबंधित आवेदन स्वीकार करने के लिए स्पष्ट सार्वजनिक सूचना जारी करने का सुझाव दिया।
मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद निर्धारित की गई है। चुनाव आयोग की ओर से अदालत को आश्वासन दिया गया कि वह संबंधित अधिकारियों से चर्चा कर आवश्यक कदम उठाएगा और आगे की जानकारी देगा।
मतदाता सूची की पारदर्शिता पर टिकी निगाहें
सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई का मुख्य मुद्दा मतदाता सूची के पुनरीक्षण में पारदर्शिता, नाम हटाने के स्पष्ट कारण और प्रभावित मतदाताओं को अपना पक्ष रखने का अवसर देना है। हालांकि, अदालत ने अभी ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार की वैधता पर अंतिम निर्णय नहीं दिया है।
अब इस मामले में चुनाव आयोग के अगले कदम और आगामी सुनवाई पर नजर रहेगी।



















































