पूर्व मंत्री रघुशर्मा ने सिस्टम पर उठाए सवाल, खुद को पैसे में करानी पड़ी जांच

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

राजस्थान की स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक ऐसी घटना ने पर्दा उठाया है, जिसने सिस्टम की सच्चाई को बेनकाब कर दिया—और साथ ही नेताओं की संवेदनशीलता पर भी सवाल खड़े कर दिए।

जयपुर। रघु शर्मा, जो कभी प्रदेश के चिकित्सा मंत्री रहे, जब खुद SMS Hospital पहुंचे, तो वही सरकारी सिस्टम उनके सामने खड़ा हो गया, जिसे कभी उन्होंने खुद चलाया था। एमआरआई के लिए डॉक्टर की पर्ची हाथ में थी, लेकिन RGHS के तहत मुफ्त जांच करवाने के लिए TID जनरेट कराने की जटिल प्रक्रिया ने उन्हें रोक दिया।

यहीं से शुरू हुआ गुस्सा—और सवाल भी।

रघु शर्मा सरकारी अस्पताल से बाहर निकले, निजी सेंटर में 3400 रुपए खर्च कर जांच करवाई और फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरकार को घेर लिया। उनका तर्क साफ था—जब एक पूर्व मंत्री को यह झंझट झेलनी पड़ रही है, तो आम आदमी का क्या हाल होगा?

लेकिन असली सवाल यहीं से उठता है—क्या यह समस्या आज पैदा हुई है?

सच यह है कि आम आदमी तो सालों से इसी “सिस्टम” में पिस रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि जब तक यह दर्द आम जनता तक सीमित था, तब तक यह मुद्दा नहीं बना। जैसे ही वही सिस्टम एक पूर्व मंत्री के सामने आया, वह “बड़ा मुद्दा” बन गया।

दूसरी तरफ, गजेंद्र सिंह खींवसर ने भी पलटवार करने में देर नहीं लगाई। उनका कहना है कि RGHS में बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़ा हुआ, इसलिए TID जैसी सख्त प्रक्रियाएं लागू करनी पड़ीं। यानी सरकार का तर्क है—कठिन प्रक्रिया नहीं, जरूरी नियंत्रण।

अब जनता के सामने दो सच्चाइयां हैं—
एक तरफ नेता, जिन्हें सिस्टम तब याद आता है जब वे खुद फंसते हैं।
दूसरी तरफ सरकार, जो सुधार के नाम पर प्रक्रिया को इतना उलझा देती है कि आम आदमी के लिए सुविधा “सुविधा” कम और “सजा” ज्यादा लगती है।

सबसे तीखा सवाल यही है—
क्या व्यवस्था इतनी कमजोर है कि उसे ठीक करने के लिए आम लोगों को ही परेशान करना जरूरी है?

और उतना ही कड़वा सच—
जो नेता सत्ता में रहते हुए सिस्टम की खामियां नहीं सुधारते, उन्हें विपक्ष में आकर उस पर सवाल उठाने का नैतिक अधिकार कितना है?

यह घटना सिर्फ एक एमआरआई या एक अस्पताल की नहीं है—यह उस पूरे सिस्टम का आईना है, जहां सत्ता बदलती है, लेकिन आम आदमी की लाइन, फॉर्म और परेशानी कभी नहीं बदलती।

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