लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
महज 25 साल की उम्र में बने देश के सबसे युवा सांसदों में शामिल
4 बार सांसद और 4 बार विधायक रहे
- केंद्र में कई महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले
- हरियाणा और बिहार के राज्यपाल रहे
- महादेवी वर्मा की कविता पर टिप्पणी के बाद तेज हुई राजनीतिक हलचल
- मुख्यमंत्री के रूप में लागू की थी संपूर्ण शराबबंदी
राजनीति में किस्मत कब करवट ले ले, कोई नहीं जानता
राजनीति में कब किसी साधारण परिवार का बेटा सत्ता के शिखर तक पहुंच जाए और कब सत्ता का सिंहासन हाथ से निकल जाए, इसका अनुमान लगाना मुश्किल होता है। राजस्थान के भरतपुर जिले के भुसावर कस्बे में दलित (खटीक) परिवार में जन्मे जगन्नाथ पहाड़िया इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं।
एक समय ऐसा आया जब वे राजस्थान के पहले दलित मुख्यमंत्री बने। केंद्र सरकार में मंत्री रहे, हरियाणा और बिहार के राज्यपाल बने और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के भरोसेमंद नेताओं में गिने गए। लेकिन मुख्यमंत्री बनने के महज 13 महीने बाद उनकी कुर्सी चली गई। उनकी राजनीतिक यात्रा जितनी तेज़ी से ऊपर गई, उतनी ही तेजी से उतार भी देखा।

नेहरू से मुलाकात और बदल गई जिंदगी
जगन्नाथ पहाड़िया ने राजस्थान विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी की पढ़ाई की। वर्ष 1957 के लोकसभा चुनाव से पहले भरतपुर के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मास्टर आदित्येंद्र ने उनकी मुलाकात तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से कराई।
उस दौर में कांग्रेस पढ़े-लिखे दलित नेतृत्व को आगे लाना चाहती थी। बातचीत के दौरान नेहरू उनसे प्रभावित हुए और उन्हें सवाई माधोपुर लोकसभा सीट से टिकट मिल गया।
महज 25 वर्ष 2 माह की उम्र में चुनाव जीतकर वे उस समय देश के सबसे युवा सांसदों में शामिल हो गए।
इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
सांसदी का सफर
- 1957 – पहली बार सांसद
- 1967 – दूसरी बार सांसद
- 1971 – तीसरी बार सांसद
- 1980 – चौथी बार सांसद
इंदिरा गांधी सरकार में उन्होंने वित्त, उद्योग, श्रम और कृषि जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी भी संभाली।
नेहरू से राहुल गांधी तक, पांच पीढ़ियों के नेतृत्व के साथ किया काम
जगन्नाथ पहाड़िया उन चुनिंदा कांग्रेस नेताओं में रहे जिन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी तक के दौर में पार्टी के साथ सक्रिय भूमिका निभाई।
राजस्थान को मिला पहला दलित मुख्यमंत्री
6 जून 1980 को कांग्रेस ने उन्हें राजस्थान का मुख्यमंत्री बनाया। उस दौर में सामंती परंपराओं वाले राजस्थान में किसी दलित नेता का मुख्यमंत्री बनना ऐतिहासिक फैसला माना गया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस उत्तर भारत में दलित नेतृत्व को मजबूत संदेश देना चाहती थी। हालांकि पहाड़िया का कार्यकाल लंबा नहीं चला।
वे 6 जून 1980 से 13 जुलाई 1981 तक मुख्यमंत्री रहे।
13 महीने के कार्यकाल में सबसे बड़ा फैसला—संपूर्ण शराबबंदी
मुख्यमंत्री रहते हुए जगन्नाथ पहाड़िया ने प्रदेश में संपूर्ण शराबबंदी लागू करने का फैसला लिया।
यह ऐसा निर्णय था जिसे बाद के कई मुख्यमंत्री भी लागू करने से हिचकते रहे। हालांकि यह प्रयोग अधिक समय तक सफल नहीं रह सका।
उनके समर्थकों का मानना है कि यदि उन्हें पूरा कार्यकाल मिलता तो वे दलित समाज और प्रदेश के लिए कई दीर्घकालिक योजनाएं लागू कर सकते थे।
क्या एक टिप्पणी बनी कुर्सी जाने की वजह?
10 जनवरी 1981 को जयपुर के रविंद्र मंच पर आयोजित एक कार्यक्रम में प्रसिद्ध कवयित्री महादेवी वर्मा मुख्य अतिथि थीं और मुख्यमंत्री जगन्नाथ पहाड़िया अध्यक्षता कर रहे थे।
अपने संबोधन में पहाड़िया ने कहा था—
“महादेवी वर्मा की कविताएं मुझे कभी समझ नहीं आईं कि वे क्या कहना चाहती हैं। साहित्य ऐसा होना चाहिए जिसे आम आदमी भी समझ सके।”
यह टिप्पणी साहित्यिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गई।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उस समय उनके खिलाफ पार्टी के भीतर पहले से असंतोष था और इस बयान ने विरोधियों को मजबूत आधार दे दिया। बाद में उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया।
हालांकि, यह कहना कि केवल इसी टिप्पणी के कारण उन्हें हटाया गया, इतिहासकारों में सर्वसम्मत मत नहीं है। पार्टी के भीतर गुटबाजी और राजनीतिक परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण कारण मानी जाती हैं।
मुख्यमंत्री के बाद लगातार चुनावी झटके
मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद उनका राजनीतिक ग्राफ नीचे आने लगा।
वे लगातार तीन विधानसभा चुनाव गंगाराम कोली से हार गए। इसके बाद 1999 का लोकसभा चुनाव भी बहादुर सिंह कोली से हार गए।
लगातार हार ने उनके राजनीतिक प्रभाव को कमजोर कर दिया।
फिर मिला राज्यपाल का सम्मान
कांग्रेस नेतृत्व ने उनके लंबे राजनीतिक योगदान को देखते हुए उन्हें पहले बिहार और बाद में हरियाणा का राज्यपाल नियुक्त किया।
यह उनके सार्वजनिक जीवन का सम्मानजनक अध्याय माना जाता है।
जब तीन पूर्व मुख्यमंत्री मौजूद थे, लेकिन मुख्यमंत्री बने अशोक गहलोत
1998 के विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस विधायक दल की बैठक में तीन पूर्व मुख्यमंत्री—शिवचरण माथुर, जगन्नाथ पहाड़िया और हीरालाल देवपुरा—मौजूद थे।
इसके बावजूद पार्टी नेतृत्व ने अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री चुना। उस समय नेता प्रतिपक्ष परसराम मदेरणा का नाम भी चर्चा में था, लेकिन उन्हें भी मौका नहीं मिला।
आखिरी चुनाव और अंतिम सफर
2003 में जगन्नाथ पहाड़िया ने भुसावर से विधानसभा चुनाव जीतकर एक बार फिर विधानसभा पहुंचने में सफलता हासिल की।
19 मई 2021 को हरियाणा के मेदांता अस्पताल में उनका निधन हो गया।
राजस्थान की राजनीति में क्यों हमेशा याद किए जाएंगे जगन्नाथ पहाड़िया?
जगन्नाथ पहाड़िया केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं हैं कि वे राजस्थान के पहले दलित मुख्यमंत्री थे, बल्कि इसलिए भी कि आज तक कोई दूसरा दलित नेता इस पद तक नहीं पहुंच पाया है।
उनकी राजनीतिक यात्रा सामाजिक बदलाव, कांग्रेस की रणनीति, सत्ता के उतार-चढ़ाव और लोकतांत्रिक राजनीति की अनिश्चितताओं का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। सादगी, गांधीवादी सोच और संगठन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के कारण उनका नाम राजस्थान के राजनीतिक इतिहास में हमेशा दर्ज रहेगा।