लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
झालावाड़ के इस प्राचीन धाम में चर्म रोग से राहत की भी है मान्यता, सावन में उमड़ते हैं हजारों श्रद्धालु
डग (झालावाड़)। झालावाड़ जिले के डग कस्बे से करीब 8 किलोमीटर दूर स्थित क्यासरा गांव का कायावर्णेश्वर महादेव मंदिर अपनी धार्मिक मान्यताओं, प्राचीन इतिहास और चमत्कारिक आस्था के कारण प्रदेश के प्रमुख शिवधामों में गिना जाता है। मान्यता है कि यहां स्थापित शिवलिंग तिल-तिल कर निरंतर बढ़ रहा है, जिसके चलते यह मंदिर वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है।
तिल-तिल बढ़ता है शिवलिंग
मंदिर समिति के अनुसार, प्रारंभ में यह शिवलिंग अंगूठे के आकार का था, लेकिन समय के साथ इसका आकार लगातार बढ़ता गया और आज यह विशाल स्वरूप धारण कर चुका है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि भगवान कायावर्णेश्वर महादेव सच्चे मन से की गई प्रार्थना अवश्य सुनते हैं। मनोकामना पूर्ण होने पर भक्त यहां आकर जलाभिषेक और विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।
महाभारत काल से जुड़ी है मान्यता
मंदिर से जुड़ी लोकमान्यता के अनुसार इसका इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ माना जाता है। मंदिर समिति के सभापति के अनुसार, राजा जनमेजय शिकार के दौरान इस क्षेत्र से गुजर रहे थे। उस समय एक जंगली सूअर एक तलाई (जलाशय) में उतरा और बाहर निकलते ही उसकी काया स्वर्ण जैसी हो गई।
कहा जाता है कि राजा जनमेजय स्वयं कुष्ठ रोग से पीड़ित थे। उन्होंने भी उसी जल में स्नान किया, जिससे उनका शरीर स्वस्थ और कांतिमय हो गया। इसी जलाशय से अंगूठे के आकार का शिवलिंग प्रकट हुआ, जिसकी यहीं स्थापना की गई। मान्यता है कि तभी से यह शिवलिंग निरंतर बढ़ता आ रहा है। इसी कारण भगवान का नाम “कायावर्णेश्वर” पड़ा, जिसका अर्थ है— काया का परिवर्तन करने वाले भगवान।
कुंड के जल को लेकर विशेष आस्था
मंदिर परिसर के सामने स्थित प्राचीन कुंड भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। स्थानीय मान्यता है कि इस कुंड का जल चर्म रोगों में लाभकारी होता है। श्रद्धालु इस जल को शरीर पर लगाकर भगवान से स्वास्थ्य की कामना करते हैं।
ध्यान दें: चर्म रोगों के उपचार संबंधी यह स्थानीय धार्मिक मान्यता है। इसका वैज्ञानिक या चिकित्सीय प्रमाण उपलब्ध नहीं है। किसी भी बीमारी के उपचार के लिए चिकित्सकीय सलाह लेना आवश्यक है।
सावन में उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
विशेषकर श्रावण मास, महाशिवरात्रि और अन्य धार्मिक अवसरों पर यहां राजस्थान सहित मध्यप्रदेश और आसपास के राज्यों से हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित यह प्राचीन शिवधाम धार्मिक पर्यटन और आध्यात्मिक आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।