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सुपर साइक्लोन की त्रासदी के बाद ओडिशा ने कैसे बदला आपदा प्रबंधन का पूरा मॉडल ?

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

1999 की त्रासदी से ‘Zero Casualty Mission’ तक: कैसे ओडिशा ने बदला आपदा प्रबंधन का पूरा मॉडल

कोणार्क से भुवनेश्वर तक आपदा प्रबंधन की ऐसी व्यवस्था, जिसमें चेतावनी से लेकर गांव स्तर की निकासी तक पूरा सिस्टम सक्रिय

भुवनेश्वर से नीरज मेहरा की विशेष रिपोर्ट

भुवनेश्वर। कभी चक्रवात और बाढ़ के बाद भारी जनहानि के लिए पहचाना जाने वाला ओडिशा आज आपदा प्रबंधन की तैयारियों और समय रहते लोगों को सुरक्षित निकालने के मॉडल के लिए देश में अलग पहचान बना चुका है। वर्ष 1999 के सुपर साइक्लोन की भयावह त्रासदी के बाद राज्य ने आपदा प्रबंधन को केवल राहत और बचाव तक सीमित रखने के बजाय पूर्व चेतावनी, तैयारी, निकासी, सुरक्षित आश्रय, प्रशिक्षित मानव संसाधन और समुदाय की भागीदारी पर आधारित व्यवस्था विकसित की।

ओडिशा राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण यानी OSDMA का गठन 28 दिसंबर 1999 को सुपर साइक्लोन के तत्काल बाद किया गया था। बाद में इसका नाम Odisha State Disaster Management Authority किया गया।

OSDMA के वर्तमान सलाहकार डॉ. कमल लोचन मिश्रा ने भुवनेश्वर में आपदा प्रबंधन की इस यात्रा को समझाते हुए बताया कि ओडिशा ने आपदा प्रबंधन को ग्रासरूट से लेकर राज्य स्तर तक एक समन्वित व्यवस्था के रूप में विकसित किया है। OSDMA की आधिकारिक वेबसाइट पर भी डॉ. कमल लोचन मिश्रा को सलाहकार के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।

1999 का सुपर साइक्लोन बना बदलाव का सबसे बड़ा कारण

29 अक्टूबर 1999 को आए सुपर साइक्लोन ने ओडिशा को ऐसी तबाही दी, जिसने राज्य की आपदा प्रबंधन नीति की दिशा ही बदल दी। ओडिशा सरकार के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उस सुपर साइक्लोन में करीब 1.30 करोड़ लोग प्रभावित हुए और 9,885 लोगों की मौत हुई। लगभग 16.69 लाख मकान क्षतिग्रस्त हुए, जिनमें करीब 7.48 लाख मकान पूरी तरह ध्वस्त हुए थे।

इसी त्रासदी के बाद राज्य सरकार ने यह महसूस किया कि प्राकृतिक आपदा को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसके कारण होने वाली जनहानि को तैयारी और समय पर कार्रवाई से काफी हद तक कम किया जा सकता है।

यही सोच आगे चलकर ओडिशा के ‘Zero Casualty’ मिशन की आधारशिला बनी।

राहत से आगे बढ़कर तैयारी पर जोर

OSDMA की स्थापना के बाद ओडिशा ने आपदा प्रबंधन में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया। पहले मुख्य जोर आपदा आने के बाद राहत और बचाव पर रहता था, लेकिन अब व्यवस्था में आपदा से पहले की तैयारियों को प्रमुख स्थान दिया गया है।

इसमें शामिल हैं—

मौसम और चक्रवात की पूर्व चेतावनी

गांवों और संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान

लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना

बहुउद्देश्यीय चक्रवात एवं बाढ़ आश्रय केंद्र

प्रशिक्षित स्वयंसेवक

पुलिस, अग्निशमन, ODRAF और अन्य बचाव दल

जिला और राज्य स्तर के इमरजेंसी ऑपरेशन सेंटर

मोबाइल और सोशल मीडिया के माध्यम से अलर्ट

पंचायत एवं स्थानीय समुदाय की भागीदारी

OSDMA का घोषित मिशन भी आपदा जोखिम कम करने, सुरक्षा बढ़ाने और एक आपदा-प्रतिरोधी ओडिशा तैयार करने पर केंद्रित है।

2013 के फाइलिन से 2024 के दाना तक बदली तस्वीर

1999 के बाद भी ओडिशा को लगातार बड़े चक्रवातों का सामना करना पड़ा। फाइलिन 2013, हुदहुद 2014, तितली 2018, फानी और बुलबुल 2019, अम्फान 2020, यास 2021 और दाना 2024 जैसे चक्रवातों ने राज्य की तैयारियों की परीक्षा ली। सरकारी दस्तावेजों में इन चक्रवातों की तीव्रता और प्रभावित जिलों का विस्तृत रिकॉर्ड उपलब्ध है।

हालांकि यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा कि 1999 के बाद किसी चक्रवात में कोई बड़ी जनहानि नहीं हुई। उदाहरण के लिए सरकारी/संसदीय आंकड़ों में तितली और फानी सहित अलग-अलग चक्रवातों में मौतें दर्ज हैं। लेकिन 1999 की तुलना में बड़े पैमाने पर होने वाली जनहानि को रोकने में पूर्व चेतावनी और बड़े स्तर पर निकासी महत्वपूर्ण साबित हुई है।

दाना में दिखा Zero Casualty मॉडल

अक्टूबर 2024 में चक्रवात दाना के दौरान ओडिशा सरकार ने बड़े पैमाने पर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया। 24 अक्टूबर की सरकारी स्थिति रिपोर्ट के अनुसार 4.17 लाख से अधिक लोगों को निकाला गया था और हजारों आश्रय केंद्र सक्रिय किए गए थे। उस रिपोर्ट में उस समय मानव जनहानि शून्य दर्ज की गई थी।

ओडिशा के 2024-25 आर्थिक सर्वेक्षण में भी कहा गया है कि दाना के दौरान आठ लाख से अधिक लोगों की निकासी क्षमता और समन्वित कार्रवाई ने राज्य की आपदा तैयारी को प्रदर्शित किया तथा दाना में Zero Casualty हासिल हुई।

911 आपदा आश्रय केंद्रों का नेटवर्क

ओडिशा ने संवेदनशील क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर बहुउद्देश्यीय चक्रवात एवं बाढ़ आश्रय केंद्र विकसित किए हैं। वर्ष 2026 की राज्य स्तरीय प्राकृतिक आपदा समिति की बैठक में सरकार ने 911 आपदा आश्रय केंद्रों के रखरखाव के लिए प्रत्येक केंद्र को 6 लाख रुपये देने का निर्णय भी लिया। साथ ही मोबाइल और सोशल मीडिया के माध्यम से सटीक आपदा अलर्ट देने पर जोर दिया गया।

इन केंद्रों की व्यवस्था में स्थानीय समुदाय की भूमिका महत्वपूर्ण है। आपदा के समय लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाना, आश्रय केंद्रों का संचालन और राहत गतिविधियों में स्थानीय प्रशासन एवं समुदाय की भागीदारी रहती है।

गांव से राज्य मुख्यालय तक ‘Bottom-Up’ और ‘Top-Down’ मॉडल

ओडिशा के आपदा प्रबंधन मॉडल की एक विशेषता यह है कि निर्णय केवल राजधानी या जिला मुख्यालय से नहीं आते, बल्कि गांव स्तर की व्यवस्था को भी इसमें जोड़ा गया है।

OSDMA के दस्तावेजों में गांवों, स्कूल-कॉलेजों, स्वयंसेवकों, आश्रय प्रबंधन समितियों और विभिन्न सरकारी विभागों को आपदा तैयारी में जोड़ने की व्यवस्था दर्ज है।

इसके अलावा राज्य में Emergency Operation Centres चौबीसों घंटे समन्वय में भूमिका निभाते हैं। 2025 में OSDMA ने एक Unified Command and Control System विकसित करने की प्रक्रिया भी शुरू की थी, जिसका उद्देश्य विभिन्न विभागों के डेटा को एकीकृत करके आपदा के दौरान बेहतर समन्वय करना है।

युवाओं और समुदाय को बनाया जा रहा ‘पहला रिस्पॉन्डर’

ओडिशा का मॉडल केवल सरकारी कर्मचारियों पर निर्भर नहीं है। समुदाय को भी आपदा के शुरुआती समय में प्रतिक्रिया देने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है।

OSDMA के Aapada Mitra कार्यक्रम का उद्देश्य समुदाय स्तर के स्वयंसेवकों को Search & Rescue, First Aid और आपदा प्रतिक्रिया की ट्रेनिंग देना है। OSDMA के अनुसार आपदा के शुरुआती घंटों में समुदाय के प्रशिक्षित लोग जीवन और संपत्ति बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

OSDMA के 2023 राज्य आपदा प्रबंधन प्लान में स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थियों, NSS, NCC और अन्य स्वयंसेवकों के प्रशिक्षण का भी उल्लेख है। इसके अलावा आश्रय प्रबंधन समितियों और टास्क फोर्स स्वयंसेवकों को Search & Rescue तथा First Aid की ट्रेनिंग दी जाती है।

पुलिस, फायर सर्विस और ODRAF भी तैयार

आपदा प्रबंधन में केवल OSDMA ही नहीं, बल्कि पुलिस, फायर सर्विस, ODRAF, NDRF, स्वास्थ्य विभाग, जिला प्रशासन और स्थानीय निकाय मिलकर काम करते हैं।

ओडिशा फायर सर्विस ने 1999 के बाद प्रत्येक फायर स्टेशन को सामान्य अग्निशमन के साथ-साथ बहु-आपदा प्रतिक्रिया इकाई के रूप में विकसित करने की नीति अपनाई। फाइलिन, तितली, फानी, बुलबुल और अम्फान जैसी आपदाओं में फायर सर्विस की बचाव एवं बहाली भूमिका रही।

OSDMA की वर्तमान व्यवस्था में ODRAF की कई इकाइयां राज्य के अलग-अलग जिलों में तैनात हैं और उनका विशेष प्रशिक्षण आपदा के दौरान बचाव एवं राहत कार्यों के लिए है।

सैटेलाइट, Early Warning और आधुनिक तकनीक

आज आपदा प्रबंधन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा समय पर सूचना पहुंचाना है। मौसम विभाग के पूर्वानुमान, सैटेलाइट आधारित निगरानी, Early Warning Dissemination System, मोबाइल अलर्ट, सोशल मीडिया और स्थानीय प्रशासन के माध्यम से लोगों तक चेतावनी पहुंचाई जाती है।

ओडिशा सरकार ने 2026 में भी मोबाइल और सोशल मीडिया आधारित सटीक चेतावनी व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया है।

OSDMA के Odisha Disaster Resource Network में उपलब्ध संसाधनों और आपदा प्रतिक्रिया से जुड़ी सूचनाओं को डिजिटल तरीके से व्यवस्थित किया जा रहा है, जिससे जरूरत के समय संसाधनों की तैनाती और समन्वय को बेहतर बनाया जा सके।

1999 से 2026 तक की सबसे बड़ी सीख

ओडिशा की कहानी केवल चक्रवातों की कहानी नहीं है। यह इस बात का उदाहरण है कि एक बड़ी प्राकृतिक त्रासदी के बाद किसी राज्य ने अपने पूरे आपदा प्रबंधन ढांचे को किस तरह बदला।

1999 में जहां मुख्य चुनौती आपदा के बाद राहत पहुंचाने की थी, वहीं आज चुनौती आपदा आने से पहले लोगों को सुरक्षित निकालने की है।

इसी बदलाव का परिणाम है कि फाइलिन, फानी और दाना जैसे बड़े चक्रवातों के दौरान लाखों लोगों को पहले ही सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की क्षमता विकसित हुई।

ओडिशा का मौजूदा मॉडल इस सिद्धांत पर आधारित है—आपदा को रोकना संभव नहीं, लेकिन तैयारी, पूर्व चेतावनी, समय पर निकासी और सामुदायिक भागीदारी से उसकी मानवीय कीमत को काफी कम किया जा सकता है।

राज्य सरकार का मौजूदा लक्ष्य भी इसी दिशा में है। जून 2026 की राज्य स्तरीय प्राकृतिक आपदा समिति की बैठक में मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने Zero Casualty को राज्य की प्रतिबद्धता के रूप में दोहराया और आपदा तैयारी को और मजबूत करने पर जोर दिया।

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