लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
मुरारी मीना -संघर्ष, संगठन और सियासत का सफर
नीरज मेहरा वरिष्ठ पत्रकार
जयपुर। राजस्थान की राजनीति में कुछ नेता ऐसे होते हैं, जिन्हें विरासत में राजनीति नहीं मिलती, बल्कि वे अपने संघर्ष, संगठन कौशल और जनता के भरोसे अपना मुकाम बनाते हैं। दौसा से कांग्रेस सांसद मुरारी लाल मीना उन्हीं नेताओं में शामिल हैं। एक समय पीडब्ल्यूडी विभाग में जूनियर इंजीनियर (JEN) रहे मुरारी मीना आज संसद में दौसा की आवाज बुलंद कर रहे हैं। लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने का उनका सफर आसान नहीं रहा। इसमें संघर्ष है, राजनीतिक जोखिम हैं, हार-जीत है और सबसे बढ़कर जनता का भरोसा है।
पीके टाइम्स की इस इनसाइड स्टोरी में जानिए कि कैसे एक साधारण किसान परिवार का बेटा सरकारी नौकरी छोड़कर राजस्थान की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शुमार हो गया।
अलियापाड़ा से शुरू हुआ सफर
20 जुलाई 1960 को दौसा जिले की बसवा तहसील के छोटे से गांव अलियापाड़ा में जन्मे मुरारी लाल मीना का बचपन साधारण परिवेश में बीता। किसान परिवार में जन्मे मुरारी ने पढ़ाई पूरी करने के बाद सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया और पीडब्ल्यूडी विभाग में जूनियर इंजीनियर के रूप में नौकरी शुरू की।
लेकिन उनका मन सरकारी दफ्तरों और फाइलों में कम, लोगों के बीच ज्यादा लगता था। यही बेचैनी उन्हें राजनीति की ओर खींच लाई।

राजेश पायलट की पाठशाला में सीखी राजनीति
मुरारी लाल मीना के राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय तब शुरू हुआ जब वे कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय राजेश पायलट के निजी सचिव (पीएस) बने।
राजेश पायलट उस दौर में राजस्थान ही नहीं, राष्ट्रीय राजनीति के भी बड़े नेताओं में गिने जाते थे। दौसा क्षेत्र में उनका प्रभाव निर्विवाद था। मुरारी मीना ने उनके साथ रहते हुए राजनीति का ककहरा सीखा। चुनाव प्रबंधन, बूथ मैनेजमेंट, कार्यकर्ताओं से संवाद, जनता के बीच पकड़ और संगठन को मजबूत बनाने की कला उन्होंने पायलट से ही सीखी।
कहा जाता है कि राजेश पायलट के साथ बिताया गया लंबा समय ही मुरारी मीना के राजनीतिक व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पूंजी बना।
जब कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया
राजनीति में हर नेता के जीवन में एक ऐसा मोड़ आता है जो उसके भविष्य की दिशा तय करता है। मुरारी मीना के जीवन में भी ऐसा दौर आया।
राजेश पायलट के निधन के बाद वे सक्रिय राजनीति में उतर चुके थे, लेकिन कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया। उन्होंने हार मानने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना। सबसे पहले अपनी पत्नी सविता मीना को बांदीकुई से निर्दलीय चुनाव मैदान में उतारा, हालांकि उन्हें सफलता नहीं मिली।
लेकिन मुरारी मीना पीछे हटने वालों में नहीं थे।
बसपा से चुनाव लड़कर बनाया रिकॉर्ड
वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का दामन थामा और बांदीकुई से चुनाव मैदान में उतर गए।
यह फैसला राजनीतिक रूप से जोखिम भरा था, लेकिन नतीजों ने सबको चौंका दिया। मुरारी मीना ने तत्कालीन कैबिनेट मंत्री शैलेंद्र जोशी को लगभग 42 हजार वोटों के बड़े अंतर से हराकर प्रदेश की सबसे चर्चित जीत दर्ज की।
यह सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं थी, बल्कि कांग्रेस नेतृत्व को दिया गया एक राजनीतिक संदेश था कि दौसा की धरती पर मुरारी मीना की अपनी अलग ताकत है।
सामान्य सीटों का नेता
राजस्थान की राजनीति में मुरारी लाल मीना की सबसे बड़ी विशेषता यह मानी जाती है कि उन्होंने अपना अधिकांश राजनीतिक सफर सामान्य सीटों से चुनाव लड़कर तय किया।
जातीय और आरक्षण आधारित समीकरणों के दौर में सामान्य सीटों पर लगातार जीत दर्ज करना उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक स्वीकार्यता और जनाधार को दर्शाता है।

मंत्री बनने तक का सफर
2008 में वे फिर बसपा के टिकट पर विधायक बने। इसके बाद उन्होंने बसपा के विधायकों का कांग्रेस में विलय कराया और अशोक गहलोत सरकार में पर्यटन एवं नागरिक उड्डयन मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाए गए।
इसके बाद 2013 में कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन भाजपा के शंकरलाल शर्मा से हार गए। यह उनके राजनीतिक जीवन का कठिन दौर था।
हालांकि 2018 में उन्होंने शानदार वापसी करते हुए दौसा से जीत दर्ज की और गहलोत सरकार में कृषि विपणन मंत्री बने।
सचिन पायलट से मजबूत हुआ रिश्ता
स्वर्गीय राजेश पायलट के साथ लंबे समय तक काम करने के कारण मुरारी मीना का जुड़ाव शुरू से ही सचिन पायलट से रहा।
समय के साथ यह रिश्ता और मजबूत होता गया। कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में उन्हें सचिन पायलट के विश्वसनीय नेताओं में गिना जाने लगा। हालांकि वे गहलोत सरकार में मंत्री रहे, लेकिन उनकी पहचान पायलट खेमे के मजबूत नेता के रूप में भी बनी रही।
विधायक से सांसद तक
2023 के विधानसभा चुनाव में मुरारी मीना ने दौसा सीट से जीत दर्ज की। इसके बाद कांग्रेस ने 2024 के लोकसभा चुनाव में उन पर भरोसा जताया और दौसा से उम्मीदवार बनाया।
मुरारी मीना ने भाजपा के कन्हैयालाल मीना को दो लाख से अधिक मतों से हराकर संसद का टिकट पक्का कर लिया।
यह जीत उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक मानी जाती है।

दौसा उपचुनाव और राजनीतिक संदेश
सांसद बनने के बाद खाली हुई दौसा विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने डीसी बैरवा को उम्मीदवार बनाया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सचिन पायलट, मुरारी मीना और अशोक गहलोत की संयुक्त रणनीति ने भाजपा के दिग्गज नेता डॉ. किरोड़ी लाल मीना के भाई जगमोहन मीना को हराकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया।
इस जीत ने साबित किया कि दौसा की राजनीति में मुरारी मीना का प्रभाव केवल चुनावी नहीं, बल्कि संगठनात्मक स्तर पर भी मजबूत है।
आखिर क्या है मुरारी मीना की ताकत?
राजनीतिक जानकारों की मानें तो मुरारी लाल मीना की सबसे बड़ी ताकत उनकी जमीनी राजनीति है। वे कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद रखते हैं, क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहते हैं और व्यक्तिगत संपर्क को अपनी राजनीतिक पूंजी मानते हैं।
दौसा में उनकी पकड़ केवल मीना समाज तक सीमित नहीं मानी जाती, बल्कि उन्हें 36 कौमों का नेता कहा जाता है। यही कारण है कि उनके विरोधी भी व्यक्तिगत स्तर पर उनका सम्मान करते हैं।
राजनीति के साथ परिवार की पहचान
मुरारी मीना का परिवार भी शिक्षा, प्रशासन और राजनीति में अपनी अलग पहचान रखता है। उनके एक पुत्र भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में हैं, जबकि उनकी पुत्री कानून की पढ़ाई के साथ युवा राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
निष्कर्ष
जेईएन की नौकरी छोड़कर राजनीति में आए मुरारी लाल मीना का सफर यह साबित करता है कि राजनीति में केवल विरासत ही सफलता की गारंटी नहीं होती। संघर्ष, संगठन, धैर्य और जनता का भरोसा भी किसी नेता को विधानसभा से संसद तक पहुंचा सकता है।
आज दौसा की राजनीति में मुरारी लाल मीना को ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है, जिन्होंने सत्ता से ज्यादा जनता के भरोसे को अपनी ताकत बनाया। शायद यही वजह है कि वे केवल चुनाव नहीं जीतते, बल्कि लोगों के दिलों में भी अपनी जगह बनाए रखते हैं।












































