लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
वसुंधरा राजे से टकराव के बाद बनाई अलग पार्टी
कांग्रेस में जाना सबसे बड़ी भूल
जयपुर। राजस्थान की राजनीति में कुछ नेता ऐसे रहे हैं, जिनकी पहचान सिर्फ चुनाव जीतने वाले राजनेता के तौर पर नहीं, बल्कि लंबे राजनीतिक संघर्ष, संगठनात्मक पकड़ और बेबाक तेवरों के कारण बनी। घनश्याम तिवाड़ी भी ऐसे ही नेताओं में शामिल हैं। छात्र राजनीति से शुरू हुआ उनका सफर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) और जनसंघ से होते हुए राजस्थान विधानसभा, मंत्री पद, भाजपा संगठन, अलग राजनीतिक दल, कांग्रेस और फिर भाजपा तक पहुंचा। आज वे राज्यसभा में राजस्थान का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
करीब छह दशक के राजनीतिक सफर में तिवाड़ी ने कई उतार-चढ़ाव देखे। आपातकाल के दौरान जेल गए, राजस्थान में भाजपा के शुरुआती दौर में संगठन को खड़ा करने में भूमिका निभाई, छह बार विधायक बने और तीन कार्यकाल तक राजस्थान सरकार में मंत्री रहे। इसके बाद भाजपा की तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से मतभेदों के चलते पार्टी से अलग हुए, अपनी पार्टी बनाई, कांग्रेस का रुख किया और फिर भाजपा में लौट आए।
जुलाई 2022 में वे राजस्थान से राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए। राज्यसभा के रिकॉर्ड के अनुसार उनका कार्यकाल 5 जुलाई 2022 से शुरू हुआ।


19 दिसंबर 1947 को सीकर में जन्म
घनश्याम तिवाड़ी का जन्म 19 दिसंबर 1947 को सीकर जिले के खूड़ में हुआ। उनके पिता का नाम स्वर्गीय सुवालाल तिवाड़ी और माता का नाम शकुंतला तिवाड़ी था। उनकी पत्नी पुष्पा तिवाड़ी हैं। दोनों का विवाह 3 जुलाई 1972 को हुआ। उनके परिवार में तीन संतानें हैं।
राज्यसभा में 2023 में उनके जन्मदिन पर सभापति द्वारा दी गई शुभकामनाओं में भी उनके छह बार राजस्थान विधानसभा सदस्य रहने, तीन बार मंत्री रहने और आपातकाल के दौरान जेल जाने का उल्लेख किया गया था।
शिक्षा के दौरान ही उनका झुकाव सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों की ओर हो गया था। सीकर के श्री कल्याण कॉलेज से पढ़ाई के दौरान वे छात्र राजनीति में सक्रिय हुए और छात्र संगठन के चुनाव में महामंत्री चुने गए। इसके बाद उनका जुड़ाव ABVP और जनसंघ से हुआ।
यही वह दौर था जब तिवाड़ी की राजनीतिक विचारधारा और संगठनात्मक शैली की नींव पड़ी।

छात्र राजनीति से सक्रिय सियासत तक
घनश्याम तिवाड़ी की राजनीति की शुरुआत सत्ता के गलियारों से नहीं, बल्कि छात्र राजनीति से हुई। कॉलेज के दिनों में संगठनात्मक जिम्मेदारियां संभालने के बाद उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और ABVP के माध्यम से अपना राजनीतिक आधार मजबूत किया।
इसके बाद वे जनसंघ से जुड़े और राजस्थान में संगठन के शुरुआती विस्तार के दौर का हिस्सा बने। बाद में जनसंघ की राजनीतिक धारा जनता पार्टी और फिर भारतीय जनता पार्टी तक पहुंची।
राजस्थान में भाजपा की स्थापना और विस्तार के दौर में तिवाड़ी उन नेताओं में रहे, जिन्होंने संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने में भूमिका निभाई।

आपातकाल ने बदल दिया राजनीतिक जीवन
साल 1975 में देश में आपातकाल लागू हुआ। इस दौर में विपक्षी राजनीति से जुड़े अनेक नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेल जाना पड़ा। घनश्याम तिवाड़ी भी आपातकाल के दौरान गिरफ्तार हुए और जेल में रहे।
राज्यसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी उनके आपातकाल के दौरान राजनीतिक गतिविधियों के कारण जेल जाने का उल्लेख मिलता है।
आपातकाल का यह दौर तिवाड़ी के राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। जेल यात्रा ने उन्हें राजस्थान की राजनीति में एक संघर्षशील और विचारधारा आधारित नेता की पहचान दी।

1980 में पहली बार विधानसभा पहुंचे
भाजपा के गठन के बाद राजस्थान में पार्टी को विस्तार देने के दौरान युवा नेतृत्व को आगे लाया गया। इसी क्रम में 1980 के विधानसभा चुनाव में घनश्याम तिवाड़ी को सीकर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतारा गया।
उन्होंने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सोमनाथ त्रिहन को हराकर पहली बार विधानसभा में प्रवेश किया।
1985 में भी वे सीकर से विधायक चुने गए। इसके बाद उन्होंने राजस्थान की राजनीति में अपनी पकड़ लगातार मजबूत की।
उनका विधानसभा सफर अलग-अलग क्षेत्रों से जारी रहा। वे सीकर, चोमू और बाद में सांगानेर से विधायक रहे। कुल मिलाकर वे छह बार राजस्थान विधानसभा के सदस्य चुने गए।
घनश्याम तिवाड़ी के विधानसभा चुनावों का सफर
- 1980 – सीकर से विधायक
- 1985 – सीकर से विधायक
- 1993 – चोमू से विधायक
- 2003 – सांगानेर से विधायक
- 2008 – सांगानेर से विधायक
- 2013 – सांगानेर से विधायक
खास बात यह रही कि उनके राजनीतिक जीवन के अंतिम तीन विधानसभा चुनाव लगातार सांगानेर से रहे।
संगठन में भी मजबूत पकड़
घनश्याम तिवाड़ी की पहचान सिर्फ विधानसभा के नेता की नहीं रही। भाजपा संगठन में भी उन्होंने कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं।
वे सीकर जिला भाजपा अध्यक्ष रहे। राजस्थान भाजपा में महामंत्री और अध्यक्ष सहित संगठन की विभिन्न जिम्मेदारियों पर रहे। पार्टी प्रवक्ता के तौर पर भी उन्होंने काम किया।
संगठन के भीतर उनकी पकड़ और कार्यकर्ताओं के बीच प्रभाव के कारण वे राजस्थान भाजपा के पुराने और प्रभावशाली नेताओं में गिने जाने लगे।
यही संगठनात्मक अनुभव आगे चलकर उनकी राजनीतिक पहचान की सबसे बड़ी ताकत बना।
मंत्री के रूप में भी निभाई जिम्मेदारी
घनश्याम तिवाड़ी राजस्थान सरकार में तीन कार्यकाल तक मंत्री रहे। उन्होंने अलग-अलग सरकारों में कई महत्वपूर्ण विभाग संभाले।
1998 में वे भैरोंसिंह शेखावत सरकार में ऊर्जा मंत्री रहे। इसके बाद वसुंधरा राजे के नेतृत्व वाली सरकार में उन्होंने शिक्षा और संसदीय कार्य जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभाले। बाद में खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति तथा विधि एवं न्याय जैसे विभाग भी उनके पास रहे।
राज्यसभा में 2023 में उनके जन्मदिन पर सभापति के संबोधन में उनके ऊर्जा, शिक्षा, संसदीय कार्य, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति तथा विधि एवं न्याय जैसे विभाग संभालने का उल्लेख किया गया था।
शिक्षा मंत्री के तौर पर तिवाड़ी के कार्यकाल को भी उनके राजनीतिक सफर का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। सरकारी स्कूलों में कंप्यूटर शिक्षा को बढ़ावा देने के प्रयासों का उल्लेख भी राज्यसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में किया गया है।

वसुंधरा राजे से बढ़ते गए मतभेद
राजस्थान भाजपा में घनश्याम तिवाड़ी का सबसे चर्चित राजनीतिक टकराव तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के साथ रहा।
2013 में भाजपा की सरकार बनने के बाद तिवाड़ी और राजे के बीच राजनीतिक मतभेद धीरे-धीरे सार्वजनिक होने लगे। तिवाड़ी ने कई मौकों पर सरकार और संगठन के कामकाज पर सवाल उठाए।
2015 में भी उन्होंने अपने समर्थकों के साथ शक्ति प्रदर्शन किया और भाजपा को राजस्थान में सही दिशा में ले जाने की बात कही। उस समय उनके और वसुंधरा राजे के बीच मतभेद राजस्थान भाजपा की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन गए थे।
2018 आते-आते यह टकराव निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया।

भाजपा छोड़ी, बनाई भारत वाहिनी पार्टी
2018 में घनश्याम तिवाड़ी ने भाजपा से अलग होने का फैसला किया। 22 जून 2018 को उन्होंने अपने बेटे अखिलेश तिवाड़ी के साथ मिलकर भारत वाहिनी पार्टी बनाई। पार्टी का उद्देश्य राजस्थान की राजनीति में अलग राजनीतिक विकल्प खड़ा करना था।
2018 के विधानसभा चुनाव में तिवाड़ी ने सांगानेर से भारत वाहिनी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा।
लेकिन जिस सांगानेर सीट से वे लगातार तीन बार भाजपा के टिकट पर विधायक रह चुके थे, उसी सीट पर इस बार उनका राजनीतिक प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा और वे चुनाव हार गए।
यह उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा झटका माना गया।
2019 में कांग्रेस का हाथ थामा
भाजपा से अलग होने के बाद तिवाड़ी का अगला राजनीतिक पड़ाव कांग्रेस बना।
लोकसभा चुनाव 2019 से पहले मार्च 2019 में वे कांग्रेस में शामिल हुए। उनके कांग्रेस में शामिल होने के दौरान राहुल गांधी भी मौजूद थे।
उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव भी लड़ा, लेकिन यह राजनीतिक अध्याय ज्यादा लंबा नहीं चला।
कुछ समय बाद तिवाड़ी ने फिर भाजपा में लौटने का रास्ता चुना।
2020 में फिर भाजपा में वापसी
दिसंबर 2020 में घनश्याम तिवाड़ी की भाजपा में वापसी हुई।
दो साल से ज्यादा समय तक भाजपा से बाहर रहने के बाद उनकी वापसी को राजस्थान की राजनीति में महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना गया। पार्टी में लौटते समय उन्होंने भाजपा की विचारधारा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई थी।
इस वापसी के साथ ही उनके राजनीतिक सफर का वह दौर खत्म हुआ, जिसमें उन्होंने अपनी पार्टी बनाई और कांग्रेस में भी राजनीतिक पारी खेली थी।

2022 में राज्यसभा पहुंचे
भाजपा में वापसी के करीब डेढ़ साल बाद पार्टी ने घनश्याम तिवाड़ी को राजस्थान से राज्यसभा भेजा।
5 जुलाई 2022 से वे राज्यसभा के सदस्य हैं। उनका यह पहला राज्यसभा कार्यकाल है। उपलब्ध संसदीय रिकॉर्ड के मुताबिक उनका कार्यकाल जारी है।
राज्यसभा में पहुंचने के साथ तिवाड़ी का राजनीतिक सफर विधानसभा से संसद के उच्च सदन तक पहुंच गया।
संसद में सक्रियता
राज्यसभा सदस्य के रूप में भी घनश्याम तिवाड़ी सक्रिय रहे हैं। PRS के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उनकी सदन में उपस्थिति करीब 99 प्रतिशत दर्ज की गई है। उन्होंने विभिन्न विषयों पर बहस में हिस्सा लिया और संसद में सवाल भी पूछे हैं।
इससे यह साफ होता है कि छह दशक से अधिक का राजनीतिक अनुभव रखने वाले तिवाड़ी की सक्रियता सिर्फ राजस्थान की राजनीति तक सीमित नहीं है।

राज्यसभा की आचार समिति की जिम्मेदारी
तिवाड़ी को राज्यसभा की आचार समिति यानी Committee on Ethics से जुड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी मिली है। संसद की समितियों में आचार समिति की भूमिका सांसदों के आचरण से जुड़े मामलों के संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी जाती है।
इस जिम्मेदारी ने उनके संसदीय कद को और बढ़ाया है।
जन्मदिन पर आज भी जुटते हैं समर्थक
19 दिसंबर को घनश्याम तिवाड़ी का जन्मदिन होता है। लंबे राजनीतिक सफर के कारण राजस्थान के अलग-अलग हिस्सों में उनके समर्थकों और शुभचिंतकों का नेटवर्क आज भी मौजूद है।
खासकर सीकर और आसपास के क्षेत्रों में उनकी राजनीतिक पहचान लंबे समय से मजबूत रही है। यही कारण है कि उनके जन्मदिन और राजनीतिक कार्यक्रमों में पुराने कार्यकर्ताओं और समर्थकों की मौजूदगी चर्चा का विषय बनती रही है।
‘भाया’ के नाम से भी पहचान
घनश्याम तिवाड़ी की राजनीतिक शैली हमेशा से बेबाक रही है। कार्यकर्ताओं के बीच वे अपने सहज व्यवहार और संगठनात्मक पकड़ के लिए जाने जाते रहे हैं।
समर्थकों के बीच उनका लोकप्रिय संबोधन ‘भाया’ भी रहा है।
उनकी राजनीति में एक तरफ संगठन और विचारधारा की स्पष्ट छाप दिखाई देती है, तो दूसरी तरफ अपने राजनीतिक मतभेदों को खुलकर सामने रखने की शैली भी उनकी पहचान रही है।
निजी जीवन और परिवार
घनश्याम तिवाड़ी का विवाह पुष्पा तिवाड़ी से हुआ। राज्यसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार उनके परिवार में तीन संतानें हैं—दो पुत्र और एक पुत्री।
उनके परिवार का राजनीतिक गतिविधियों से भी जुड़ाव रहा है। 2018 में भारत वाहिनी पार्टी के गठन में उनके बेटे अखिलेश तिवाड़ी की भी भूमिका रही थी।

छात्र राजनीति से राज्यसभा तक—एक नजर में
घनश्याम तिवाड़ी की राजनीतिक यात्रा को अगर एक टाइमलाइन में देखें तो यह सफर कई महत्वपूर्ण पड़ावों से होकर गुजरा है—
1947 – 19 दिसंबर को सीकर जिले में जन्म।
1968 – छात्र राजनीति से सक्रिय शुरुआत और छात्र संगठन में महामंत्री बने।
1975 – आपातकाल के दौरान जेल गए।
1980 – सीकर से पहली बार विधायक चुने गए।
1985 – दूसरी बार सीकर से विधानसभा पहुंचे।
1993 – चोमू से विधायक बने।
1998 – राजस्थान सरकार में ऊर्जा मंत्री की जिम्मेदारी संभाली।
2003 – सांगानेर से विधायक चुने गए और शिक्षा एवं संसदीय कार्य जैसे विभाग संभाले।
2007 – खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति तथा विधि एवं न्याय विभाग की जिम्मेदारी मिली।
2008 – सांगानेर से फिर विधायक बने।
2013 – सांगानेर से लगातार तीसरी बार विधायक चुने गए।
2018 – भाजपा से अलग होकर भारत वाहिनी पार्टी बनाई और सांगानेर से चुनाव लड़ा।
2019 – कांग्रेस में शामिल हुए और लोकसभा चुनाव लड़ा।
2020 – भाजपा में वापसी की।
2022 – राजस्थान से राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए।
वर्तमान – राज्यसभा सदस्य के रूप में सक्रिय हैं और संसदीय समितियों में जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
छह दशक की राजनीति में कई मोड़
घनश्याम तिवाड़ी का राजनीतिक सफर राजस्थान की बदलती राजनीति की एक तस्वीर भी पेश करता है।
RSS और छात्र राजनीति से शुरुआत…
जनसंघ से जुड़ाव…
आपातकाल की जेल…
भाजपा के शुरुआती संगठन को मजबूत करने की कोशिश…
छह बार विधानसभा की सदस्यता…
तीन कार्यकाल तक मंत्री पद…
वसुंधरा राजे से राजनीतिक टकराव…
भाजपा से अलग होकर अपनी पार्टी बनाना…
कांग्रेस का रुख करना…
और फिर उसी भाजपा में वापस लौटना…
इसके बाद राज्यसभा पहुंचना।
यह सफर बताता है कि तिवाड़ी ने राजस्थान की राजनीति में सिर्फ सत्ता के दौर नहीं देखे, बल्कि विपक्ष और राजनीतिक संघर्ष के दौर से भी गुजरे हैं।
आज वे राजस्थान भाजपा के उन वरिष्ठ नेताओं में शामिल हैं, जिनके पास संगठन, विधानसभा सरकार और संसद—तीनों स्तरों का लंबा अनुभव है।
छात्र राजनीति से शुरू हुआ यह सफर अब राज्यसभा तक पहुंच चुका है। लेकिन घनश्याम तिवाड़ी की राजनीति की सबसे बड़ी पहचान आज भी वही है—बेबाक बयान, संगठन पर पकड़ और बदलते राजनीतिक हालात में अपनी अलग पहचान बनाए रखने की कोशिश।
















































