लोक टुडे न्युज़ नेटवर्क
रिपोर्ट: तुषार पुरोहित, सिरोही
सिरोही जिले के पिंडवाड़ा क्षेत्र के वाटेरा गांव में शुक्रवार आधी रात को धरती विरोध के नारों से कांप उठी। “कमलेश मेटा हाय-हाय” और “धरती मां की जय” की गूंज के साथ ग्रामीणों ने प्रस्तावित चूना पत्थर खनन परियोजना के खिलाफ पुतला शवयात्रा निकालकर अपना आक्रोश जताया।
महिलाओं की चीखें, बच्चों की सिसकियां और गलियों में पसरा मातम जैसे सन्नाटा इस बात की गवाही दे रहे थे कि गांव अब अपनी धरती, जल और जंगल की रक्षा के लिए निर्णायक लड़ाई लड़ने को तैयार है।
आधी रात को निकली पुतला शवयात्रा
वाटेरा गांव के चौक में ग्रामीणों ने “मेसर्स कमलेश मेटाकास्ट प्राइवेट लिमिटेड, जयपुर” लिखा पुतला अर्थी पर रखकर पूरे गांव में शवयात्रा निकाली।
“धरती मां अमर रहे, जल-जंगल-जमीन हमारी है” के नारों से पूरा इलाका गूंज उठा। शवयात्रा के बाद पुतले का दहन किया गया — दहकती लपटों में लोगों का दर्द और गुस्सा साफ झलक रहा था।
चार ग्राम पंचायतों का संयुक्त विरोध
यह आंदोलन अब केवल वाटेरा तक सीमित नहीं रहा। वाटेरा, भीमाना, भारजा और रोहिड़ा ग्राम पंचायतों के 12 गांवों के ग्रामीण पिछले डेढ़ महीने से लगातार विरोध, धरने और ज्ञापन देकर परियोजना निरस्त करने की मांग कर रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि उनकी खातेदारी भूमि इस परियोजना में आ रही है, जिसे वे किसी भी कीमत पर नहीं देंगे।
“हमारी जमीन हमारी मां है। इसे खोदने नहीं देंगे, चाहे आर-पार की लड़ाई ही क्यों न लड़नी पड़े।” — एक बुजुर्ग किसान
️ ‘दीवाली पर अंधेरा’ — गांवों ने तय किया मौन उत्सव
जहां देशभर में दीपावली की रौनक थी, वहीं वाटेरा सहित आसपास के गांवों में दीये नहीं जले। ग्रामीणों ने फैसला किया है कि जब तक सरकार खनन परियोजना निरस्त नहीं करती, वे कोई त्योहार नहीं मनाएंगे।
“दीवाली तो तब मनाएंगे जब हमारी जमीन सुरक्षित होगी।” — एक महिला ग्रामीण
बच्चों की मासूम पुकार
गांवों के बच्चे भी आंदोलन की हवा में जी रहे हैं।
“पापा, कमलेश मेटा का क्या हुआ?”
यह सवाल जब बच्चे पूछते हैं तो पिता खामोश हो जाते हैं — चिंता और असहायता के बीच उम्मीद की किरण तलाशते हुए।
⚡ नेताओं की चुप्पी पर जनता का गुस्सा
ग्रामीणों ने सत्ता और विपक्ष दोनों पर नाराजगी जताई।
“वोट के वक्त सब आते हैं, अब जब हमारी जमीन खतरे में है, तो कोई नहीं दिखता।”
लोगों ने चेताया है कि अगर सरकार ने अब भी नहीं सुना, तो यह आंदोलन राज्यव्यापी जनज्वालामुखी बन जाएगा।

धरती, जल और जंगल की रक्षा की जंग
ग्रामीणों का यह आंदोलन केवल जमीन का नहीं, बल्कि पर्यावरण और भविष्य की पीढ़ियों की सुरक्षा का प्रश्न बन चुका है।
“अगर जंगल कटे, पानी सूखा और धरती खोदी गई तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी।”
वाटेरा की वह रात अब इतिहास में दर्ज हो चुकी है — जब गांव के आंसू आग बन गए, और लोगों ने ठान लिया —
“अब हमारी जमीन, हमारी होगी — चाहे कुछ भी हो जाए।

















































