लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
नासदीय सूक्त और बिग बैंग
हेमराज तिवारी
ऋग्वेद का नासदीय सूक्त (मंडल 10, सूक्त 129) प्राचीन भारतीय मनीषा का वह रत्न है, जो ब्रह्मांड की उत्पत्ति पर सबसे गहरे प्रश्न उठाता है। यह केवल धार्मिक स्तुति नहीं, बल्कि एक अद्वितीय दार्शनिक और वैज्ञानिक विमर्श है। आज, जब आधुनिक विज्ञान की बिग बैंग थ्योरी ब्रह्मांड की शुरुआत का सबसे स्वीकार्य मॉडल है, तो यह सूक्त अपने आश्चर्यजनक साम्य के कारण पुनः चर्चा में आ जाता है।
ब्रह्मांड-पूर्व स्थिति का वर्णन
सूक्त का प्रारंभ ही ब्रह्मांड-पूर्व अवस्था को परिभाषित करता है:
> “नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्”
— (तब न अस्तित्व था, न अनस्तित्व; न आकाश था, न उसके पार कुछ और।)
यह उस ‘शून्यावस्था’ का चित्रण है, जहाँ समय, स्थान, पदार्थ और ऊर्जा — कुछ भी नहीं था। यह विज्ञान की उस सिंगुलैरिटी अवधारणा से मेल खाता है, जहाँ भौतिकी के नियम भी लागू नहीं होते।
बिग बैंग सिद्धांत की संक्षिप्त रूपरेखा
बिग बैंग थ्योरी के अनुसार लगभग 13.8 अरब वर्ष पूर्व, एक अत्यंत सूक्ष्म, अनंत घनत्व वाले बिंदु से अचानक विस्तार हुआ।
प्री-बिग बैंग — समय और स्थान का अभाव।
विस्फोट और विस्तार — ऊर्जा का तीव्र प्रसार, प्रारंभिक कणों का निर्माण।
ब्रह्मांड का विकास — अरबों वर्षों में तारे, आकाशगंगाएं और ग्रह।
वैदिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अद्भुत मेल
नासदीय सूक्त बिग बैंग थ्योरी
“न असत्… न सत्…” — अस्तित्व और अनस्तित्व दोनों का अभाव सिंगुलैरिटी अवस्था — भौतिकी के नियम विफल
“तम आसीत्तमसा गूळमग्रे” — चारों ओर अंधकार बिग बैंग से पहले प्रकाश का अभाव”तपसा तन्महिनाजायतैकम्” — तप (ऊर्जा) से एक का जन्म ऊर्जा विस्फोट से ब्रह्मांड का विस्तार
“को अद्वेह क इह प्रवोचत्” — कौन जानता है? बिग बैंग के पहले क्या था — अनुत्तरित प्रश्न
दार्शनिक विनम्रता और वैज्ञानिक ईमानदारी
सूक्त के अंतिम मंत्र में ऋषि स्वीकार करते हैं कि शायद सृष्टि करने वाला भी नहीं जानता कि सृष्टि कैसे हुई। यह विनम्रता आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मेल खाती है, जो स्वीकार करता है कि बिग बैंग से पहले की स्थिति हमारी वर्तमान समझ से बाहर है।
यह समानता संयोग मात्र नहीं लगती। यह इस तथ्य का संकेत है कि प्राचीन भारतीय चिंतन में केवल धार्मिक भावनाएं ही नहीं, बल्कि गहरी तर्कपूर्ण खोज भी निहित थी। ऋषियों ने ध्यान और अनुभूति से जिस ब्रह्मांडीय सत्य का अनुभव किया, विज्ञान ने उसे गणना और यंत्रों से प्रमाणित करने का प्रयास किया।
वेद हमें यह सिखाते हैं कि सत्य की खोज में किसी भी सीमा — चाहे वह धर्म हो या विज्ञान — को पार करना आवश्यक है। विज्ञान और अध्यात्म, दोनों ही अपूर्ण हैं यदि वे एक-दूसरे से संवाद न करें। नासदीय सूक्त और बिग बैंग का यह संगम हमें यह याद दिलाता है कि ज्ञान का असली लक्ष्य उत्तर नहीं, बल्कि प्रश्न पूछने की क्षमता बनाए रखना है।
