लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
बकानी के रायसिंह लोधा ने दो बीघा में बिना रासायनिक खाद के उगाया बाजरा, फसल तैयार होते ही खरीददार पहुंचने लगे खेत
झालावाड़। (सुनील निगम) । राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में प्रमुखता से की जाने वाली बाजरे की खेती अब झालावाड़ जिले की धरती पर भी रंग दिखा रही है। बकानी तहसील के रात्याडूंगरी गांव निवासी किसान रायसिंह पुत्र बालचंद लोधा ने अपने खेत में दो बीघा जमीन पर बाजरे की खेती कर नया प्रयोग किया है। खास बात यह रही कि किसान ने कम लागत में और बिना रासायनिक खाद के फसल तैयार कर दिखाई।
जोधपुर से मिली जानकारी, ऑनलाइन मंगवाया बीज
किसान रायसिंह ने बताया कि कुछ समय पहले जोधपुर क्षेत्र से कुछ लोग ट्रैक्टर लेकर उनके इलाके में आए थे। बातचीत के दौरान उन्हें बाजरे की खेती के बारे में जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने बाजरे की खेती करने का निर्णय लिया।
रायसिंह ने ऑनलाइन करीब तीन किलो बाजरे का बीज 1600 रुपए में मंगवाया और अपने दो बीघा खेत में इसकी बुवाई कर दी। किसान के अनुसार फसल की पूरी अवधि में उन्होंने केवल एक बार दवाई का छिड़काव किया। इसके अलावा किसी तरह के रासायनिक खाद का उपयोग नहीं किया।
बिना रासायनिक खाद के तैयार हुई फसल
कम लागत और सीमित संसाधनों के बावजूद खेत में बाजरे की फसल अच्छी तरह तैयार हुई। अब फसल की बालियां पककर तैयार हो चुकी हैं और किसान ने उन्हें तोड़ने का काम भी शुरू कर दिया है।
रायसिंह के अनुसार बाजरे की खेती से उन्हें अनाज के साथ-साथ पशुओं के लिए पौष्टिक चारा भी बड़ी मात्रा में मिल रहा है। कम लागत में फसल तैयार होने से उन्हें इस प्रयोग से अच्छे मुनाफे की उम्मीद है।
फसल तैयार होने से पहले ही मिलने लगे खरीददार
इस प्रयोग की एक खास बात यह रही कि बाजरे की फसल पूरी तरह तैयार होने से पहले ही आसपास के लोग इसे खरीदने के लिए किसान से संपर्क करने लगे। इससे रायसिंह को अपनी पूरी फसल बाजार तक ले जाने की जरूरत नहीं पड़ी और खेत से ही बाजरा बेचने के अवसर मिलने लगे।
दूसरे किसान भी पहुंचे खेत देखने
रायसिंह के खेत में तैयार बाजरे की फसल को देखने और खेती की जानकारी लेने आसपास के किसान भी पहुंच रहे हैं। कई किसानों ने अगले वर्ष अपने खेतों में भी बाजरे की खेती करने की इच्छा जताई है।
मारवाड़ की फसल ने झालावाड़ में बनाई जगह
बाजरा राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र की प्रमुख फसलों में माना जाता है, लेकिन बकानी के किसान रायसिंह लोधा के इस प्रयोग ने दिखाया है कि अलग भौगोलिक क्षेत्र में भी किसान नई फसल को आजमाकर संभावनाएं तलाश सकते हैं। कम लागत में तैयार हुई यह फसल अब क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। आने वाले समय में यदि दूसरे किसान भी इसे अपनाते हैं तो झालावाड़ में बाजरे की खेती का दायरा बढ़ सकता है।
रिपोर्ट: सुनील निगम, लोक टुडे