लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
दीपावली पर्व के आगाज़ के साथ ही करवा चौथ का पर्व भी पूरे देश में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। सुहागिन महिलाओं के लिए यह दिन “जुग जुग जिए मेरा सुहाग” की कामना का प्रतीक माना जाता है।
इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अखंड सौभाग्य और सुहाग की सुरक्षा के लिए निर्जल व्रत रखती हैं। करवा चौथ का यह पर्व न केवल वैवाहिक जीवन में प्रेम और निष्ठा का प्रतीक है, बल्कि दांपत्य जीवन में सामंजस्य, सुख और समृद्धि भी लाता है।
धार्मिक महत्व
करवा चौथ के दिन विवाहित महिलाएं पूरे दिन बिना अन्न-जल ग्रहण किए चौथ माता की कथा का श्रवण करती हैं और रात में चंद्रमा को अर्घ्य अर्पित करने के बाद ही व्रत का पारण करती हैं।
माना जाता है कि इस व्रत से —
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पति को दीर्घायु और स्वस्थ जीवन का आशीर्वाद मिलता है।
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दांपत्य जीवन में विश्वास और प्रेम बढ़ता है।
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घर-परिवार में शांति और समृद्धि का आगमन होता है।
चौथ माता और चंद्र देव को इस दिन विशेष रूप से पूजा जाता है क्योंकि चंद्रमा को मन, शांति और स्थिरता का प्रतीक माना गया है।
पूजन की परंपरा
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महिलाएं सायंकाल भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की पूजा करती हैं।
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मिट्टी के करवे में जल भरकर चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं।
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पति के हाथों से जल ग्रहण कर व्रत का पारण करती हैं।
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छलनी से चंद्र दर्शन कर अपने वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से करवा चौथ का महत्व
इस पर्व के पीछे धार्मिक ही नहीं, वैज्ञानिक कारण भी छिपे हैं:
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चंद्रमा मन का कारक है, इसलिए इस दिन उसकी पूजा करने से मन को शांति और संतुलन प्राप्त होता है।
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मिट्टी के करवे से जल ग्रहण करना आयुर्वेद के अनुसार स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है, क्योंकि मिट्टी पंचतत्वों — जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी और आकाश — का प्रतीक होती है।
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छलनी से चांद को देखने से आंखों पर कम रोशनी पड़ती है, जो नकारात्मकता दूर करने और मानसिक संतुलन में सहायक मानी जाती है।
कुंवारी कन्याओं के लिए भी विशेष महत्व
हालांकि करवा चौथ मुख्य रूप से विवाहित महिलाओं का व्रत है, लेकिन कुंवारी कन्याएं भी मनचाहे वर की प्राप्ति की कामना से यह व्रत रख सकती हैं।
वे नए और साफ वस्त्र धारण कर तारों को देखकर व्रत का पारण करती हैं।
करवा चौथ केवल एक पर्व नहीं, बल्कि वैवाहिक रिश्ते की मजबूती, अटूट प्रेम और आस्था का प्रतीक है। धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों दृष्टियों से यह व्रत नारी शक्ति के संकल्प, समर्पण और प्रेम का उत्सव है।
इस दिन की पूजा और परंपरा से न केवल पारिवारिक जीवन में सकारात्मकता आती है, बल्कि मानसिक और शारीरिक रूप से भी यह महिलाओं को सशक्त बनाती है।


















































