लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
नामजद रिपोर्ट के बावजूद नहीं पकड़े आरोपी, जनआक्रोश के बाद बनी एसआईटी तो खुली पुलिस की पोल
भरतपुर। भरतपुर पुलिस की कार्यशैली एक बार फिर कठघरे में है। नगला हरिहर (थाना भुसावर) निवासी प्रहलाद बैरवा के अपहरण और हत्या के मामले ने खाकी की संवेदनहीनता, लापरवाही और सुस्त जांच व्यवस्था को बेनकाब कर दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब परिजनों ने शुरुआत में ही नामजद रिपोर्ट दर्ज करा दी थी, तो आखिर 16 महीने तक पुलिस करती क्या रही?
26 मार्च 2025 को प्रहलाद बैरवा रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हुए। परिवार ने तत्काल पुलिस को नामजद शिकायत दी और लगातार आरोपियों की ओर इशारा करता रहा। लेकिन आरोप है कि पुलिस ने न तो आरोपियों को पकड़कर सख्ती से पूछताछ की और न ही मामले को गंभीरता से लिया। नतीजा यह रहा कि एक परिवार 16 महीने तक अपने बेटे की तलाश में पुलिस और प्रशासन के चक्कर काटता रहा, जबकि आरोपी खुलेआम घूमते रहे।
धरना लगा तो जागी पुलिस
जब न्याय की हर उम्मीद टूट गई, तब 8 जुलाई 2026 को पीड़ित परिवार सड़क पर उतर आया। धरना शुरू हुआ और देखते ही देखते यह जनआंदोलन बन गया। भीम आर्मी, बैरवा समाज, अनुसूचित जाति संगठनों सहित अनेक सामाजिक संगठनों ने खुलकर समर्थन दिया। प्रशासन को उग्र आंदोलन की चेतावनी दी गई।
जनदबाव बढ़ा तो पुलिस की नींद टूटी। आनन-फानन में अनुसंधान अधिकारी बदला गया, नई एसआईटी बनाई गई और जिन लोगों के नाम पहले दिन से सामने थे, उन्हें पकड़कर पूछताछ शुरू हुई।
15 दिन में खुल गया राज, जो 16 महीने तक नहीं खुला
नई एसआईटी की पूछताछ में चौंकाने वाला खुलासा हुआ। पुलिस के अनुसार आरोपी धर्मेंद्र उर्फ जितेंद्र धाकड़ और विनोद कुमार मीणा ने सरकारी नौकरी दिलाने का झांसा देकर प्रहलाद से ₹3 लाख 95 हजार 500 ऐंठ लिए थे। जब प्रहलाद ने अपने पैसे वापस मांगे तो उसे धौलपुर के आंगई जंगल में ले जाकर शराब पिलाई गई और मोटरसाइकिल के क्लच वायर से गला घोंटकर हत्या कर दी गई।
पुलिस ने आरोपियों की निशानदेही पर जंगल से मृतक की हड्डियां, फटे कपड़े और हत्या में प्रयुक्त क्लच वायर बरामद किया है। दोनों आरोपी पुलिस रिमांड पर हैं।
अब जवाब दे भरतपुर पुलिस…
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो आरोपी 16 महीने तक पुलिस की पकड़ से बाहर रहे, वही एसआईटी बनने के कुछ दिनों में कैसे टूट गए?
यदि शुरुआत में ही गंभीर पूछताछ होती तो क्या प्रहलाद बैरवा के परिवार को 16 महीने तक न्याय के लिए सड़क पर बैठना पड़ता?
क्या शुरुआती जांच महज खानापूर्ति थी?
क्या लापरवाही बरतने वाले पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होगी?
क्या उन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई होगी जिन्होंने नामजद शिकायत के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं की?
जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर
इस पूरे घटनाक्रम के बाद लोगों में भारी आक्रोश है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि यदि पुलिस ने शुरुआत में ही ईमानदारी और गंभीरता से काम किया होता तो परिवार को डेढ़ साल तक न्याय के लिए भटकना नहीं पड़ता। प्रदर्शनकारियों ने यह भी मांग उठाई है कि केवल हत्यारों को गिरफ्तार करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मामले में शुरुआती जांच में हुई कथित लापरवाही की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
सवाल सिर्फ एक हत्या का नहीं, सिस्टम की जवाबदेही का है
प्रहलाद बैरवा अब वापस नहीं आएंगे। लेकिन यह मामला भरतपुर पुलिस के सामने ऐसा आईना बनकर खड़ा है, जिसमें जांच की सुस्ती, जवाबदेही की कमी और जनदबाव के बाद होने वाली कार्रवाई साफ दिखाई देती है। अब नजर इस बात पर है कि क्या पुलिस केवल हत्या का पर्दाफाश करके अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेगी, या फिर 16 महीने तक मामले को ठंडे बस्ते में रखने वालों की जवाबदेही भी तय होगी।














































