*बारिश की विदाई का संदेश… कांस के फूलों से सफेद हुई धरती*

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

*पहाड़ों की हरियाली के बीच दूर-दूर तक खिले कांस ने बदला मौसम का मिजाज;*

 *मानसून के बूढ़े होने का प्रकृति ने दिया संकेत*

फोटो व कंटेंट : डॉ. कमलेश शर्मा, 

 

जयपुर। मानसून अब विदाई की ओर है… आसमान में बादलों की आवाजाही भले जारी हो, लेकिन प्रकृति ने मौसम बदलने का अपना संदेश दे दिया है। जयपुर-कूकस रोड के आसपास इन दिनों दूर तक फैले कांस के सफेद फूल मानो धरती पर बिछी चांदी की चादर नजर आ रहे हैं। पहाड़ियों की हरी पृष्ठभूमि के बीच सफेद कांस का यह विस्तार ऐसा दृश्य रच रहा है, जिसे देखते ही निगाहें ठहर जाती हैं।

 

कांस के फूलों का खिलना भारतीय लोक-परंपरा में लंबे समय से वर्षा ऋतु की विदाई और शरद ऋतु के आगमन से जोड़ा जाता रहा है। इसकी खूबसूरती का वर्णन गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में भी किया है

“विगत शरद रितु आई, देखहूं लक्ष्मण परम सुहाई।

फूले कास सकल मही छाई, जनु बरसा कृत प्रकट बुढ़ाई॥”

 

अर्थात शरद ऋतु आ गई है। कांस के फूलों से पूरी धरती ढक गई है। ऐसा लगता है जैसे वर्षा ऋतु अब बूढ़ी हो चुकी है और अपनी विदाई का संकेत दे रही है।

*जहां आमतौर पर झुंड छोटे होते हैं, वहां सफेद मैदान*

कांस की खासियत यह है कि यह सामान्यतः किसी खेत की तरह व्यवस्थित तरीके से नहीं उगता। खाली पड़ी जमीन, सड़क किनारे की जगह, नदी-नालों के आसपास या नम मिट्टी वाले खुले क्षेत्रों में यह स्वतः उगने वाला घास कुल का पौधा है। सामान्य परिस्थितियों में इसके पौधे छोटे-छोटे समूहों में दिखाई देते हैं।

लेकिन कूकस रोड के आसपास का दृश्य कुछ अलग है। यहां कई स्थानों पर कांस इतनी बड़ी संख्या में फैला हुआ है कि पहली नजर में लगता है मानो किसी ने इसकी बाकायदा खेती कर दी हो। कई जगह सफेद फूलों का विस्तार दूर तक नजर आता है और हरी पहाड़ियों के बीच यह पूरा क्षेत्र एक प्राकृतिक लैंडस्केप जैसा दिखाई देता है।

*कांस असल में क्या है?*

कांस का वैज्ञानिक नाम Saccharum spontaneum है। अंग्रेजी में इसे Wild Sugarcane यानी जंगली गन्ना कहा जाता है। यह Poaceae (घास कुल) का पौधा है और गन्ने की ही वंशावली से संबंधित है।

हालांकि इसे सामान्य गन्ने की तरह मीठे रस या चीनी उत्पादन के लिए नहीं उगाया जाता। यह एक बहुवर्षीय घास है, जो भूमिगत तनों यानी राइजोम के माध्यम से फैल सकती है। अनुकूल परिस्थितियां मिलने पर यह खाली जमीन पर तेजी से अपना विस्तार कर लेती है।

कांस की एक खास विशेषता यह भी है कि यह कई तरह के चरने वाले पशुओं के लिए पसंदीदा चारा नहीं है। इसी कारण जहां दूसरी वनस्पतियां चराई के कारण कम हो जाती हैं, वहां कांस को फैलने का अवसर मिल सकता है।

*बीज से ज्यादा जमीन के भीतर फैलता है साम्राज्य*

कांस के फूल भले ऊपर दिखाई देते हों, लेकिन इसकी असली ताकत जमीन के नीचे होती है। इसके राइजोम मिट्टी के भीतर फैलते हैं और उनसे नए पौधे निकलते रहते हैं। यही कारण है कि एक बार अनुकूल परिस्थितियां मिलने पर कांस किसी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर फैल सकता है।

मानसून के दौरान पर्याप्त नमी मिलने के बाद इसकी वृद्धि तेज होती है। मौसम के आगे बढ़ने पर पौधे पर सफेद, रेशमी फूलों जैसे पुष्पक्रम (inflorescence) निकलते हैं। हवा चलने पर ये महीन सफेद रेशे लहराते हैं और पूरा क्षेत्र धुंधले-सफेद रंग में बदल जाता है।

*कांस का फूल वास्तव में फूल नहीं, पुष्पक्रम है*

जिसे हम सामान्य भाषा में कांस का फूल कहते हैं, वह तकनीकी रूप से एक अकेला फूल नहीं बल्कि बहुत से छोटे-छोटे फूलों का पुष्पक्रम है। इसका यह सफेद, मुलायम और पंखदार रूप ही इसे इतना आकर्षक बनाता है।

परिपक्व होने पर इसके बीजों के साथ महीन रोएं विकसित होते हैं, जो हवा के साथ दूर तक जा सकते हैं। इससे कांस को नए स्थानों तक फैलने में मदद मिलती है।

*कभी गद्दों में भरते थे कांस के फूल*

आज कांस का इस्तेमाल मुख्य रूप से प्राकृतिक दृश्य और पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा होने के कारण दिखाई देता है, लेकिन ग्रामीण जीवन में कभी इसकी उपयोगिता भी थी। इसके सूखे मुलायम पुष्पक्रम और रेशेदार सामग्री का इस्तेमाल गद्दे, तकिए और अन्य घरेलू उपयोग की वस्तुओं में भराव सामग्री के रूप में किया जाता था।

आधुनिक जीवनशैली और बाजार में उपलब्ध कृत्रिम तथा औद्योगिक सामग्री के बढ़ते इस्तेमाल के कारण कांस की यह पारंपरिक उपयोगिता लगभग समाप्त हो गई है।

 

*सिर्फ खूबसूरती नहीं, पारिस्थितिकी में भी भूमिका*

 

कांस को केवल मानसून की विदाई का प्रतीक मानना इसके महत्व को सीमित कर देगा। यह प्राकृतिक घासभूमि और नदी-तटीय पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी जड़ें मिट्टी को बांधने में मदद करती हैं और वनस्पति आवरण भूमि के कटाव को कम करने में योगदान दे सकता है।

 

हालांकि किसी क्षेत्र में इसका अत्यधिक विस्तार हमेशा सकारात्मक नहीं माना जा सकता। यदि यह स्थानीय वनस्पतियों को पीछे छोड़कर बहुत तेजी से फैल जाए, तो वनस्पति समुदाय की संरचना प्रभावित हो सकती है। इसलिए कांस को उसके स्थानीय पारिस्थितिक संदर्भ में देखना ज्यादा उचित है।

 

*फोटो में मौसम बदलने की कहानी*

 

कूकस रोड पर खींची गई यह तस्वीर केवल फूलों की खूबसूरती नहीं दिखाती, बल्कि मौसम के संक्रमण की पूरी कहानी कहती है। एक तरफ पहाड़ों पर मानसून की हरियाली है, तो दूसरी तरफ उन्हीं पहाड़ियों के बीच सफेद कांस का विस्तार—मानो प्रकृति खुद बता रही हो कि बरसात का मौसम अब अपने अंतिम पड़ाव पर है और शरद दस्तक दे रही है।

 

हवा के साथ लहराते कांस के फूलों को देखकर तुलसीदास की सदियों पुरानी पंक्तियां आज भी उतनी ही जीवंत लगती हैं—

 

“फूले कास सकल मही छाई…”

 

मानो सचमुच बारिश की विदाई पर धरती ने सफेद चादर ओढ़ ली हो।

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