जब अंता की रणभूमि ठंडी पड़ने लगी! राजे की एंट्री

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लोक टुडे न्युज़ नेटवर्क
अहसास की कलम से ..….
अंता विधानसभा उपचुनाव में आखिरकार वह घड़ी आ ही गई जिसका इंतज़ार पार्टी के कार्यकर्ताओं से ज़्यादा शायद कैमरे कर रहे थे — पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की एंट्री!
जी हां, “राजे आईं”, और जैसे ही यह खबर आई, बीजेपी दफ्तरों में सूखा पड़ा जोश अचानक फिर से ‘सरकारी कार्यक्रम’ की तरह एक्टिव हो गया।
कहने को तो पार्टी शुरू से एकजुट थी, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त यह थी कि दुष्यंत सिंह “एकला चलो रे” मोड में मैदान मारने निकले थे — न मम्मी का साथ, न बड़े नेताओं का आसरा, बस अपने नाम और अपनी मेहनत पर चुनावी रथ खींचते रहे। अब जब महारानी अंता पहुंच रही हैं, तो प्रचार में ‘प्राण फूंकने’ की बातें हो रही हैं। सवाल यह है कि पार्टी में प्राण कब निकले थे — और क्यों?
पार्टी सूत्रों का कहना है कि कई दिनों तक राजे की चुप्पी और अंता से दूरी ने कार्यकर्ताओं को उलझन में डाल रखा था।
लोग पूछने लगे थे — “क्या यह राजे का क्षेत्र नहीं?”
अब जब माहौल थोड़ा ठंडा पड़ा और चर्चाएँ गर्म होने लगीं, तो अचानक कार्यक्रम तय हो गया — “राजे ने मंगलवार को अंता चुनाव में एंट्री ली ”
लगता है दिल्ली से लेकर जयपुर तक, सबने एक बात समझ ली — अगर चुनावी जंग में महारानी नहीं उतरीं, तो मोरपाल सुमन की किस्मत मुश्किल में पड़ सकती है।
बीजेपी ने तो शुरुआत से ही सारा दारोमदार दुष्यंत सिंह के कंधों पर डाल दिया था …..मानो पूरा चुनाव उन्हीं की “राजनीतिक इंटर्नशिप” का हिस्सा हो।
लेकिन अब राजे के आने से यह साफ हो गया कि अकेले बेटे की नाव बहते-बहते हिचकोले खाने लगी थी।
कहा जा सकता है, अब चुनाव में ‘मातृबल’ जुड़ गया है और पार्टी के रणनीतिकारों ने राहत की सांस ली है।
वहीं मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा भी मैदान में नहीं, बल्कि वीसी (वर्चुअल कनेक्शन) के ज़रिए प्रचार की समीक्षा कर रहे हैं।
कहा, “सभी अंता में रहेंगे, कोई घर नहीं जाएगा।”
सुनने में तो यह अनुशासन जैसा लगा, मगर राजनीतिक हलकों में यह बात घूम रही है —
जब मुख्यमंत्री खुद मैदान में नहीं उतरे, तो कार्यकर्ता कितने “अंता” में रहेंगे, यह वक्त बताएगा।
मदन राठौड़ से लेकर राजेंद्र राठौड़ तक, स्टार प्रचारकों की सूची लंबी है लेकिन हाज़िरी बेहद छोटी।
अब राजे की एंट्री के बाद सबको उम्मीद है कि बाकी बड़े चेहरे भी अब “वसुंधरा के साये” में मंच साझा करते नज़र आएंगे।
कहीं ऐसा न हो कि चुनाव प्रचार अब एकता का नहीं, “फोटो ऑप” का प्रतीक बन जाए।
अंता की लड़ाई अब सिर्फ़ एक उपचुनाव नहीं, बल्कि बीजेपी के अंदर की ‘सत्ता समीकरण परीक्षा’ बन चुकी है।
राजे का आना एक चुनावी औषधि जैसा है …
जोश बढ़ाने के लिए जरूरी, लेकिन देर से दिया गया इंजेक्शन।
और अब जब महारानी मैदान में हैं ……
तो सवाल यही है:
क्या अब प्रचार में जान आएगी, या यह भी महज़ “जनसंपर्क की औपचारिकता” बनकर रह जाएगी?
क्योंकि जनता अब सब जानती है …..
राजनीति में एंट्री जब मजबूरी से होती है, तो जीत भी अक्सर समझौते में बदल जाती है।
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