वाह री सियासत! जयपुर में ‘कोरम-कोरम’ का खेल, जनता देखती रह गई तमाशा

0
171
- Advertisement -
लोक टुडे न्युज़ नेटवर्क
अहसास की आलम से …..
जयपुर नगर निगम ग्रेटर का रंगमंच…..जनता फिर ठगी सी देखती रह गई तय शुदा नाटक……
तो साहिबान, कद्रदान, मेहरबान! देखिए, आपकी चुनी हुई सरकार किस मेहनत और योजनाबद्ध ढंग से जनता के नाम पर “राजनीतिक रंगमंच” सजा रही है। शनिवार को जयपुर नगर निगम ग्रेटर में एक नया अध्याय जुड़ा — “कोरम का कुरुक्षेत्र”!
जयपुर नगर निगम ग्रेटर की मेयर साहिबा मंच पर, चेहरे पर शिकन और इंतज़ार में डूबीं। उधर डिप्टी मेयर साहब अपने 11 साथियों के साथ अपने कमरे में—शांत, संयमित, मगर दृढ़। कह रहे थे:
“जनता का पैसा और शहर के फैसले जल्दबाज़ी में नहीं लिए जा सकते। पहले नियम, फिर निर्णय!”
पर सियासत में जो नियमों की बात करे, वो “विरोधी” ठहरा दिया जाता है।
बैठक शाम 4 बजे शुरू होनी थी। 36 में से सिर्फ़ 14 अध्यक्ष पहुँचे। बाकी कहाँ थे? कुछ शादी में, कुछ “राजनीतिक ग़ैर-मौजूदगी” निभा रहे थे। डिप्टी मेयर ने कहा था —
“एजेंडा 7 दिन पहले देना चाहिए, ताकि 170 प्रस्तावों पर ठीक से अध्ययन हो सके।”
और हुआ क्या? एजेंडा आया सिर्फ़ एक दिन पहले!
अब आप ही बताइए — 170 प्रस्तावों को एक रात में पढ़ लेना क्या UPSC की तैयारी से आसान है?
यह विरोध नहीं था, यह प्रशासनिक अनुशासन की माँग थी। लेकिन सत्ता की आदत है — जो सवाल करे, उसे विरोधी कह दो।
मेयर साहिबा का पक्ष — और पॉलिटिक्स का असली रंग:
मेयर साहिबा का कहना था कि “कमीश्नर छुट्टी पर जा रहे थे, इसलिए बैठक पहले करनी पड़ी।”
वाह! तो क्या जयपुर का विकास एक अफसर की छुट्टी पर टिका है? और जनता के मुद्दे एजेंडा की औपचारिकता पर कुर्बान कर दिए जाएँ?
डिप्टी मेयर और उनके साथी सिर्फ़ इतना कह रहे थे —
“पहले नियमों का सम्मान करो, फिर राजनीति करो।
पर इस सियासी रंगमंच में नियम नहीं, नाटक चलता है।
और जनता? वही पुरानी कहानी!
दो घंटे की खींचतान के बाद कोरम जैसे-तैसे पूरा हुआ। और फिर क्या पास हुआ?
सड़कों की मरम्मत? नहीं!
नालों की सफाई? नहीं!
शहर के पार्कों की हालत सुधारने का कोई ठोस प्रस्ताव? बिल्कुल नहीं!
बस नामों का महोत्सव …
फलां सर्किल का नाम बदलो, अमुक पार्क का नाम बदलो, ताकि फोटो खिंचवाते वक्त बैनर पर “नया नाम” चमकता रहे।
शहर की समस्याएं वहीं हैं, बस बोर्ड बदल गए।
क्योंकि वो उस राजनीति के खिलाफ खड़े हैं जो “रूप” पर ध्यान देती है, “सार” पर नहीं।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब एजेंडा तय करने और प्रस्ताव पढ़ने का समय ही नहीं दिया जाता, तो ऐसी बैठकों का क्या मतलब?
क्या जनता की भलाई की जगह सिर्फ़ “फोटो-ऑप” और “क्रेडिट कार्ड” की राजनीति बची है?
असली लड़ाई कुर्सी नहीं, पारदर्शिता की है
अख़बार वाले कह रहे हैं — “दो गुट बन गए, मेयर बनाम डिप्टी मेयर।”
पर असली सवाल है —
अगर कोई नियमों का पालन करवाने की बात करे तो क्या वो “गुट” बन गया?
या जो नियम तोड़े, वही “मुख्य किरदार” कहलाए?
ग्रेटर डिप्टी मेयर साहब कर्णावत
का विरोध व्यक्तिगत नहीं, प्रक्रियात्मक है।
उनका संदेश साफ़ है …..
“जनता के काम में जल्दबाज़ी नहीं, जवाबदेही चाहिए। निर्णय पारदर्शी हों, ताकि जयपुर की जनता को पता हो कि उसके पैसे से क्या हो रहा है।”
जयपुर नगर निगम ग्रेटर की मेयर की उपलब्धियों का सवाल
मेयर साहिबा कहती हैं कि “शहर की रैंक 173 से 16 पर आ गई।”
अच्छी बात है, लेकिन क्या ये रैंकिंग ज़मीन पर भी उतरी?
सड़कें टूटी, नालियां जाम, पार्कों में अंधेरा — ये भी किसी रैंकिंग में गिने जाते हैं क्या?
या फिर कागज़ पर सफ़ाई और फोटो में मुस्कान काफी है?
अगला शो 7 नवंबर को — जनता तैयार रहे!
अब अगली बैठक फिर बुला ली गई है।
जयपुर की जनता अब समझ चुकी है — यह राजनीति नहीं, “सियासी धारावाहिक” है, जिसमें हर एपिसोड में नया ट्विस्ट होगा।
एक तरफ मेयर का शोकेस, दूसरी तरफ डिप्टी मेयर का सिद्धांत — और बीच में जनता, जो हर बार बस तालियां बजाने को मजबूर ……..
जयपुर के डिप्टी मेयर भले ही सियासी मायाजाल में अकेले खड़े दिखें, मगर सवाल वही पूछ रहे हैं जो जनता के मन में है …….
“नियमों से चलो या नाम बदलो?”
“शहर सजाओ या सियासत?”
और जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, जयपुर का विकास “कोरम” में ही अटका रहेगा।
- Advertisement -

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here